हाफ़िज़ सईद: पाक 'सत्ता' की अग्निपरीक्षा

हाफ़िज़ सईद
Image caption भारत मुंबई में हुए हमलों के लिए हाफ़ीज़ सईद को 'प्रमुख साजिशकर्ता' मानता है.

भारत और पाकिस्तान के संबंध पेचीदा तो हैं लेकिन ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग अच्छे संबंध की राह में रुकावट बन गया है.

भारत में अब ये बात लगभग तय मानी जा रही है कि जब तक पाकिस्तान जमात उद दावा के प्रमुख हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करता, बातचीत का आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है.

तो फिर क्या वजह है कि भारत सरकार के उस दावे के बावजूद कि उसने हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ ठोस सबूत दे दिए हैं, जमात उद दावा के प्रमुख आज़ाद घूम रहे हैं? पाकिस्तान के लिए हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना ज़्यादा मुश्किल है या भारत और अमरीका के दबाव का सामना करना?

पाकिस्तान और भारत में जानकारों के अनुसार इसकी दो बुनियादी वजहें हो सकती हैं, एक तो ये कि जो सबूत दिए गए हैं वो अदालत में मुक़दमा चलाने के लिए काफ़ी नहीं हैं और दूसरा ये कि पाकिस्तानी सरकार आंतरिक मज़बूरियों की वजह से कार्रवाई करने में असमर्थ है.

इस्लामाबाद में इस्टैबलिशमेंट ( सत्ता का असल केंद्र फ़ौज और ख़ुफ़िया ऐजेंसियाँ) पर नज़र रखने वाले जानकार भी काफ़ी हद तक इस बात से सहमत नज़र आते हैं.

मजबूरी

पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर हसन असकरी रिज़वी कहते हैं, "हाफ़िज़ सईद को काफ़ी अरसे तक पाकिस्तानी सुरक्षा के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है. इसलिए आतंकवाद के आरोप पर उन पर कार्रवाई करने की राह में कुछ मजबूरियाँ आड़े आ रही हैं जिन्हें क़ानूनी मजबूरियों का लिबादा पहनाया जा रहा है."

लश्करे तैबा और जमात उद दावा के संस्थापक हाफ़िज़ मोहम्मद सईद लाहौर हाईकोर्ट की ओर से छह महीने की नज़रबंदी के बाद इस समय एक स्वतंत्र नागिरक की तरह जीवन गुज़ार रहे हैं. दोनों संगठनों पर अब पाबंदी है.

सुप्रीम कोर्ट में उनकी रिहाई के ख़िलाफ़ सरकार की अपील पर सुनवाई की जानी है. लेकिन हाईकोर्ट में भी अभी तक सरकार ने ऐसे सबूत नहीं पेश किए हैं जिनकी बुनियाद पर उन्हें गिरफ़्तार या नज़रबंद रखा जा सके.

भारतीय रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल (रिटायर्ड) अफ़सर करीम कहते हैं, "यह मुमकिन है कि सबूत मज़बूत न हों. लेकिन मुंबई हमले की योजना पाकिस्तान में बनी थी, इसलिए सबूत भी वहीं हैं. मुंबई में तो सिर्फ़ हमला हुआ था. सबूत ख़ुद पाकिस्तानी सरकार को इकट्ठा करने होंगे."

लेकिन हसन असकरी रिज़वी के अनुसार हाफ़िज़ सईद का मामला केवल सबूत और गवाही का नहीं है.

वो कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि लश्करे तैबा हाफ़िज़ सईद का संगठन है. और अगर ये संगठन मुंबई हमले में शामिल है तो कम से कम हाफ़िज़ सईद को इसके बारे में जानकारी ज़रूर होगी और ये जानकारी सरकार उनसे हासिल कर सकती है."

लेकिन उनके अनुसार, "हाफ़िज़ सईद कश्मीर में पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट की नीतियों पर काम करने का प्रमुख ज़रिया रहे हैं और भारत के कहने पर उन्हें जेल में डालने का फ़ैसला इस इस्टैबलिशमेंट के लिए आसान नहीं होगा. काफ़ी मुश्किल है हमारी एजेंसियों के लिए उनके गिरोह पर हाथ डालना. अगर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी तो बहुत से राज़ से पर्दा हटेगा."

