मोहम्मद अज़हरुद्दीन से एक मुलाक़ात

अज़हरुद्दीन
Image caption अज़हरुद्दीन का कहना है कि क्रिकेट ही नहीं, हर चीज़ में उनके नाना का योगदान रहा.

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में इस बार ख़ास मेहमान हैं मोहम्मद अज़हरुद्दीन.

आप बड़े स्टाइलिश हैं और सफल कप्तान रहे हैं. आपके क्रिकेट के सफ़र की शुरुआत कैसे हुई?

जब मैं छह-सात साल का था. मेरे मामा भी क्रिकेट खेलते थे. घर में बैट-बॉल रखा रहता था. मैंने इनमें कुछ दिलचस्पी दिखाई तो मामा ने भी मुझे कुछ गुर सिखाए. शुरुआत में टेनिस, रबड़ बॉल से खेला. जब मैं नौवीं पास कर दसवीं में जा रहा था, तभी लाला अमरनाथ जी ने एक क्रिकेट कोचिंग शिविर लगाया. इससे मुझे बहुत फ़ायदा हुआ.

आपके टेस्ट करियर की शुरुआत तो बहुत शानदार रही. वर्ष 1984-85 में इंग्लैंड दौरे में आपने लगातार तीन शतक लगाए. ये रिकॉर्ड तो आज तक नहीं टूटा है?

मुझे तब ख़ुद समझ में नहीं आता था कि ये सब क्या हो रहा है. जब भी मैं मैदान में उतरता, रन बन जाते थे. सब परियों की कथा जैसा था. ये ख़ुदा का शुक्र और उसका कर्म है. मेरे नाना, मामा की मेहनत है जिससे मैं ऐसी शुरुआत कर सका.

तो इन तीन पारियों से आपकी दुनिया भी बदल गई होगी?

हाँ, बहुत कुछ बदल गया. मेरी परवरिश कुछ ऐसे हुई थी कि मैं थोड़ा शांत स्वभाव का था. मेरे नाना मुझे शुरू से ही कहा करते थे कि कितने भी बड़े हो जाओ, विनम्रता नहीं खोनी चाहिए. अहं को दूर रखना. मेरे दिमाग में हर वक़्त वही बात चलती थी. तो मेरा बर्ताव जैसा टेस्ट खेलने से पहले था, अब भी वैसा ही है.

आपकी सफलता में आपके नाना का बहुत योगदान रहा?

क्रिकेट ही नहीं, हर चीज़ में मेरे नाना का बहुत योगदान रहा. ऐसे मौक़े भी आए, जब भी मैं घर का कोई काम नहीं करता तब नाना घरवालों से कहते कि अज़हर अगर कोई काम न करना चाहे, तो इसका काम मैं कर दिया करूँगा.

जब आप बड़े हो रहे थे, क्रिकेट सीख रहे थे, तो आपका आदर्श क्रिकेटर कौन होता था?

शुरू से ही मुझे ग्रेग चैपल बहुत पसंद थे. मैंने अपनी आंखों के सामने तो उन्हें कभी खेलते हुए नहीं देखा, लेकिन मुझे उनका बैटिंग स्टाइल बहुत पसंद था. मैंने उनकी पारियों के वीडियो देखे थे.

जब मैंने 1984 में टेस्ट करियर की शुरुआत की, उससे ठीक पहले वो रिटायर हुए. ग्रेग चैपल ने पहले और आखिरी टेस्ट में शतक बनाया था. संयोग की बात है कि उनके साथ मेरा नाम भी जुड़ गया. मैंने भी अपने करियर की शुरुआत में शतक बनाया और अपने आखिरी मैच में भी शतक बनाया.

ग्रेग चैपल आपके हीरो रहे, लेकिन भारतीय क्रिकेट में वो विलेन बन गए. बहुत सारे विवाद हुए. आपका क्या कहना है?

Image caption अज़हर को शुरू से ही ग्रेग चैपल बहुत पसंद थे और वे उन्हें अपना हीरो मानते हैं.

