दिग्विजय सिंह से एक मुलाक़ात

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बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में इस बार ख़ास मेहमान हैं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह.

आपकी पढ़ाई से शुरुआत करते हैं, शायद आप मेयो कॉलेज पढ़ने गए थे?

नहीं, मैं इंदौर के एक पब्लिक स्कूल और दिल्ली कॉलेज में पढ़ा. मेरे पिता और दादा भी वहीँ पढ़े. मैं भी वहीं पढ़ा.

आपका पैतृक स्थान कहाँ है?

मेरा पैतृक स्थान गुना ज़िले के राघव गढ़ में है. ये भोपाल के नज़दीक और ग्वालियर और इंदौर के बीचों-बीच है.

राहुल गांधी ने सभी कांग्रेसियों से कहा है कि वे अपने नाम से पहले महाराजा, राजा जैसी दूसरी उपाधियाँ न लगाएँ. आपका क्या कहना है?

मेरा जन्म 1947 का है इसलिए मेरा अनुभव राज-पाट से नहीं है. मैंने कभी अपने नाम के आगे राजा जैसा शब्द नहीं लगाया. अब कहने वाले तो कुछ भी कहते रहेंगे.

तो क्या आपने शुरू से ही सोच लिया था कि राजनीति में आएँगे?

नहीं. मैं तो राजनीति से बहुत दूर था. जब मैं इंदौर में इंजीनियरिंग कर रहा था, तो कॉलेज के चुनावों में वोट डालने तक नहीं जाता था. दरअसल तब मेरी दिलचस्पी खेल में बहुत ज़्यादा थी. मैं यूनिवर्सिटी स्तर पर हॉकी, क्रिकेट, स्क्वैश और टेनिस खेलता था. स्क्वैश मैंने राष्ट्रीय स्तर पर भी खेला है और तब मुझे राष्ट्रीय रैंकिंग भी हासिल थी. तो सारा समय खेल और पढ़ाई में जाता था.

लेकिन जब मैं इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में था तभी मेरे पिता का देहांत हो गया. इंजीनियरिंग करने के बाद मेरी माँ ने कहा कि घर पर रहो. घर पर रहो, तो क्या करो. तब लोगों ने मुझ पर राजनीति में आने का दबाव बनाया. मैं नगरपालिका अध्यक्ष बन गया. फिर मैं कांग्रेस के साथ जुड़ गया और आज तक कांग्रेस में हूँ.

तो कुल मिलाकर स्क्वैश को घाटा हुआ?

ये तो कहा नहीं जा सकता कि राजनीति का फ़ायदा हुआ या स्क्वैश का घाटा. लेकिन इतना ज़रूर है कि मैंने हमेशा राजनीति को दूसरे नज़रिए से देखा है. कभी-कभी महसूस करता हूँ कि राजनीति में मुझे कुछ और करना चाहिए. लेकिन मैं जहाँ भी हूँ, संतुष्ट हूँ.

तो आप एक खिलाड़ी के रूप में राजनीति करते हैं?

मैंने कभी अपने प्रतिद्वंद्वी को दुश्मन की नज़र से नहीं देखा. जैसे खेल में हार-जीत होती है, मैं राजनीति में भी हार-जीत वैसे ही लेता हूँ. मैंने आठ चुनाव लड़े हैं, जिनमें से सात जीते हैं और एक हारा हूँ. जब चुनाव हारा भी था तो ये नहीं लगा कि कोई पहाड़ टूट गया हो.

आपने कहा कि आप टेनिस, क्रिकेट, हॉकी और स्क्वैश खेलते थे. आपको सबसे ज़्यादा आनंद किसमें आता था?

मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा क्रिकेट खेलने में आता था और ये मुझे आज भी पसंद है. स्क्वैश भी मुझे पसंद था, लेकिन बाद में मैं इसे जारी नहीं रख सका. मैं स्कूल में फ़ुटबॉल खेलता था, लेकिन यूनिवर्सिटी में नहीं खेल सका. अब मैं फ़ुटबॉल देखता हूँ और इंग्लिश प्रीमियर लीग देखता हूँ.

दरअसल जब मेरा बेटा स्कूल से कॉलेज में आया तो मुझे लगा कि हम दोनों में कम्युनिकेशन ही ख़त्म हो गया है. मुझे उसकी रुचि फ़ुटबॉल में लगी तो मैंने भी फुटबॉल में रुचि लेनी शुरु की. हम दोनों के बीच बातचीत होने लगी और इस वजह से बाप-बेटे के बीच कम्युनिकेशन चैनल खुल गया.

