पंखों का तिलिस्म भरा संसार

पंखा
Image caption जतीन की योजना पंखों का संग्रहालय बनाने की है.

समकालीन दौर के बेहद सुलझे कलाकार जतीन दास हर रोज कलाकृतियां बनाने और उसकी रचना प्रक्रिया से गुजरने में अपना समय बिताते हैं.

67 साल की उम्र में भी काम का जुनून बरकरार है. पिछले 50 साल से उनकी विशेष रुचि चित्रांकन में रही है लेकिन बहुत कम कलाप्रेमियों को यह मालूम होगा कि वे इससे अलग हटकर पंखों के संग्रह की एक अलग ही तिलिस्म भरी दुनिया रच चुके हैं.

दिल्ली स्थित स्टूडियों में उनके पास देश-विदेश से इकट्ठा किए गए करीब 6500 पंखों का संग्रह है.

काम की प्रेरणा के बारे में जतीन कहते हैं, "मेरे जन्मदिन पर एक दोस्त ने खूबसूरत पंखा उपहार में दिया . दूसरे दिन एक अन्य दोस्त निजामुद्दीन मेरे घर आए, वे मायूस दिख रहे थे. मैं उठकर उन्हें पंखा करने लगा और कहा इस रूकी हुई हवा को बहने दीजिए."

जतीन कहते हैं कि पंखा एक तरह से ऊर्जा देती है, हवा देती है और हमें गर्मी में ठंडा करती है. यह रोमांस पैदा करने के साथ-साथ काव्यात्मक बोध भी पैदा करती है. दोस्त के साथ घटी इस घटना से मेरे खयाल में पंखों के संग्रह और उसपर एक किताब लिखने का विचार आया.

पिछले 26 साल से जतीन भारत या भारत से बाहर जिस किसी भी शहर में जाते हैं, पंखों के संग्रह पर खास नजर रखते हैं.

हर देश का पंखा

Image caption कई देशों के पंखों का संग्रह उनके पास है.

जतीन के संग्रह में अफ्रीका, चीन, जापान, मिस्र, श्रीलंका, इंडोनेशिया, थाइलैंड, मालदीव, वियतनाम, बाली, कंबोडिया, ईरान, बर्मा, कोरिया, दक्षिण पूर्व एशिया, स्वीडन और न्यूजीलैंड के ढ़ेर सारे पंखे हैं.

कहीं-कहीं पर इन पंखों के लिए उन्हें एक से दो लाख रुपए भी चुकाने पड़े हैं. वैसे अमूमन, भारतीय पंखों के दाम कम ही होते हैं. गांवों में साधारण पंखों की कीमत दो रुपए से दस रुपए के बीच होती है. भारत के राजा-महाराजाओं के पंखों में चांदी और सोने के डंडे लगे होते थे, इसलिए इनके दाम कुछ ज्यादा होते हैं.

भारत में ज़्यादातर बांस, तालपत्ता और खजूर से पंखा बनता है. गुजरात में रंग-बिरंगे और नक्काशी की हुई पंखे बनते हैं जबकि उड़ीसा और केरल में ताल पत्र से पंखे बनते हैं.

फरवरी महीने में इसे बनाने की आवश्यक सामग्री इकट्ठा कर ली जाती है और मार्च महीने में गर्मी शुरू होते ही इसे बेचने का काम शुरू हो जाता है. गांवों में महिलाएं आज भी अपने पति को पंखा करती हुई घर-गृहस्थी की सारी बातें सुलझाती हैं. जतीन कहते हैं- इन अर्थों में यह परंपरा प्रेम और आपसी सौहार्द से भी जुड़ा हुआ है.

दो हज़ार पेंटिंग

जतीन के संग्रह में पंखों से जुड़ी तकरीबन दो हज़ार पेंटिंग और फोटो हैं. अब तक इस पर दस डॉक्यूमेंट्री का भी निर्माण हो चुका है.

Image caption पंखा संग्रह पर जतीन एक किताब लिखने वाले हैं.

इस काम में उन्हें पत्नी वर्षा दास और पुत्री नंदिता दास का असीम सहयोग मिला. जतीन पंखा संग्रह करने वाली यूके स्थित विदेशी संस्था द फैन सर्किल के भी सदस्य हैं.

पिछले पांच साल से इसकी प्रदर्शनी भारत और भारत से बाहर लगती आ रही है. दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम और कोलकाता के ग्रांड विक्टोरिया मेमोरियल के अलावा लंदन, बेल्जियम, मनीला और कु्आलालंपुर में भी इसकी प्रदर्शनी लग चुकी है.

जतीन कहते हैं, "दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल से पहले इसके राष्ट्रीय संग्रहालय बनाने का काम चल रहा है. इससे पंखों के संग्रह और इसके बारे में अनुसंधान में लोगों को मदद मिलेगी."

जतीन इस पर एक पुस्तक भी लिख रहे हैं जो अगले साल तक प्रकाशित होगी. पुस्तक का नाम होगा- दू स्टियर द स्टिल एयर.

वे कहते हैं, " किसी काम को करते हुए उस काम से संबंधित जुनून और रफ़्तार मेरे जेहन में हमेशा चलती रहती है. हर काम मैं इसी तरह करता हूं और उसे पूरा करके ही रहता हूं."

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