भाजपा में अंतरकलह: एक विश्लेषण

भाजपा से निष्कासित जसवंत - आडवाणी और राजनाथ के साथ
Image caption सत्ता छिन जाने के बाद से भाजपा में समय-समय पर अंतरकलह होती रही है

आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद, वरिष्ठ नेताओं के पत्र लिखकर नेतृत्व से असहमति जताने और फिर जसवंत सिंह के पार्टी से निष्कासन से भाजपा में अंतरकलह बढ़ गई है. इस आंतरिक संकट की झलक अरुण शौरी के नेतृत्व पर तीखे प्रहारों से भी मिलती है.

भाजपा की इस स्थिति के मुख्य कारण क्या हैं और पार्टी किस दिशा में बढ़ रही है?

मेरा मानना है कि भाजपा की अंतरकलह विचारधारा की लड़ाई चाहे फ़िलहाल यह खेमों की लड़ाई दिख रही है.

आज के संदर्भ में भाजपा को यह तय करना है कि वह राष्ट्रीयता को किस तरह से परिभाषित करती है और यही उसकी विचारधारा की लड़ाई है.

हमें यह समझ कर चलना चाहिए कि आरएसएस के बिना भाजपा का कोई अस्तित्व नहीं है. यदि आरएसएस का समर्थन न रहा, तो वह भी हिंदू महासभा की तरह छोटी सी पार्टी बन कर रह जाएगी.

सुधार की प्रक्रिया की शुरुआत

यदि भाजपा लोकसभा चुनाव जीत जाती तो हो सकता है कि स्थिति इस मोड़ तक न पहुँचती.

भाजपा ने अपनी मूल विचारधारा वर्ष 1996 से छोड़नी शुरु कर दी थी. वर्ष 1996 से वर्ष 2004 तक पार्टी के समर्थकों और शुभचिंतकों को लगने लगा था कि भाजपा कांग्रेस की 'कार्बन कॉपी' बनने लगी है.

वर्ष 2009 के चुनाव से क़रीब दो साल पहले भाजपा के कुछ समर्थकों के बीच मंथन हुआ और दो धाराएँ थीं - भाजपा को ख़ारिज कर नई पार्टी बनाई जाए या फिर भाजपा में सुधार लाया जाए.

राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ ने वर्ष 2007 में फ़ैसला किया कि नई पार्टी नहीं बनानी है और भाजपा में ही सुधार लाना है. मेरी समझ है कि आरएसएस को इंतज़ार था कि 2009 में क्या होता है?

अब जब भाजपा हार गई है तो सुधार की प्रक्रिया शुरु होनी है और यह तो केवल उसकी शुरुआत है.

मेरा मानना है कि जो लोग विचारधारा से दूर हुए हैं उन्हें बाहर जाना पड़ेगा और नया नेतृत्व आएगा.

हो सकता है नवंबर-दिसंबर में पार्टी की कमान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के हाथ में न रहे. मेरा अपना मानना है कि इस भूमिका को निभाने के लिए सुषमा स्वराज या बाल आप्टे में से कोई सामने आ सकता है.

लेकिन ये सुधार की प्रक्रिया लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में ही चलेगी.

ये नवंबर-दिसंबर तक चलेगी जब तक अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लोग बहुत डरे हुए हैं और अनेक लोग अपना होशोहवास खो बैठे हैं क्योंकि उन्हे डर है कि आरएसएस उन्हें बेदख़ल कर सकता है.

राष्ट्रीयता, देशभक्ति और भारतीयता की परिभाषा

चाहे भाजपा हो या आरएसएस, उसे तय करना है कि राष्ट्रीयता, देशभक्ति और भारतीयता को वे किस तरह से परिभाषित करते हैं.

इस पर मतभेद हैं और अलग-अलग नज़रिए हैं.

पाकिस्तान में मीनार-ए-पाकिस्तान पर 1998-99 में वाजपेयी ने फूलमाला चढ़ा कर जिस प्रकरण की शुरुआत की थी वह जसवंत सिंह की किताब और निष्कासन के साथ पूरा हुआ है. ये भाजपा की मूल विचारधारा के ख़िलाफ़ था.

हालाँकि संदेश ये देने की कोशिश की गई थी कि पाकिस्तान के मुसलमानों को बताया जाए कि 'हम आपके देश के ख़िलाफ़ नहीं हैं' - और उसके ज़रिए भारतीय मुसलमानों को संदेश दिया जाए....

इस पूरी प्रस्तावना में ही खोट है.

दूसरी ओर हिदुत्व की विचारधार की परिभाषा नहीं हुई है - जो आरएसएस कहे वहीं हिंदुत्व है, इस पर भी अनेक लोगों ने सवाल उठाए हैं.

जहाँ तक आरएसएस-भाजपा के रिश्तों की बात है तो आरएसएस ने स्वदेशी, राष्ट्रीयता के सवाल उठाए हैं और इन सवालों पर हिंदू-मुस्लिम संबंधों का भी साया है.

यदि भाजपा के आरएसएस के सहयोग के बिना चलने की कल्पना की जाए तो आज के नेतृत्व में चाहे आडवाणी हों या राजनाथ, कोई ऐसा नेता नज़र नहीं आता जो आरएसएस के आशीर्वाद या सहयोग के बिना एक कदम भी चल सके.

भाजपा के नेतृत्व ने पार्टी को ऐसा नहीं बनाया जो अपने पैरों पर खड़ी हो सके. जो एक राजनीतिक दल की स्वायत्तता होती है, उसके तहत वह ख़ुद काम कर सके....और इसीलिए ये परिस्थिति पैदा हुई है.

हो सकता है कि भविष्य में ऐसा कोई भाजपा नेता आए जो आरएसएस से स्वतंत्र होकर चल सके लेकिन ऐसा फ़िलहाल संभव नहीं लगता है.

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