जसवंत के निष्कासन का मतलब

जसवंत सिंह
Image caption गुरुवार को जसवंत की भाजपा सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की गई

भारत के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री रह चुके - जसवंत सिंह को उनकी किताब - 'जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस' में मोहम्मद अली जिन्ना और सरदार पटेल के बारे में विचार व्यक्त करने पर भारतीय जनता पार्टी से निकाल दिया गया है.

जसवंत सिंह को पार्टी से निकाले जाने का क्या मतलब है? इससे भाजपा की दिशा और दशा के बारे में क्या संकेत मिलते हैं?

भाजपा में ये बात सभी को पता थी कि जसवंत सिंह जिन्ना के बारे में कुछ लिख रहे हैं. तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उसी समय उनसे पूछना चाहिए था कि वे क्या लिख रहे हैं?

लेकिन तब पार्टी के किसी नेता ने ये पूछने या जानने की ज़रूरत नहीं समझी, और अब किताब सामने आने के बाद अचानक उन्हें पार्टी से निष्कासित कर देना तो कुछ ज़्यादती ही लगती है...

हालांकि जिस तरह से जिन्ना को भाजपा की विचारधारा में जिस तरह से 'एक शैतान के तौर पर देखा जा रहा है, ऐसे में जसवंत सिंह को भी इस मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए था कि जिन्ना की तारीफ़ करने वाली उनकी किताब को पार्टी स्वीकार करेगी.'

'सोची समझी रणनीति'

जहाँ तक उनके निष्कासन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघर का हाथ होने की बात है, तो सिर्फ़ उसे ही दोषी नहीं ठहराना चाहिए. वास्तव में मुझे तो ये सारा मामला सोची समझी रणनीति का आभास देता है.

भाजपा की चिंतन बैठक से ठीक एक दिन पहले जिस तरह से आरएसएस प्रमुख ने नेतृत्व परिवर्तन की बात कहकर आडवाणी के लिए संकट खड़ा किया था, जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल देने के बाद अब उस प्रकरण का रुख़ दूसरी ओर मुड़ गया है.

अब चिंतन बैठक का मुख्य एजेंडा जसवंत सिंह हो गए हैं और नेतृत्व परिवर्तन वाले मुद्दे से ध्यान हटा दिया गया है.

'वाजपेयी युग ख़त्म'

अगर ये कहा जाता है कि आडवाणी ने भी जिन्ना का महिमामंडन किया था लेकिन उन्हें कोई सज़ा नहीं मिली जबकि जसवंत सिंह के साथ ज़्यादती हुई है, तो ये ठीक नहीं है.

पहली बात तो यह कि आडवाणी को भी पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा था और दूसरा यह कि आडवाणी का क़द और पार्टी में उनका महत्व जसवंत सिंह की तुलना में कहीं ज़्यादा है.

वास्तव में भाजपा में जो कुछ भी हो रहा है उससे तो यही कहा जाना चाहिए कि अब पार्टी में वाजपेयी युग ख़त्म हो चला है.

वास्तव में भाजपा को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए उदारवादी और कट्टर - दोनों ही चेहरों की ज़रूरत है.

यदि पूरी तरह से भाजपा उदारवादी चेहरा अपनाए तो उसका ख़ासा कट्टरपंथी जनसमर्थन उससे छूट जाता है. ख़ुद आडवाणी इस कोशिश में विवादों में उलझ गए थे.

दूसरी ओर सिर्फ़ कट्टरपंथी सोच के ज़रिए उसे सत्ता का रास्ता नहीं दिख रहा है. भारतीय जनता पार्टी आज इसी दुविधा में फंसी हुई है.

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