आत्महत्या कर रहे हैं आंध्रप्रदेश के किसान

  • 16 अगस्त 2009
drought
Image caption औसत से आधा क्षेत्र में ही हो पाई है खरीफ़ फ़सल की बुआई

आंध्रप्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया है. राज्य सरकार ने पिछले 40 दिनों में 20 किसानों के आत्महत्या करने की बात मानी है, लेकिन मुख्य विपक्ष तेलुगुदेशम का आरोप है कि इस अवधि में 70 से ज़्यादा किसान जान गंवा चुके हैं.

किसानों की आत्महत्याओं के ज़्यादातर मामले तेलंगाना और रायलसीमा इलाक़ों से सामने आए हैं.

जहाँ विशेषज्ञ एकमत से मानसून की अपर्याप्त बारिश और सूखे जैसी स्थिति को किसानों की परेशानी का मुख्य कारण बताते हैं, वहीं मुख्यमंत्री वाय एस राजशेखर रेड्डी कहते हैं कि अधिकारी अभी आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री रेड्डी ने तेलुगुदेशम पर किसानों की आत्महत्या के मामलों को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का भी आरोप लगाया है.

इस बीच तेलंगाना के मेडक और निज़ामाबाद ज़िलों से किसानों की आत्महत्या के नए मामलों की ख़बरें आ रही हैं. मेडक के चिन्नाकोडुर गाँव के 45 वर्षीय किसान के देवेन्द्र रेड्डी ने कीटनाशक दवा खाकर अपनी जान दे दी है. उनकी फ़सल ख़राब हो गई थी और उन पर कर्ज़ का बोझ था.

इसी तरह निज़ामाबाद के दोनाचन्दा गाँव के 55 वर्षीय किसान पी एन भुमन्ना ने फ़ांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उन पर भी कर्ज़ का भारी बोझ था.

सूखा प्रभावित क्षेत्रों की घोषणा नहीं

इस साल मानसून के पहले 75 दिनों में राज्य में औसत बारिश में 60 प्रतिशत की कमी दर्ज़ की गई है, लेकिन राज्य के जलाशयों में पानी का स्तर इतना कम है कि जो कि पहले कभी नहीं देखा गया था. इस कारण राज्य पेयजल की समस्या से भी जूझ रहा है.

किसान बिजली की कटौती और चारे की कमी की समस्याओं का भी सामना कर रहे हैं.

लेकिन इस विषम परिस्थिति में भी राज्य सरकार ने अभी तक औपचारिक रूप से सूखा प्रभावित ज़िलों की पहचान नहीं की है.

अधिकारियों का कहना है कि राज्य मे सूखा प्रभावित क्षेत्रों की घोषणा करने से पहले वे सितंबर महीने के अंत तक परिस्थितियों में सुधार का इंतज़ार करेंगे.

इस बीच तटवर्ती इलाक़ों में सप्ताहांत में हुई बारिश से लोगों ने राहत की साँस ली है. हालाँकि कृष्णा डेल्टा इलाक़े में पानी का स्तर अब भी बहुत नीचे है.

राज्य में सूखे की स्थिति कितनी गहरा चुकी है इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि खरीफ़ की बुआई औसत 79 लाख हेक्टेअर के मुक़ाबले मात्र 40 लाख हेक्टेअर में ही हो पाई है.

संबंधित समाचार