पता नहीं. क्या सही है और क्या ग़लत, ये तो कहा नहीं जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि वो भारतीय क्रिकेट में प्रोफ़ेशनलिज़्म और जवाबदेही लाना चाह रहे थे, जो शायद खिलाड़ियों और बोर्ड को नागवार गुज़री. आपको तो पता ही है कि ऑस्ट्रेलिया में कितना प्रोफ़ेशनलिज़्म है. वहाँ जो अच्छा प्रदर्शन नहीं करता, उसे बाहर कर दिया जाता है.

मुझे उनसे दो-तीन बार बात करने का मौक़ा मिला. मैं कह सकता हूँ कि उन्हें क्रिकेट की बहुत समझ है और उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है. मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वो मेरे हीरो रहे हैं.

बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, अपनी पसंद का एक गाना बताएँ?

‘किसी राह में किसी मोड़ पर, कहीं चल न देना छोड़कर’ ये गाना मुझे बहुत पसंद है. अगर कभी जल्दी आउट हो जाता था तो अक्सर इसे सुनता था.

वर्ष 1990 में अचानक जब आपको कप्तान बना दिया गया तो कैसा लगा.ये सब कैसे हुआ?

मैंने भी नहीं सोचा था. जब टीम पाकिस्तान गई तो मुझे तो टीम में खेलने की भी उम्मीद नहीं थी. टीम की घोषणा कर दी गई थी और उसमें मेरा नाम नहीं था. लेकिन तभी रमन लांबा के पैर में चोट लग गई. वो नहीं खेल पाए तो मुझे मौक़ा मिला. उस मैच में मैंने पाँच कैच लपके. हालाँकि ज़्यादा रन तो नहीं बना सका, लेकिन उस मैच से मेरी बल्लेबाज़ी में एक बड़ा बदलाव आया.

ज़हीर अब्बास ने मुझे कुछ टिप्स दी और ग्रिप बदलने को कहा. उसके बाद मेरी बल्लेबाज़ी एकदम बदल गई. जहाँ पहले मुझे शतक बनाने के लिए 250 गेंद तक खेलनी पड़ती थी, वहीं अब मुझे रन बनाने के लिए ज़्यादा प्रयास नहीं करने पड़ते थे.

ज़हीर अब्बास ने तो भारत के कई गेंदबाज़ों का करियर तबाह कर दिया?

बेशक, वो बहुत ज़बर्दस्त बल्लेबाज़ थे. दरअसल, जब ज़हीर अब्बास मुझसे मिले तो उन्होंने मेरा हालचाल पूछा. मैंने उनसे कहा कि पता नहीं मेरी बल्लेबाज़ी में क्या हो रहा है. उन्होंने मुझसे कहा कि ग्रिप में कुछ बदलाव करो. उन्होंने बताया कि ग्रिप ऐसे बनाओ, इसे आज़माओ. अगर बात नहीं बनीं तो वापस पहली वाली ग्रिप पर आ जाना.

आपने ज़हीर का शुक्रिया किया?

बिल्कुल आज तक करता हूँ. अगर आपको किसी से फ़ायदा हुआ है तो ज़रूर उसकी तारीफ़ करनी चाहिए. उसमें आपका बड़प्पन है.

जब आप कप्तान बने तो खिलाड़ियों की क्या प्रतिक्रिया थी. तब तो भारतीय क्रिकेट में मुंबई, दिल्ली, बंगाल का दबदबा था?

एक तरह से मुझे इसका फ़ायदा ही हुआ. टीम में काफ़ी पूर्व कप्तान थे और मैं उनसे सलाह लेता था और हर बार लेता था. मेरे अंदर अहं नहीं था. कपिल देव, दिलीप वेंगसरकर, रवि शास्त्री, श्रीकांत थे. मुझे उनसे सलाह लेने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई. मैं समझता हूँ कि लोगों की ग़लत सोच थी कि सीनियर खिलाड़ियों के कारण मुझे परेशानी हुई.

