छोड़ दी सती होने की ज़िद

दिवराला में सती मंदिर
Image caption 1987 में इसी जगह पर रूप कंवर को सती प्रथा के नाम पर कथित तौर पर चिता पर बिठा दिया गया था

राजस्थान में अपने पति की मौत पर सती होने पर उतारू शरबती आख़िर गांव और परिवारवालों के समझाने के बाद अपनी ज़िद छोड़ने को राज़ी हो गई.

सूचना मिलने पर पुलिस वहाँ पहुँची भी, लेकिन तब तक शरबती को समझाया जा चुका था.

ये घटना सीकर ज़िले में उस जगह हुई जहाँ से दिवराला केवल पाँच किलोमीटर दूर है. दिवराला में लगभग 22 साल पहले रूप कँवर को सती प्रथा के नाम पर कथित तौर पर चिता पर बिठाकर सती होने के लिए बाध्य किया गया था.

महिला संगठनों का कहना है कि ये सती विरोधी आंदोलन से बने माहौल का ही असर है कि शनिवार को शरबती को गांववालों ने रोक लिया.

सती होने की ज़िद

पुलिस के मुताबिक़ शरबती के पति 60 वर्षीय नंछू राम मीणा की शनिवार को मौत हो गई थी.

गांववालों के अनुसार जब वे नंछू राम का शव अंतिम संस्कार के लिए श्मशान ले जाने लगे तो शरबती ने ख़ुद के सती होने की ज़िद की.

घरवालों और गाँव के प्रमुख लोगों ने उन्हें समझाया, लेकिन शरबती नहीं मानी.

ये ख़बर फैलते ही लोग वहाँ इकट्ठा होने लगे. गाँव के सरपंच और अन्य लोग शरबती को समझाते रहे, लेकिन बात नहीं बनी. इसके बाद गाँववालों ने इसकी सूचना पुलिस को दी.

इलाक़े के अजीतगढ़ थाने के अधिकारी हेमराज सिंह कहते हैं, "हमें सूचना मिली थी कि एक औरत सती होने की इच्छा जता रही है. हम मौक़े पर जाने के लिए रवाना हुए, लेकिन तभी रास्ते में सूचना मिली कि शरबती मान गई है."

बाद में शरबती के दिवगंत पति का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

1987 के सती विरोधी आंदोलन की अगुवा रही कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "उस आंदोलन से सती विरोधी माहौल बना और अब लोग इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ खड़े होने लगे हैं. साथ ही क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी लगता है कि इस सामाजिक बुराई को रोकना उनकी भी ज़िम्मेदारी है. यही वजह है कि रूप कँवर के बाद राजस्थान में किसी औरत को सती के नाम पर नहीं मारा गया."

महिला संगठनों के अनुसार 1947 से लेकर अब तक राजस्थान में सती होने की तकरीबन 26 घटनाएँ हुई हैं, इनमे रूप कँवर सबसे आख़िरी थी.

इसके बाद महिला संगठनों के व्यापक आंदोलन को देखते हुए सरकार ने सती विरोधी क़ानून बना दिया और इसे लागू करने में सख़्ती भी दिखाई

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