लंबित मामलों को निपटाया जाए: मनमोहन

  • 16 अगस्त 2009
मनमोहन सिंह
Image caption प्रधानमंत्री ने कहा कि करोड़ों की संख्या में लंबित अदालती मामलों से दुनिया में भारत की छवि ख़राब होती है

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों को देश की न्यायपालिका के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क़रार दिया है.

उल्लेखनीय है कि ख़ुद सरकारी आंकड़ो के मुताबिक देश की अदालतों के समक्ष 2 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा मुक़दमे लंबित हैं. इनमें से कुछ मामले तो आधी सदी से भी ज़्यादा पुराने हैं.

रविवार को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को अदालतों में रिकॉर्ड संख्या में लंबित मामलों और सालों तक घिसटने वाले मुक़दमों का बोझ ढोना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि दुनिया जहाँ न्याय व्यवस्था की इस हालत पर आश्चर्य करती है, वहीं देश के भीतर इसे लेकर चिंता व्यक्त की जाती है.

भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि लंबित मामलों को निपटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और सरकार को मिल कर काम करना होगा. उन्होंने कहा, "हम वायदा करते हैं कि इस दिशा में न्यायपालिका यदि एक क़दम बढ़ाती है, तो सरकार दो क़दम आगे बढ़ कर काम करेगी."

प्रधानमंत्री ने कहा कि क़ानून एवं न्याय मंत्रालय देश में न्यायिक सुधारों के लिए एक रोडमैप पर काम कर रहा है. इस विस्तृत योजना को छह महीने में पूरा किया जाना है. उसके बाद योजना का चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वयन होगा.

प्रधानमंत्री ने मुक़दमे का निपटारा होने के इंतज़ार में जेल में बंद लोगों की बहुत बड़ी संख्या पर भी चिंता व्यक्त की.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चुप्पी

हालाँकि समग्र न्यायिक सुधार की बात करते समय मनमोहन सिंह न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुछ नहीं बोले. उल्लेखनीय है कि भारत में इस समय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और उच्च न्यायलयों के जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजानिक किए जाने के मुद्दों पर राजनीति बहस चल रही है.

मुख्यमंत्रियों और हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन को भारत के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने भी संबोधित किया. करोड़ों की संख्या में लंबित मामलों पर प्रधानमंत्री की चिंता के बारे में उन्होंने कहा कि अदालतों में जजों के खाली पदों को नहीं भरा जाना इसका एक बड़ा कारण है.

मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन ने कहा कि देश की निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 17 प्रतिशत पद रिक्त हैं. इसके लिए उन्होंने संस्थागत कमियों को दोष दिया कि जिसके कारण क़ानून के स्नातक न्यायिक सेवा के प्रति आकर्षित नहीं हो पाते हैं.

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