यूपी में दिमागी बुखार का कहर जारी

अस्पताल
Image caption यूपी के पूर्वी ज़िलों में पिछले की बरसों से दिमागी बुखार से बच्चों की मौतें हो रही हैं.

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्वांचल में दिमागी बुखार का कहर जारी है.

अधिकारियों के अनुसार पिछले 24 घंटों में कम से कम सोलह और बच्चे इस बीमारी से ग्रसित होकर अस्पतालों में भर्ती हुए और इनमे से दो की मृत्यु हो गई.

इस साल बीमारी का प्रकोप अभी तक मुख्य रूप से तराई और पूरब के सोलह जिलों में फैला है.

अधिकारियों का कहना है कि बीमारी की रोकथाम के लिए पानी के शुद्धिकरण और मच्छर मार आने के लिए कीटनाशक छिड़काव किया गया है.

इस साल अब तक कम से कम एक हजार मरीज प्रभावित हुए हैं और 200 से अधिक की मौत हो चुकी है लेकिन राज्य सरकार ने इस पर काबू पाने के लिए अभी तक कोई विशेष अभियान शुरू नहीं किया है.

बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार भारत सरकार इस बीमारी से प्रभावित जिलों में बच्चों को टीका लगाने में राज्य सरकार की ढिलाई पर चिंतित है.

केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी हालत का जायजा लेने स्वयं अगले हफ्ते दौरे पर आ रहे हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में टीकाकरण कार्यक्रम के सहायक आयुक्त डाक्टर अनिल कुमार ने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महा निदेशक को भेजे एक पत्र में कहा है कि दिमागी बुखार के जिन 677 मरीजों की जांच की गई इनमे से केवल 17 को जापानी इंसेफेलाइटिस के टीके लगे थे. इसका मतलब यह है कि प्रभावित जिलों में नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में जापानी इन्सेफेलाइटिस का टीका प्रभावी ढंग से शामिल नही किया गया.

भारत सरकार ने कहा है कि अगर राज्य सरकार को कोई और जरूरत है तो वह मदद करने को तैयार है.उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी वीएस निगम का कहना है कि भारत सरकार से टीके मिल गए हैं और अब टीकाकरण शुरू किया जा रहा है.

बहरहाल स्वास्थ्य निदेशालय के अधिकारी ने माना कि वस्तव में कितना टीकाकरण हुआ इसकी रिपोर्ट जिलों से प्राप्त नही हो रही जबकि कई बार पत्र लिखे गए.

जानकारी का अभाव

दरअसल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं बहुत ख़राब हालत में है इसलिए यहाँ तीन चौथाई से ज्यादा बच्चे नियमित टीकाकरण से वंचित रहते हैं. इस कारण यहाँ खसरे जैसी बीमारी से भी 45 बच्चे मर चुके हैं.

पता चला है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी डाक्टर वीके रैना अगले सोमवार से चार दिन के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर आ रहे हैं.

राजधानी लखनऊ के करीब बाराबंकी , गोंडा , बलरामपुर और बहराइच आदि जिलों के मरीज इलाज के लिए लखनऊ मेडिकल कालेज पहुँच रहे हैं , जबकि ज्यादातर पूर्वी जिलों के मरीज गोरखपुर मेडिकल कालेज जा रहे हैं.

अकेले गोरखपुर मेडिकल कालेज में इस साल अब तक 180 बच्चे मर चुके हैं जबकि लखनऊ मेडिकल कालेज में कम से कम तेरह बच्चे मौत का शिकार हुए.

बहुत से बच्चे घर पर ही रास्ते में , प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या नर्सिंग होम में भी दम तोड़ देते हैं , जिनका जिक्र सरकार के रिकार्ड में होता ही नहीं.

Image caption 2005 में इस बीमारी से 1500 बच्चे मरे थे और इस साल अब तक 200 बच्चों की मौत हो चुकी है.

बाराबंकी जिले के जहांगीराबाद से गयाप्रसाद अपने तीन साल के पोते शिवांशु को लेकर लखनऊ मेडिकल कालेज आए हैं . गयाप्रसाद का कहना है कि शिवांशु को शनिवार से दिमागी बुखार है , पर अभी तक आराम नही हुआ.

गयाप्रसाद का कहना है कि उसके पोते को दिमागी बुखार का टीका नही लगा था.

एक जूनियर डाक्टर स्नेहा टंडन का कहना है कि बहुत से लोगों को अभी जानकारी भी नही है कि दिमागी बुखार का टीका लगता है.

लोगों में जानकारी के अभाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य सरकार ने अभी तक इसके बारे में कोई बड़ा अभियान नही चलाया. राज्य सरकार की तरफ से स्वाइन फ्लू के बारे में रोज प्रेस बयान जारी हो रहा है, अस्पतालों को संसाधन दिए जा रहे हैं लेकिन जापानी सरकार के बारे में वह अब तक उदासीन है.

मेडिकल कालेज लखनऊ में बाल रोग विभाग की प्रोफेसर रश्मि कुमार का कहना है कि सरकार को अपनी देश की बीमारियों पर ध्यान देना चाहिए, जबकी इस समय ध्यान न फ्लू पर लगा है.

वो कहती हैं, ‘‘ यहाँ तक कि नॅशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ वाइरॉलॉजी पुणे भी केवल स्वाइन फ़्लू पर लगा हुआ है जबकि इन्सेफ़ेलाइटिस से ज्यादा मौतें हो रही हैं. आजकाल बहुत बुरा हाल है , इन्सेफ़ेलाइटिस का, एक एक दो दो दिन में बहुत सीरियस हो रहे हैं मरीज , मरणासन्न हालत हो जाती है.’’

उत्तर प्रदेश में इस बीमारी को पैर पसारे 31 साल हो गए. दस हजार से ज्यादा बच्चे मर चुके हैं और इसका कई गुना जीवन भर के लिए विकलांग . इसके लिए मुख्य रूप से जेई वायरस को जिम्मेदार माना जाता है. लेकिन उसके साथ और भी कई वायरस इस इलाके में सक्रिय हैं . मगर अभी तक उन सबकी पहचान भी नही हो पायी है . टीका बनाना और इलाज होना तो दूर की बात है.

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