क्या नाम है आपके बेटे का?

मेरे बेटे का नाम जयवर्धन है. दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से बी कॉम ऑनर्स किया और इन दिनों मुंबई की एक कंसल्टिंग फ़र्म में बिज़नेस एनालिस्ट है. मैनचेस्टर यूनाइटेड उसकी पसंदीदा टीम है. तो मुझे भी उसके साथ फ़ुटबॉल की चर्चा करने में मज़ा आता है.

और क्रिकेट में आपके पसंदीदा खिलाड़ी कौन हैं?

Image caption सचिन के प्रशंसक हैं दिग्विजय सिंह

हम जब स्कूल में थे तो सीके नायडू हमें सिखाया करते थे. मैं विकेटकीपर बल्लेबाज़ था. मुश्ताक़ अली साहब ने भी हमें खेलना सिखाया. मुश्ताक़ अली साहब का बेटा गुलरेज़ भी हमारे साथ खेला.

मुझे क्रिकेट देखना अच्छा लगता है. कई लोग टी-20 को पसंद नहीं करते, लेकिन मैं समझता हूँ कि ये अच्छी चीज़ है. ज़माने के साथ चलना चाहिए. खिलाड़ी के लिए जो अच्छा है वो होना चाहिए.

मौजूदा क्रिकेटरों में मुझे सचिन तेंदुलकर बहुत पसंद हैं. उनका कोई मुक़ाबला नहीं है. लेकिन महेंद्र सिंह धोनी भी मुझे पसंद हैं. उन्होंने कई सही मौक़ों पर अच्छी पारियाँ खेली हैं.

आपने बताया कि आप किस तरह से राजनीति में आए. तो जिस पृष्ठभूमि से आप राजनीति में आए उसका आपको क्या लाभ मिला या नुक़सान पहुँचा?

मैंने राजनीति को कभी लाभ-हानि के रूप में नहीं देखा. जैसी परिस्थितियाँ रहीं, उनके अनुरूप ढला. मैंने यही कोशिश की कि जो सही है, उसे सही रूप में लिया जाए. इसीलिए मुझे ज़्यादा दिक्क़त भी नहीं हुई. आजकल राजनेताओं की विश्वसनीयता ख़तरे में है. कहा जाता है कि नेता जो कहते हैं, वो करते नहीं है. लेकिन मैंने कोशिश की कि जो कहा वो किया. इसमें मन को भी शांति मिलती है और दिमाग़ भी शांत रहता है.

आप मध्यप्रदेश में लगातार दो बार मुख्यमंत्री रहे, जब तीसरी बार आप चुनाव मैदान में थे तो आपने कहा था कि अगर आप सत्ता में नहीं आए तो 10 साल तक कोई पद नहीं लेंगे, तो क्या ये बयान सोच समझकर दिया था?

बिल्कुल. सोच समझकर बोला था. बात ये है कि आपकी जवाबदेही होनी ही चाहिए. मुझ पर कांग्रेस अध्यक्ष ने विश्वास किया. मैंने 1993 और 1998 में अच्छे परिणाम दिए, लेकिन 2003 में अच्छे नतीजे नहीं दे सका.

अब दूसरों को मौक़ा मिलना चाहिए. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैंने ये फ़ैसला किया. इतना ज़रूर है कि इस मुद्दे पर कई लोगों के अलग-अलग विचार हैं. लेकिन मुझे संतुष्टि है.

दूसरी बात ये है कि मुझे शुरू से ही संगठन का शौक रहा है. मुझे घूमने-फिरने लोगों से मिलने-जुलने में मज़ा आता है. मैं एक जगह नहीं बैठ सकता. मुझे दौरा करने में मज़ा आता है.

जब आप छोटे थे, तब आपको किस चीज़ का शौक था?

जब हम छुट्टियों में घर आते थे, तो जंगल में शिकार खेलने जाया करता था. तब शिकार का लाइसेंस मिल जाता था. तो मेरी छुट्टियाँ इसी में बीत जाया करती थीं.

तो आप किसका शिकार करते थे?

लोग विश्वास नहीं करेंगे. लेकिन मैं तब 11 साल का ही था, जब मैंने तेंदुए का शिकार कर लिया था और उस समय 13 साल का था तब टाइगर का शिकार किया था. लेकिन 1966 के बाद शिकार पर नहीं गया.

पिता की कौन सी स्मृतियाँ याद आती हैं?