अज़हरुद्दीन, बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें. आपकी पसंद का एक और गाना बताएँ?

फ़िज़ा के गाने मुझे बहुत पसंद हैं.

आप इतने सफलतम कप्तान रहे और आपने 14 टेस्ट मैच जीते. तो इसका क्या रहस्य था. कैसे प्लानिंग करते थे?

Image caption वीवीएस लक्ष्मण की बल्लेबाज़ी पर अज़हर का प्रभाव माना जाता है

टीम मीटिंग होती थी. सीनियर खिलाड़ियों की भी राय ली जाती थी. जब वाडेकर साहब कोच थे तो उनका नज़रिया था कि खिलाड़ियों को सिर्फ़ क्रिकेट पर ध्यान देना चाहिए.

दक्षिण अफ़्रीका के पहले दौरे पर तो वाडेकर साहब ने इतनी सख़्ती नहीं दिखाई, लेकिन 1993 के इंग्लैंड दौरे पर उन्होंने क्रिकेटरों से कह दिया कि खेल पर ज़्यादा ध्यान देना है. खिलाड़ियों ने भी उनकी बात मानी और इसके नतीजे भी दिखे.

भारतीय क्रिकेटरों का जीवन भी तो बहुत चुनौतीपूर्ण है. डिनर, पोस्ट डिनर, ज़बर्दस्त प्रशंसक, क्रिकेटरों पर फ़िदा होती लड़कियां. तो इन सबसे कैसे निपटते हैं?

ये हर व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है. मैं हमेशा खिलाड़ियों से कहता था कि जब आप मैदान पर आते हैं तो वो मेरा समय है. जो कुछ आप मैदान पर करते हैं, उसमें आपके निजी जीवन की छाया नहीं पड़नी चाहिए.

मैंने खिलाड़ियों से साफ़ कह दिया था कि आप मैदान से बाहर क्या करते हैं, मुझे उससे कुछ लेना-देना नहीं है.

मैंने राहुल द्रविड़ के साथ भी एक मुलाक़ात की. उन्होंने भी माना कि मैदान में खिलाड़ियों के बीच ऐसी बातें होती थी कि बाउंड्री के पास फलां स्टैंड में ख़ूबसूरत लड़की बैठी है. आप क्या कहते हैं?

हाँ. बिल्कुल होती हैं. खिलाड़ी भी आख़िर इंसान ही हैं. मैं तो अक्सर क्लोज़िंग फ़ील्डिंग में रहता था तो मुझे तो मौक़ा मिला नहीं. लेकिन जो खिलाड़ी बाउंड्री पर होते थे, वे ख़ूब लुत्फ़ उठाते थे. मैं उनसे कहता था कि देखो भाई, लेकिन इधर भी ध्यान रखो.

बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ?

जोधा अकबर का गाना ‘ख़्वाज़ा मेरा ख़्वाजा’ मुझे पसंद है. दरअसल, सूफ़ियाना संगीत मुझे शुरू से ही पसंद है. मैं नाना के साथ अक्सर क़व्वाली सुनने के लिए जाया करता था. बुल्ले शाह, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शान में जो सूफ़ी गाने लिखे जाते हैं, वो मुझे बहुत पसंद आते हैं.

आप अच्छे कप्तान और बल्लेबाज़ होने के साथ बेहतरीन फ़ील्डर थे?

फ़ील्डिंग में मेरी दिलचस्पी शुरू से ही थी. कई मैच तो मैं अपनी फ़ील्डिंग की बदौलत ही खेला. मैंने फ़ील्डिंग के लिए मेहनत भी बहुत की. मेरा मानना था कि फ़ील्डिंग की जितनी मेहनत की जाए, उतना अच्छा है. स्कूल के दिनों में मैं दौड़ में भी हिस्सा लेता था. मैं 100 मीटर दौड़ा करता था. इसीलिए शायद मुझे मांसपेशियों में खिंचाव जैसी समस्याएँ बहुत कम हुई.

