'भारत में चरमपंथी हमलों का ख़तरा'

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
Image caption प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान आधारित चरमपंथी संगठनों से ख़तरे की चिंता जताई

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारत के पास इस बारे में पुष्ट जानकारी है कि पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन फिर से हमलों की कोशिश कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष मुंबई हमले के बाद केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कई प्रभावी क़दम उठाए गए हैं पर ज़रूरत इस बात की है कि इस दिशा में किए गए प्रयासों पर नियमित रूप से निगरानी भी रखी जाए.

सोमवार को दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा के मसले पर मुख्यमंत्रियों की एक अहम बैठक को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संबोधित किया.

प्रधानमंत्री ने कहा, "देश में पिछले पाँच वर्षों के दौरान सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में कमी आई है. हालांकि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों को अब भी इस दिशा में और प्रभावी क़दम उठाने की ज़रूरत है."

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों और राज्य के मुख्य सचिवों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्यों के बीच बेहतर सामंजस्य और सूचानाओं के आदान-प्रदान को लेकर एक ज़िम्मेदार और गंभीर रुख़ की ज़रूरत है.

आंतरिक सुरक्षा का मसला

इससे पहले केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि देश के सामने सूखे और बाढ़ की समस्या भी सिर उठाकर खड़ी हैं लेकिन इस बैठक में वो अपना ध्यान आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर ही केंद्रित रखना चाहते हैं.

उन्होंने कहा, "देश की आंतरिक सुरक्षा को मुख्य रूप से तीन चीज़ों से ख़तरा है. पहला चरमपंथ, दूसरा पूर्वोत्तर में उग्रवाद और तीसरा नक्सलवाद. इस दिशा में वर्ष की शुरुआत में मुख्यमंत्रियों की बैठक में जो फ़ैसले किए गए थे उस दिशा में कुछ सकारात्मक प्रगति हुई है पर और प्रयास किए जाने की ज़रूरत है."

उन्होंने सीधे तौर पर पूर्वोत्तर राज्यों की सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में इस दिशा में कुछ ज़्यादा कोशिश नही की गई है.

प्रधानमंत्री ने मणिपुर, असम और नगालैंड का नाम लेते हुए कहा कि पूर्वोत्तर के कुछ राज्य अलगाववादियों के आगे घुटने टेक रहे हैं, यह ग़लत है. साथ ही यह समझने की भी ज़रूरत है कि राज्यों को अपने स्तर पर बनी रणनीतियों के आधार पर ही आगे बढ़ने का काम करना होगा.

उन्होंने कहा कि केंद्र की ओर से जो योजनाएँ और प्रयास किए जा रहे हैं उनके प्रति राज्यों को और गंभीर होकर सामने आने की ज़रूरत है.

अपने भाषण मे गृहमंत्री का विशेष ध्यान पुलिस सुधार पर रहा. उन्होंने कहा कि तीनों ही आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों के लिए हमारे पास पहला व्यक्ति पुलिसकर्मी ही है. ऐसे में उसको पर्याप्त संसाधन और तकनीक से तैयार करना ज़रूरी है. पुलिसबलों की आवश्यकता से कम तादाद भी एक चुनौती है. रिक्त पदों पर नियुक्तियों को करने की ज़रूरत है.

गृहमंत्री ने बताया कि सोमवार की शाम को नक्सल प्रभावित राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के साथ अलग से एक बैठक की जा रही है.

सुरक्षा पर सख़्त

दो दिन पहले ही भारत के 63वें स्वतंत्रता दिवस समारोह पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि मुंबई पर पिछले साल नवंबर में हुए हमलों के बाद केंद्र सरकार ने आतंकवाद से निपटने के लिए कई क़दम उठाए हैं और केंद्र सरकार नक्सल गतिविधियों से निपटने के लिए अपनी कोशिशों को दोगुना करेगी.

पिछले कुछ महीनों के दौरान देश में नक्सली हमलों में तेज़ी आई है. कई राज्यों में पुलिस और सुरक्षाबलों के दावों को खोखला साबित करते हुए देश में आम चुनावों के दौरान नक्सलियों ने कई हमले किए थे.

केंद्र और राज्य सरकारें भी कभी खुले तो कभी दबे स्वरों में नक्सलवाद की गंभीरता की बात कहती रही हैं.

प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को अपने भाषण में ये तक कहा था कि नक्सलवादियों को समझना चाहिए कि इस लोकतंत्र में बंदूक के ज़रिए अपनी असहमति के लिए आवाज़ उठानेवालों के लिए कोई जगह नहीं है और उनके ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठाए जाएंगे. साथ ही यह भी कहा था कि नक्सलवाद की समस्या के पीछे जो कारण हैं, उन्हें भी दूर करने की ज़रूरत है. इसी के ज़रिए मूल रूप से नक्सलवाद का हल निकलेगा.

मुख्यमंत्रियों की बैठक में आंतरिक सुरक्षा के गंभीर मामलों, जैसे क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जा रहे उपायों, तटीय सुरक्षा के लिए उठाए गए क़दमों और पुलिस, ख़ुफ़िया विभाग को चुस्त-दुरुस्त रखने पर विचार विमर्श हो रहा है.

इसी साल जनवरी में मुख्यमंत्रियों की जो बैठक हुई थी उसमें फ़ैसला हुआ था कि भारत के 7200 किलोमीटर लंबे तट पर सुरक्षा के इंतज़ाम कड़े किए जाएंगे और पुलिस चौकियों की संख्या बढ़ाए जाने के अलावा गश्ती नौकाओं की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.

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