मेरे पिता बलभद्र सिंह बहुत ही ख़ुशमिजाज़ व्यक्ति थे. अपने ज़माने के बहुत अच्छे खिलाड़ी भी थे. वो दिल्ली कॉलेज और मेयो कॉलेज में भी पढ़े. तीस के दशक में मेयो कॉलेज में ग्रेजुएशन भी होता था. उनके नाम पर आज भी एक उपलब्धि दर्ज है कि मेयो कॉलेज में वो क्रिकेट, हॉकी, फ़ुटबॉल तीनों टीमों के कप्तान थे.

1952 में वो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़े और विधायक चुने गए. गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी और निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े.

तो राजनीति आपके ख़ून में है. लेकिन राजनेताओं में आप सबसे ज़्यादा किससे प्रभावित हैं?

सबसे ज़्यादा प्रभावित तो महात्मा गांधी ने किया. मैं 1970 में जब कांग्रेस से जुड़ा तब इंदिरा गांधी अध्यक्ष थी. उसके बाद राजीव गांधी का मुझे बहुत स्नेह मिला. उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया और 37 साल की उम्र में मुझे मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया.

वो भी तब, जब बड़े-बड़े धुरंधर अर्जुन सिंह, डॉ. शंकरदयाल शर्मा, माधवराव सिंधिया, कमलनाथ, विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल थे. मैंने कोशिश की कि सबका मान-सम्मान रखते हुए पार्टी को मज़बूत किया जाए और मैं सात साल तक अध्यक्ष रहा.

तो मेरी रुचि शुरू से ही संगठन में ज़्यादा थी. मुख्यमंत्री बनना चाहिए था तो बना और 10 साल मुख्यमंत्री रहा भी. अब सत्ता और सरकार का बहुत मोह नहीं है. हमारे सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उत्तर भारत में कांग्रेस को मज़बूत करना है.

उत्तर प्रदेश, बिहार के बारे में आपसे बात करेंगे, लेकिन उससे पहले आपसे जानना चाहेंगे कि मध्य प्रदेश में इतने सारे दिग्गजों के बीच आपने कैसे तालमेल बिठाया?

1994 में जब मैं मुख्यमंत्री था, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने एक बार मुझसे पूछा कि दिग्विजय तुम इतने सारे सीनियर नेताओं से कैसे डील करते हो. मैंने कहा कि बहुत आसान है. सभी लोग मुझसे बड़े हैं. उनका मान-सम्मान बनाए रखना मेरा फ़र्ज़ है. जो वो कहते हैं, मैं उसका पालन करता हूँ. मुझे कभी अहं नहीं रहा. मैं हमेशा उनसे मिलता हूँ और उनके आदेश को मानता हूँ. मैं स्वभाव से ही ज़िद्दी नहीं रहा हूँ, जहाँ तक संभव हो लोगों से तालमेल बिठाने की कोशिश करता हूँ.

अच्छा ये बताएँ कि उत्तर प्रदेश में प्रयोग हुआ और 21 सांसद जीत कर आए. बिहार में भी वोट प्रतिशत बढ़ा और अब पार्टी की वहाँ भी अकेले उतरने की तैयारी है. इसका भी श्रेय आपको जा रहा है. उस समय आपको कभी ये नहीं लगा कि कहीं ये दाँव उलटा न पड़ जाए?

Image caption दिग्विजय मानते हैं कि राहुल गांधी ने उन पर भरोसा किया

मैं जब उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना, तो मुझे इस बात का गर्व था कि सोनिया और राहुल गांधी ने मुझ पर विश्वास किया. ज़मीनी हालात ये थे कि मुझे लगा कि लोग क्षेत्रीय पार्टियों से ऊब रहे हैं. किसान क़र्ज़ माफ़ी और नरेगा का भी अच्छा असर दिखा. लोगों ने मुझसे कहा कि कांग्रेस को चुनाव लड़ाइए, अच्छा वोट मिलेगा.

थोड़ा ख़तरा तो था, लेकिन मैंने सोनिया और राहुल जी से अनुरोध किया कि हमें ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर लड़ना चाहिए. ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा कि हमारी सीटें चार-पाँच रह जाएँगी. लेकिन अगर सिर्फ़ 12 सीटों पर ही लड़ेंगे तो बढ़ने का तो कोई स्कोप नहीं होगा. मैंने कहा कि कुछ सीटों पर तो समझौता ठीक है, लेकिन अधिक से अधिक सीटों पर अकेले लड़ना चाहिए.

कई लोगों ने कहा कि मैं ग़लती कर रहा हूँ और नुक़सान होगा. मैंने कोशिश की कि लोगों को समझा सकूँ और अच्छे नतीजे मिल गए तो अब लोग कहते हैं कि 80 सीटें लड़ते तो शायद 40 सीटें आती.

