क़ैदी सीख रहे हैं कश्मीरी कढ़ाई

  • 20 अगस्त 2009
कढ़ाई सीखते कै़दी
Image caption बांग्लादेश के ये क़ैदी जम्मू जेल में कढ़ाई सीखकर वापस जाने के बाद बेहतर जीवनयापन की उम्मीद कर रहे हैं

आजीविका चलाने के लिए कई बार लोगों को नियम-क़ानून तोड़ने पड़ते हैं और कई बार तो सीमा लाँघकर दूसरे देश तक जाना पड़ता है.

बांग्लादेश में मुश्किलों का सामना कर रहे सैकड़ों लोग भारत में पैसे कमाने की चाहत में अवैध रूप से पहुँच जाते हैं.

इनमें से कई लोग या तो अवैध रूप से भारत में ही रह जाना चाहते हैं और कई ऐसे हैं जो आगे फिर अवैध रूप से सीमा पार करके पाकिस्तान पहुँचना चाहते हैं.

लेकिन उनमें से कई लोगों को सीमा सुरक्षा बल के जवान पकड़ लेते हैं और वे जेल पहुँच जाते हैं.

जम्मू शहर में स्थित ज़िला जेल में बांग्लादेश और बर्मा के ऐसे 100 से ज़्यादा लोग बंद हैं. जेल अधिकारियों ने अब उन क़ैदियों को विश्व प्रसिद्ध कश्मीरी कढ़ाई सिखाना शुरू किया है जिससे वे जब अपनी सज़ा पूरी करें तो लौटकर इस कला के ज़रिए कुछ कमाई कर सकें.

जेल में बंद ऐसे क़ैदियों में से एक अयूब नबी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वह एक बहुत ही ग़रीब परिवार से हैं.

उन्होंने बताया, "ग़रीबी की वजह से मैंने सोचा कि सीमा पार करके भारत जाऊँ और वहाँ मज़दूरी कर लूँ मगर हम 10 लोगों के समूह को पुलिस ने पकड़ लिया."

एजेंट

मोहम्मद जुनैद का कहना है कि बांग्लादेश में ऐसे एजेंट हैं जो लोगों को इस तरह से भारत भेजते हैं. जुनैद के मुताबिक़, "वे हमें कुछ नौकरी भी दिलाने का भरोसा देते हैं."

उसने बताया कि उनके गुट में 20 लोग थे जिनमें से पाँच पकड़े गए. दरअसल जुनैद और उसके चार साथी कुछ दिनों तक जम्मू के नज़दीक़ अर्निया गाँव में मज़दूरी करते रहे. लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

ऐसे ही एक क़ैदी नूर नबी का कहना था, "बांग्लादेश काफ़ी ग़रीब देश है और उसके ऊपर वहाँ आने वाली बाढ़ और समुद्री तूफ़ान क़हर बरपाते हैं. इसकी वजह से हमें अवैध रूप से भागकर इधर आना पड़ता है."

उनके परिवार में माँ-बाप, छह भाई और दो बहनें हैं.

अयूब बताते हैं कि उन्होंने जेल में दो हफ़्तों में कश्मीरी कढ़ाई सीखी और उसके बाद से वे न जाने कितने पर्दे, चादरें और महिलाओं के सूट बना चुके हैं.

ये सभी समझते हैं कि उन्होंने न सिर्फ़ एक बेहतरीन कला सीखी है बल्कि उसकी वजह से उनकी गुज़र-बसर भी आसान हो जाएगी.

जेल अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आसिफ़ मोहम्मद कहते हैं, "जेल की सज़ा हमारे लिए तो वरदान ही बन गई क्योंकि अब हम कश्मीरी कढ़ाई सीख गए हैं जिससे बांग्लादेश लौटकर हम अब रोटी भी कमा सकते हैं. ये तो कश्मीर का ख़ूबसूरत तोहफ़ा बांग्लादेश ले जाने जैसा है."

उनमें से ज़्यादातर अब जीवन को लेकर काफ़ी आश्वस्त हैं. इनायत अली कहते हैं, "लौटने के बाद हम ख़ुद या तो कढ़ाई दूसरों को सीखा सकते हैं या कढ़ाई करके, उन्हें बेचकर पैसे कमा सकते हैं. कम से कम हमारी कमाई अब तय है."

बेहतर आजीविका

इन लोगों को कढ़ाई सिखाने वाले हैं एक कथित चरमपंथी किश्तवाड़ ज़िले के मोहम्मद यासिन.

उन पर अभी मुक़दमा चल रहा है. वह कहते हैं, "मैं इस कढ़ाई के बारे में कुछ हद तक जानता था और फिर जेल पहुँचकर उसमें महारत हासिल कर ली. मुझे अब तो याद भी नहीं कि कितने लोगों को मैं ये कला सिखा चुका हूँ."

Image caption ये क़ैदी आजीविका कमाने के लिए अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते हैं

यासिन का कहना है कि उन क़ैदियों को शुरू में परेशानी होती थी क्योंकि क़ैदियों को हिंदुस्तानी नहीं आती थी मगर अब वे भी हिंदुस्तानी सीख गए हैं और उनसे यासिन भी बांग्ला सीख गए हैं.

जम्मू ज़िला जेल की अधीक्षक रजनी सहगल का इस बारे में कहना था, "हमारी कोशिश ये है कि जब ये क़ैदी यहाँ से छोड़े जाएँ तो इनकी दुनिया फिर कहीं खो न जाएँ. इसके ज़रिए उन्हें ऐसी कला सिखाने की कोशिश है जिससे वे जीवन चला सकें."

उनके मुताबिक़ ये लोग आजीविका कमाने ही सीमा पार करके आए थे. लेकिन अब उनके पास एक ऐसी कला है जिससे वे कमाई कर सकते हैं.

अब वे क़ैदी मिलकर एकसुर में गुनगुनाते भी हैं जिसका संदेश होता है कि अब वे वापस लौटकर ढाका की मलमल पर ये कढ़ाई करेंगे और जेल अधीक्षक के लिए वो उपहार लेकर आएँगे.

लेकिन इस बार आना क़ानूनी तरीक़े से होगा यानी पासपोर्ट के ज़रिए.

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