'लोकतंत्र में न्यायधीश समेत सभी बराबर'

  • 27 अगस्त 2009
सुप्रीम कोर्ट
Image caption सुप्रीम कोर्ट के जजों का संपत्ति सार्वजनिक करने के फ़ैसले का स्वागत हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी संपत्तियों को सार्वजनिक करने का फ़ैसला किया है. इस बारे में हमने बात की मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायधीश जस्टिस सीएस धर्माधिकारी से. प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश

सुप्रीम कोर्ट के जजों का ये कहना कि वो संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करेंगे, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है.

संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने में कोई हर्ज नहीं है. मैं मानता था कि शुरू से ही बिना इसकी चर्चा में गए न्यायमूर्तियों को इसे मान लेना चाहिए था क्योंकि न्यायमूर्तियों के जीवन में छिपाने लायक कुछ नहीं होना चाहिए. उनके जीवन में पारदर्शिता होनी चाहिए.

इन सबमें सिर्फ़ एक मुश्किल है. संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने के बाद अगर कोई इसे चुनौती दे और ऐसा हो कि न्यायमूर्ति को कटघरे में खड़ा होकर खु़द को निर्दोष साबित करना पड़े, ऐसी नौबत नहीं आनी चाहिए.

इस अड़चन से निपटने के लिए रास्ता ढूंढना पड़ेगा.

मेरा मानना है कि लोकतंत्र में जो नियम बाकी सब पर लागू होते हैं, वो न्यायधीशों पर भी लागू होने चाहिए.

संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने का निर्णय अगर पहले ही ले लिया जाता तो ज़्यादा अच्छा होता.

क्या ये मानना ठीक होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों का ये क़दम मीडिया औऱ जनता के दबाव की वजह से आया है?

जनता और मीडिया दोनो का ही दबाव था. साथ ही संसद में न्याय प्रक्रिया में सुधार को लेकर जो विधेयक आया था उसमें ये प्रावधान था कि न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश के पास संपत्ति का ब्योरा जमा कर देंगे, लेकिन उसको सार्वजनिक नहीं करेंगे.

उन्होंने इसका कारण ये दिया था कि अगर जानकारी को चुनौती दी गई तो उन्हें खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कटघरे में खड़ा होना पडे़गा. इससे एक अलग तरह का झंझट खड़ा हो सकता था.

संपत्ति को सार्वजनिक करने पर कुछ आपत्तियाँ सामने आई थीं. जानकारी का दुरुपयोग होने की संभावना जताई गई थी. क्या आप सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की इस बात से सहमत थे कि संपत्ति के ब्योरे को सार्वजनिक करने से जानकारी का दुरुपयोग हो सकता था?

मैं सहमत तो नहीं था लेकिन ये सोचता था कि ये सोचने लायक चीज़ है. जिस तरह से आजकल लोग पीआईएल करते हैं और अगर उन्हें किसी के पीछे लगना हो तो वो पीछे लग जाते हैं, उसको सोचते हुए मुझे ऐसा लगता है कि इन सबसे निपटने के लिए रास्ता निकालना चाहिए.

हमने न्यायधीशों से संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग की थी. लेकिन उसके साथ जो परहेज होंगे, अगर लोग उन परहेजों का पालन करेंगे तो मुझे लगता है कि न्यायाधीशों के मन में जो समस्याएं हैं, वो निकल जाएँगी.

याद रखना होगा कि किसी भी अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ रहता है.

सुप्रीम कोर्ट के जजों का ये भी कहना है कि हालांकि वो संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक कर रहे हैं, कोई भी ब्योरे पर सवाल नहीं उठा सकता. इससे क्या पेचीदगियाँ पैदा होंगी?

एक बार अगर आप वेबसाइट पर संपत्ति का ब्योरा देंगे और हर इंसान उसको देख पाएगा, तो सवाल उठ सकते हैं. सवाल ये उठ सकता है कि आपने संपत्ति का पूरा ब्योरा दिया है कि नहीं... कोई ये कह सकता है कि संपत्ति का ब्योरा सही नहीं है... तो ऐसे कई सवाल उठ सकते हैं.

लेकिन मैं ये मानता हूँ कि उन सवालों का सामना करने की शक्ति न्यायमूर्ति में होनी चाहिए. और अगर ब्योरा सही है तो डरने की कोई बात नहीं है.

क्या जजों के इस कदम से न्यायालय के कामकाज में परेशानियाँ आएंगी?

इससे कामकाज में नहीं लेकिन व्यक्तिगत परेशानी होगी. अगर किसी न्यायमूर्ति के जीवन में पारदर्शिता है और छुपाने लायक कुछ नहीं है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई अड़चन आएगी.

जब हम कह रहे हैं कि न्यायमूर्तियों को संपत्ति का ब्योरा देना चाहिए और लोग इसका आग्रह कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि लोगों के मन में शंका थी. अगर ये शंका निकल जाएगी, तो न्यायमूर्ति की इज़्ज़त बढ़ेगी.

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