बतौर मैनेजर सोनिया गांधी कैसी महिला हैं?

जो महिला देश के बाहर इटली में जन्मी हो, उनका पालन-पोषण वहीं हुआ हो. उसके बाद भारत में आकर उन्होंने जिस तरीक़े से ख़ुद को भारतीय परंपराओं में ढाला हो, ये आसान बात नहीं है.

बात उस समय की है जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और मैं मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष था. झाबुआ दौरे में सोनिया गांधी कुछ महिलाओं के पास चली गई और उनसे बात करने लगी. तब राजीव गांधी ने मुझसे सोनिया जी के पास जाने को कहा. मैं उनकी बातों का अनुवाद करने की कोशिश करने लगा तो सोनिया जी ने मुझसे कहा कि दिग्विजय मुझे हिंदी आती है.

अब आप दूसरी बात पर गौर कीजिए. इंदिरा गांधी उनकी सास थीं और इंदिरा जी ने उन्हें पास किया था. जब राजीव जी का देहांत हुआ तो लोगों का कहना था कि वो बच्चों को लेकर इटली चली जाएँगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राजनीति से बाहर रहने के बावजूद 1991 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव भी दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और सात साल तक राजनीति से दूर रही.

एक समय ऐसा था जब सिर्फ़ मैं और एके एंटनी साहब ही कांग्रेस के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. पार्टी के लगातार नुक़सान को देखते हुए वो राजनीति में आईं. कोई उम्मीद कर सकता है कि 330 सांसदों के होते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया. जिस तरह से उन्होंने पद की मर्यादा रखी और प्रधानमंत्री के साथ सरकार चलाई, वैसा उदाहरण नहीं मिल सकता.

मैं आपका बताना चाहूँगा कि वो ग़रीबी को लेकर बहुत संवेदनशील हैं. मुझे याद है कि झाबुआ दौरे में लोगों की हालत देखकर वो बहुत द्रवित हुईं. जब हेलिकॉप्टर से लौटने लगीं, तो उन्होंने राजीव जी से पूछा कि ये किसका विधानसभा क्षेत्र है, तो उन्हें बताया गया कि ये विद्याचरण शुक्ल जी का विधानसभा क्षेत्र है, वो सिर हिलाकर चुप रहीं, कुछ नहीं कहा.

लेकिन 2004 का सूचना का अधिकार, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना, भूमि अधिग्रहण क़ानून, जितने भी ग़रीबों से जुड़े मुद्दे हैं, उनमें सोनिया जी की अहम भूमिका रही. उनकी याद्दाश्त भी गजब की है और प्रदेश के छोटे-बड़े नेताओं को पहचानती हैं.

मैं आपके साथ इतने लंबे समय तक पहली बार बैठा हूँ और मुझे लग रहा है कि आप जो कुछ कर रहे हैं, उसका लुत्फ़ उठा रहे हैं, आत्मसात कर रहे हैं?

यही मेरा स्वभाव है. मैं जो करता हूँ, उसका मज़ा लेता हूँ. मसलन, मेरी रुचि क्रिकेट में रही है. जब माधवराव सिंधिया जी का देहांत हुआ तो लोगों ने मुझसे कहा कि आप क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बन जाइए. मैंने उनसे कहा कि मैं एक बार में एक ही काम करता हूँ. संगठन में हूँ तो संगठन के लिए काम करता हूँ और सरकार में हूँ तो सरकार के लिए.

आप सोनिया और राहुल दोनों के साथ काम कर चुके हैं. आपको क्या लगता है दोनों में से राजनीति का ज़्यादा लुत्फ़ कौन उठाता है?

मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि माँ के सामने बेटा कितना ही बड़ा या होशियार हो जाए, बच्चा ही रहता है. तो वास्तविकता ये है कि मां-बेटे का रिश्ता बहुत ही संवेदनशील होता है.

मैंने राहुल गांधी के साथ बहुत ज़्यादा काम नहीं किया है. मैंने डेढ़-दो साल उनके साथ काम किया है. वो बहुत कम बोलते हैं और सुनते ज़्यादा हैं. लेकिन हर विषय पर उनका अपना नज़रिया होता है और विशिष्ट नज़रिया होता है. उनका होमवर्क बहुत ज़बरदस्त होता है. जब तक वो संतुष्ट न हो जाएँ तब तक आपसे पूछते रहेंगे. मैं समझता हूँ कि नेतृत्व के उनमें सभी गुण हैं.

