जिन्ना और जसवंत- दार्जिलिंग कनेक्शन

किताब की  दुकान
Image caption दार्जिंलिंग में पुस्तक की दुकानों में जसवंत सिंह की पुस्तक की भारी मांग है.

अपनी पुस्तक में जिन्ना की सराहना करने वाले पूर्व भाजपा नेता जसवंत सिंह और मोहम्मद अली जिन्ना में क्या समानता है?

यह सवाल सुन कर आश्चर्य हो सकता है. लेकिन दोनों नेताओं का नाता पश्चिम बंगाल के पर्वतीय शहर दार्जिलिंग से है. जसवंत सिंह तो दार्जिलिंग लोकसभा सीट से सांसद हैं. लेकिन यह तथ्य शायद कम लोगों को ही पता होगा कि दार्जिलिंग जिन्ना की ससुराल भी है.

जिन्ना का दूसरी पत्नी रत्ना बाई इसी पर्वतीय शहर की रहने वाली थी. इन नेताओं के दार्जिलिंग कनेक्शन की वजह से ही पर्वतीय इलाके में जसवंत सिंह की पुस्तक किसी हॉट केक की तरह बिक रही है.

इलाके में इस पुस्तक की भारी मांग का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फिलहाल यह किसी भी स्टोर पर उपलब्ध नहीं है. अब तक इसकी सैकड़ों प्रतियां बिक चुकी हैं और रोजाना सैकड़ों लोग बुक स्टोर्स से मायूस हो कर लौट रहे हैं.

दार्जिलिंग में पुस्तक विक्रेताओं का कहना है कि जसवंत को भाजपा से निकाले जाने और जिन्ना के दार्जिलिंग कनेक्शन के बारे में पता चलने पर लोगों में अचानक इसके प्रति भारी दिलचस्पी पैदा हो गई.

दार्जिलिंग में किताबों की सबसे पुरानी दुकान ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर्स के इंद्र मणि दीवान कहते हैं कि ‘शुरूआत में प्रकाशक ने हमें तीन प्रतियां भेजी थी. लोग उसके पन्ने पलट कर देखते तो थे. लेकिन किसी ने खरीदा नहीं. विवाद भड़कने पर दो घंटे के भीतर ही तीनों प्रतियां बिक गईं.’

वे कहते हैं ‘फिलहाल इस किताब की भारी मांग है. प्रकाशक हमारे आर्डर के मुताबिक प्रतियां नहीं भेज पा रहे हैं. इस सप्ताह तीस प्रतियां आनी हैं. लेकिन लोगों ने इस किताब की पूरी कीमत अग्रिम जमा कर दी है. यानी दुकान में पहुंचने से पहले ही यह बिक चुकी है.’

एक सवाल के जवाब में दीवान कहते हैं कि रोजाना दर्जनों लोग इस किताब के बारे में पूछने आते हैं. जिनमें विदेशी भी शामिल हैं. दार्जिलिंग में इस पुस्तक की पहली प्रति एक विदेशी पर्यटक ने ही खरीदी थी.

जिले के दूसरे शहर कालिमपोंग में भी इस किताब की भारी मांग है.

दार्ज़िलिंग कनेक्शन

काशीनाथ एंड संस के अनिल कौल बताते हैं, ‘हमने तीन सौ प्रतियों का आर्डर दिया था. लेकिन अब तक वह खेप नहीं पहुंची है.’

Image caption दार्जिंलिंग से जसवंत का रिश्ता तो है लेकिन जिन्ना का भी पुराना रिश्ता रहा है.

शहर के एक अन्य बुक स्टोर के मालिक शिशिर कहते हैं कि रोजाना सैकड़ों छात्र और विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग इस किताब की तलाश में आते हैं. लेकिन उनको मायूस हो कर लौटना पड़ता है. इसकी एक प्रति भी उपलब्ध नहीं है.

जसवंत सिंह तो इलाके के सांसद ही हैं. लेकिन लोगों की दिलचस्पी की एक प्रमुख वजह यह भी है कि जिन्ना ने दूसरी शादी दार्जिलिंग की पारसी लड़की से ही की थी.

जिन्ना अपने माता-पिता और पहली पत्नी की मौत के बाद अप्रैल 1916 में अपने मित्र सर दिनशॉ मानोकजी के साथ दार्जिलिंग आए थे. यहीं उनकी पहली मुलाकात दिनशॉ की पुत्री रत्नाबाई से हुई.

जिन्ना तब 40 साल के थे और रत्ना 16 की. जिन्ना उसे फ्रेंच सीखने में सहायता करते थे. धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे. कुछ दिनों बाद जिन्ना ने जब दिनशॉ से रत्नाबाई का हाथ मांग तो वे नाराज हो गए. उन्होंने साफ मना कर दिया और अपनी पुत्री को कभी जिन्ना से नहीं मिलने की भी हिदायत दी.

दो साल के इंतजार के बाद रत्नाबाई ने कोलकाता के जामा मस्जिद में 18 अप्रैल 1918 को इस्लाम कबूल कर लिया और अगले दिन जिन्ना के मुंबई स्थित आवास में आयोजित एक सादे समारोह में उनसे शादी कर ली.

तब तक वह कानूनन बालिग हो चुकी थी. रत्ना के घर का कोई भी सदस्य उस शादी में शामिल नहीं हुआ था.

दार्जिलिंग में एक छात्र दीपक छेत्री कहते हैं कि जसवंत और जिन्ना के दार्जिलिंलग कनेक्शन ने ही लोगों में इस पुस्तक के प्रति भारी दिलचस्पी पैदा कर दी है. दीपक को भी उस पुस्तक का इंतज़ार है.

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