लगता है आज भी आप अपने शरीर पर काफ़ी मेहनत करते हैं?

Image caption अज़हर ने अपनी कप्तानी के दौरान 14 टेस्ट मैच जीते थे, जोकि एक बड़ी सफलता थी

मेरा मानना है कि जैसे आप तीन वक़्त का खाना खाते हैं, उसी तरह कम से कम एक बार तो एक्सरसाइज़ करनी ही चाहिए. फ़िटनेस जीवनभर के लिए होती है. सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए ही एक्सरसाइज़ नहीं होती. कुछ लोगों की सोच होती है कि आदमी एक ही बार पैदा होता है, इसलिए अच्छा खाओ, अच्छा पीओ. लेकिन अगर आपके पास पैसा है और सेहत नहीं है तो सब बेकार है.

बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ?

‘रब ने बना दी जोड़ी’ का गाना हौले-हौले से हवा चलती है. मुझे बहुत पसंद है. शाहरुख़ ख़ान मेरे पसंदीदा अभिनेता हैं.

इतने ज़बर्दस्त करियर में अचानक मैच फिक्सिंग विवाद आया और फ़ेयरीटेल वाली लाइफ़ नाइटमेयर में बदल गई?

मुझे दुख तो हुआ. लेकिन क्योंकि मैंने ऐसा काम नहीं किया था, इसलिए कोई डर नहीं था. आप देख ही रहे हैं कि इन आरोपों का कोई सबूत नहीं है. कोई आरोप पत्र दाखिल नहीं हुआ.

मैं चाहता तो किसी का भी नाम ले सकता था, लेकिन मैंने धैर्य रखा और सब वक़्त पर छोड़ दिया. अल्लाह का शुक्र है और देखिए कि दो-तीन लाख लोगों ने मुझे लोकसभा के लिए जिताया है. अगर मैं ग़लत होता तो शायद ऐसा नहीं होता.

मैं इसको इस नज़रिये से देखता हूँ कि जो कुछ हुआ वो मेरी क़िस्मत में था. अल्लाह मेरा इम्तहान लेना चाहता था. वो किसी को कुछ देता है तो बदले में कुछ लेता भी है.

राजनीति में कैसे आए?

राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मेरे दोस्त हैं जमील भाई. उन्होंने कहा कि मुझे राजनीति में आना चाहिए. उन्होंने कहा कि आप सिर्फ़ जिम चला रहे हैं, आपको लोगों के बीच जाकर उनके लिए कुछ करना चाहिए. उन्होंने मुझे मना लिया और इस तरह मैं राजनीति में आ गया.

मुरादाबाद में अपने चुनाव प्रचार में आप बोलते थे कि मैंने 99 टेस्ट खेले हैं. आप मुझे यहाँ से जिता दो तो मैं समझूँगा कि मेरे 100 टेस्ट हो गए?

लोगों ने वैसा ही किया. जब मैं पहली बार मुरादाबाद गया था तो लोगों की इतनी भीड़ जुटी कि मुझे चार किलोमीटर का सफ़र तय करने में सात घंटे का समय लगा था. सड़क पर इतनी भीड़ होगी और वो भी मेरे लिए, ऐसा कभी नहीं सोचा था.

प्यार, मोहब्बत और लोकप्रियता, ये सब तो है राजनीति में, लेकिन सबसे ज़्यादा चिढ़ाने वाली बात क्या है?

देखिए, अगर आप चिड़चिड़ेपन की तरह देखेंगे तो हर चीज़ से आप चिढ़ेंगे. अगर कोई आदमी मेरे पास आता है और कहता है कि मैंने आपको वोट दिया, मेरा काम नहीं हुआ. तो अगर मैं चिढ़ जाऊँ तो ग़लत है. अगर मैं उसके साथ विनम्रता से पेश आऊँगा तो उसे भी अच्छा लगेगा. तो हरेक को ख़ुश करने का प्रयास करना चाहिए और उनकी दुआएँ लेनी चाहिए.