भारत में आम राय भी यही ही है.

ख़तरनाक चरमपंथी

Image caption 26, नवंबर 2008 को मुंहई के ताज होटल पर हमला हुआ था जिसमें 250 से अधिक लोग मारे गए थे

भारतीय जनता पार्टी सरकार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे ब्रजेश मिश्रा कहते हैं, "भारत के लिए हाफ़िज़ सईद सबसे अधिक ख़तरनाक हैं. उन्हें पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का पूरा समर्थन हासिल है... वो उनके आदमी हैं इसलिए वो उन्हें बचा रहे हैं. उनके ख़िलाफ़ कभी कार्रवाई नहीं हो सकती."

भारत में कुछ टीकाकारों का भी ख़्याल है, "बातचीत से पाकिस्तान को कभी कुछ हासिल होने वाला नहीं, उसका उनको भी एहसास है, हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई का मतलब होगा कश्मीर की मौजूदा स्थिति को क़बूल करना. हाफ़िज़ सईद को सौदेबाज़ी के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है."

काफ़ी समय तक पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट का हिस्सा रहे लेफ़्टिनेट जनरल तलत मसूद के मुताबिक़ कार्रवाई न किए जाने की एक वजह ये भी है कि हाफ़िज़ सईद के बहुत सारे चेले अच्छे प्रशिक्षित लड़ाके हैं.

उनका कहना है, "इस समय जबकि सरकार तालेबान और दूसरे आतंकवादियों के साथ लडा़ई में बुरी तरह फंस चुकी है, ये एक नया मोर्चा नहीं खोलना चाहते क्योंकि वो इस स्थिति को हैंडल नहीं कर सकते."

मेजर जनरल अफ़सर करीम की राय में हाफ़िज़ सईद पंजाब में काफ़ी लोकप्रिय हैं जिसकी वजह से सरकार झिझक रही है लेकिन वो कहते हैं कि सिर्फ़ हाफ़िज़ सईद को कार्रवाई का केंद्र नहीं बनाना चाहिए. उनका कहना है, "आप एक हाफ़िज़ सईद को ख़त्म कर दें तो चार और पैदा हो जाएंगे. ये लड़ाई एक सोच के ख़िलाफ़ है."

तलत मसूद के अनुसार हाफ़िज़ सईद इस समय पाकिस्तानी फ़ौजी इस्टैबलिशमेंट की सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उनका कहना है, "हाफ़िज़ सईद के मामले को पाकिस्तानी सुरक्षा इस्टैबलिशमेंट से अलग करके नहीं देखा जा सकता. मेरे अनुसार हाफ़िज़ सईद पर मुक़दमा चलाने का मतलब होगा इस्टैबलिशमेंट की सोच और विचारधारा का ट्रायल."

असल दुश्मन

पाकिस्तान की सिविलियन और फ़ौजी नेतृत्व में इस बात पर भी मतभेद है कि असल ख़तरा भारत है या चरमपंथी.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ रज़ा गिलानी और प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी कह चुके हैं कि पाकिस्तान को अब असल ख़तरा चरमपंथी और तालेबान से है. लेकिन टीकाकारों की राय में सियासी नेतृत्व की इस नीति को अभी तक इस्टैबलिशमेंट का समर्थन हासिल नहीं है.

रक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर आयशा सिद्दीक़ी का कहना है कि राजनीतिक नेतृत्व के कहने के बावजूद पाकिस्तानी सुरक्षा इस्टैबलिशमेंट या फ़ौज के लिए भारत आज भी दुश्मन नंबर एक है.

इस स्थिति में हाफ़िज़ सईद एक ऐसी अग्नि परीक्षा बन चुके हैं जिससे पाकिस्तानी सुरक्षा इस्टैबलिशमेंट के इरादे को परखा जा सकता है.

टीकाकारों की राय में हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई उस समय तक होना मुमकिन नहीं है जब तक सुरक्षा इस्टैबलिशमेंट भी राजनीतिक नेतृत्व की तरह इस नतीजे पर नहीं पहुँच जाती कि भारत अब पाकिस्तान का दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त है.

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