मुझे लगता है कि वो ठीक कर रहे हैं कि जब तक पार्टी को बुनियादी तौर पर ठीक न कर दिया जाए तब तक सत्ता में नहीं जाना चाहिए. राजीव जी ख़ुद सत्ता में नहीं जाना चाहते, अगर इंदिरा गांधी की मौत नहीं होती तो राजीव जी इतनी जल्दी प्रधानमंत्री नहीं बनते.

क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी बदलाव कर सकते हैं और किन क्षेत्रों में?

बात ये है कि वो अपना पूरा ध्यान पार्टी को मज़बूत करने और युवाओं को ज़्यादा से ज़्यादा तरजीह देने पर लगाए हुए हैं. वो लंबी पारी खेलने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे हैं और मुझे लगता है कि सही राह पर हैं. उनके मन में ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों और उनसे जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता है.

एक उदाहरण बताता हूँ, एआईसीसी के सत्र में राहुल जी मेरे पास बैठे हुए थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि दिग्विजय जी हमारी पार्टी तो ग़रीबों की पार्टी है, तो इस हॉल में मुझे एक ग़रीब आदमी दिखाइए. मैंने कहा आप सही कह रहे हैं, मुझे भी इस हॉल में कोई ग़रीब नहीं दिख रहा.

क्या महिला राजनेताओं से अलग तरह से व्यवहार करना पड़ता है?

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. हर व्यक्ति का काम करने का तरीक़ा अलग होता है. अगर सही समय पर सही तरीक़े से डील किया जाए तो परेशानी नहीं होती. दरअसल, उमा भारती और मायावती जैसी शख्सियतों को दुश्मनों की आवश्यकता नहीं होती. वो अपना इंतजाम ख़ुद कर लेती हैं. इसलिए नहीं कि वो महिलाएँ हैं. कई पुरुष नेता भी ऐसे हैं. वे बहुत ग़ुस्सैल हैं, इस कारण मैं ऐसा कह रहा हूँ.

राजनीति में आपको सबसे ज़्यादा नापसंद क्या है?

वो सारे राजनेता जो ज़मीन पर न रहते हुए भी एक्सपर्ट बन जाते हैं, वो मुझे अच्छा नहीं लगता.

पर ऐसा क्यों होता है?

होता है. परिस्थितियाँ हैं, भाग्य है.

भाग्य पर यक़ीन है आपको?

Image caption दिग्विजय सिंह को मायावती जैसी महिला राजनेताओं से कोई परेशानी नहीं

हम लोगों को शुरू से ही पढ़ाया सिखाया जाता है, अपना कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो. भाग्य भी एक चीज़ होती है. लगता भी है भाग्य कहीं न कहीं काम आता है. अपने मामले में कहूँ तो मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने जो भी किया वो पूरे दमखम के साथ किया, फिर चाहे फल जो भी मिला हो.

राजनीति में लोग टांग खींचने की कोशिश करते हैं तो बड़ा दिल रखकर चलना कितना आसान होता है?

मैं कभी किसी की शिकायत नहीं करता. मेरी आदत नहीं है कि मैं किसी की आलोचना करूँ. दो तरीक़े हैं कि पहला कि किसी की लकीर मिटाकर अपनी लकीर खींचो और दूसरा कि अपनी लकीर लंबी खींचो. मैं दूसरे तरीक़े में यक़ीन करता हूँ.

ख़ाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?

मेरी संगीत में रुचि रही है. जब मैं पढ़ता था तो संगीत सुनता रहता था. आज भी जब मैं दौरे पर जाता हूँ और अकेला रहता हूँ तो आइपॉड पर गाने सुनता रहता हूँ.

इतने बड़े-बड़े घरों में रहने के बाद दिल्ली में छोटे फ़्लैट में रहना कैसा लगता है?

असल में मैं सांसद तो हूँ नहीं, इसलिए बड़ा मकान तो मिल नहीं सकता. मेरा कोई यहाँ दूसरा मकान तो है नहीं. मैं यहाँ अपनी पत्नी के साथ रहता हूँ, इसलिए दो कमरों का फ़्लैट ठीक ही है. कभी-कभी लोगों से मिलने-जुलने में परेशानी होती है, लेकिन मैं उनसे बाहर घूमते-फिरते मिल जाता हूँ.

आपकी नज़र में दिग्विजय सिंह कैसे व्यक्ति हैं?

आपकी नज़र में दिग्विजय सिंह जैसे हैं, वही दिग्विजय सिंह है.

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