'भारत को तोड़ने की साज़िश'

  • 12 अगस्त 2009
चीन का झंडा
Image caption भारत और चीन में विकसित देशों में शामिल होने की होड़ में हैं

भारत ने चीन के एक अर्धसरकारी विश्लेषक के उस तर्क को रद्द कर दिया है जिसमें भारत को कई खंड में तोड़ने की बात कही गई है.

ये लेख चीन के अर्धसरकारी संगठन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेटेजिक वेबसाइट पर अप्रैल में प्रकाशित हुआ है, लेकिन भारत में इसका विवरण पिछले दिनों उस समय आया जब चीनी मामलों के एक भारतीय विश्लेषक ने इसका अनुवाद पेश किया.

भारत में प्रकाशित होने वाले इस अनुवाद के अनुसार इस लेख में कहा गया है कि भारत को टुकड़े-टुकड़े करने के लिए स्थितियाँ इस समय अनुकूल हैं. इसके लिए चीन को पाकिस्तान, नेपाल और भूटान से मदद लेनी चाहिए.

लेख में कहा गया है, "चीन को असम में आज़ादी हासिल करने के लिए चरमपंथी संगठन उल्फ़ा के साथ ही तमिल और नागा समूहों की राष्ट्रवादी आंदलनों का समर्थन करना चाहिए. बांगलादेश की मदद की जाए ताकि वो पश्चिम बंगाल के साथ एक संयुक्त बंगाली राष्ट्रवाद पर आधारित अलग देश बना सके और इस तरह चीन दक्षिणी तिब्बत की 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन भारत से वापस ले सके जिसपर उसने क़ब्ज़ा कर रखा है."

लेख में आगे लिखा गया है कि भारत एक देश के रूप में कभी अस्तित्व में नहीं रहा है.

निजी राय

भारतीय विदेश मंत्रायल की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया है कि ये लेख एक विश्लेषक की निजी राय है और ये चीन के उस सरकारी नज़रिए से तालेमल नहीं रखता जिसका चीनी अधिकारी विभिन्न अवसरों पर भारत-चीन संबंधों के हवाले से करते रहे हैं.

इस बयान में कहा गया है, "चीनी अधिकारी ने कहा है कि भारत-चीन संबंध में चीन शांतिपूर्ण अस्तित्व के पाँच मौलिक सिद्धांत पर कार्य करता है जिसमें यह भी है कि क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान किया जाए."

विदेश मंत्रालय के इस बयान में भारत और चीन के सीमा विवाद का भी ज़िक्र किया गया है. दोनों देशों के बीच कई स्तर पर बातचीत जारी है और पिछले वर्षों में बातचीत में तेज़ी आई है. बयान में कहा गया है, "दोनों देश एक-दूसरे की हैसियत का ख़्याल रखते हुए सीमा विवादों समेत सभी मामलों को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल करने के लिए प्रयासरत हैं."

ये लेख एक ऐसे समय पर आया है जब भारत में बांगलादेश और बर्मा से लेकर श्रीलंका तक चीन के तेज़ी से बढ़ते हुए प्रभाव पर चिंता पाई जाती है.

पिछले दिनों नौसेना के अध्यक्ष एडमिरल सुरीश मेहता ने क्षेत्र में शांति की स्थिति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि चीन का असर न सिर्फ़ तेज़ी से बढ़ रहा है बल्कि भारत इस समय उसका सैनिक स्तर पर मुक़ाबला करने में सक्षम नहीं है.

उन्होंने ये भी कहा था कि चीन अपनी बढ़ती हुई ताक़त के साथ सीमा विवादों के मामले में अपना रवैया कठोर करता जाएगा.

भारत की चिंता

Image caption अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन पहले भी सवाल उठाता रहा है

पिछले कुछ वर्षों में चीन के रवैए में सीधे रूप में सख़्ती आई है. जबकि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय ऐसा लगने लगा था कि तिब्बत के मामले में चीन के नज़रिया से भारत क़रीब आने लगा था जिसके बदले चीन भी सिक्कम और अरूणाचल प्रदेश के विवादित इलाक़ों पर भारत के दावे को मान लिया.

लेकिन चीन के नज़रिए में कठोरता देखी जा रही है.

भारत में चीन की बढ़ती हुई ताक़त और उसके प्रभाव पर चिंता है. चीनी मामलों के जानकार भारत के रक्षा रणनीतिकारों पर पाकिस्तान के बजाए चीन पर ध्यान केंद्रीत करने पर ज़ोर दे रहे हैं.

इंडियन डीफ़ेंस रीव्यू मैगज़ीन के टीकाकार भरत वर्मा ने भारत को चीन के 'षड्यंत्र' के बारे में चेतावनी दी है.

उनका कहना है कि आर्थिक मंदी से चीन का निर्यात काफ़ी प्रभावित हुआ है और देश के कई हिस्सों में ज़बर्दस्त बैचेनी है.

उनका कहना है, "आंतरिक परेशानियों को दबाने और एशिया में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए उसे एक सैन्य विजय की ज़रूरत है और भारत उसके निशाने पर है."

भारत में सरकारी स्तर पर चीन से अच्छे संबंध और शांतिपूर्ण बातचीत की दुहाई दी जाती रही है लेकिन असल में चीन के बारे में बहुत चिंता पाई जा रही है और देश के रणनीतिकार अब अपना ध्यान सीधे तौर पर चीन की ओर केंद्रित कर रहे हैं जिनमें दीर्घकालिक सैनिक रणनीति भी शामिल है.

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