और आपके जीवन का प्यार, आपकी पत्नी संगीता, उनके बारे में सबसे अच्छी चीज़ क्या लगती है आपको?

सबसे अच्छी बात ये है कि वो घरेलू हैं और धैर्यवान हैं. मुझे उनके ये गुण बहुत अच्छे लगते हैं.

ये गुण तो बाद में पता लगे होंगे, लेकिन शुरू में तो आप उनके प्रति इसलिए आकर्षित हुए होंगे कि वो ग्लैमरस हैं और मिस इंडिया रह चुकी हैं?

मैं उनसे 1985 में भी मिला था. तब मैंने उनके साथ एक विज्ञापन भी किया था. कुछ समय तक फिर उनसे संपर्क में नहीं रहा और बहुत दिनों बाद हमारी मुलाक़ातें फिर शुरू हुईं.

अब आपके दोनों बेटे भी तो क्रिकेट खेलते हैं. आप इसका लुत्फ़ उठाते हैं?

Image caption अज़हरुद्दीन को शाहरुख़ ख़ान पसंद हैं

मैं तो क्रिकेट का हर समय लुत्फ़ उठाता हूँ. अब्बास अच्छा खेल रहे हैं. वैसे तो उनके अपने कोच हैं, लेकिन मैंने भी उनको कुछ ट्रेनिंग दी. अब्बास बाएँ हाथ से खेलते हैं और मैं दाएँ हाथ से. इसलिए मुझे अब्बास को बताने में काफ़ी मुश्किलें आईं.

आपने वीवीएस लक्ष्मण से नहीं कहा कि मेरे बच्चों को कुछ टिप्स दें?

अब्बास जहाँ प्रेक्टिस के लिए जाते हैं, लक्ष्मण भी कभी-कभी वहाँ जाते हैं. इसलिए वो भी अब्बास को टिप्स देते हैं.

लक्ष्मण आपको पसंद हैं. लोग उनकी तुलना आपसे करते हैं?

लक्ष्मण बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं. गांगुली की कप्तानी में भारत को जो भी सफलता मिली, उसमें लक्ष्मण का बहुत बड़ा योगदान रहा. तेज़ विकेटों पर उन्होंने जिस तरह रन बनाए, उसके लिए उन्हें ज़्यादा श्रेय देना चाहिए.

फ़िल्मों का शौक है आपको?

हाँ, फ़िल्में देखने का शौक है. देवदास मुझे अच्छी लगी. अमिताभ बच्चन मुझे बहुत पसंद हैं. मैंने उनकी कई फ़िल्में देखी हैं. अभिमान, मुक़द्दर का सिकंदर, दीवार, क़ुली, शराबी मुझे बहुत पसंद है. अब शाहरुख़ ख़ान और अक्षय कुमार भी मुझे अच्छे लगते हैं.

आपकी पसंदीदा अभिनेत्री?

रेखा मेरी पसंदीदा अभिनेत्री है. मौजूदा अभिनेत्रियों में कैटरीना कैफ़ बेहतरीन है. जिस तरह से विदेश से आकर उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में काम किया और ख़ुद को साबित किया, उसका श्रेय उन्हें दिया ही जाना चाहिए.

क्रिकेट खेलना मिस करते हैं?

ज़रूर मिस करता हूँ. अगर आप आजकल के क्रिकेट नियमों के बारे में मुझसे पूछेंगे तो मैं बता नहीं सकूँगा. अभी कुछ ही दिन पहले मैं एक ट्वंटी-20 मैच देख रहा था तो किसी ने मुझसे एक नियम के बारे में पूछा, तो मैंने कहा कि मैं मैच देखता हूँ, मुझे नियम पता नहीं है. अब क्योंकि कप्तान नहीं हूँ, इसलिए नियमों की फ़िक्र नहीं है.

अपने बारे में कुछ बदलना चाहें तो क्या बदलेंगे?

ज़्यादा तो नहीं. लेकिन मैं कंप्लसरी शॉपिंग को बदलना चाहूँगा. दरअसल, मेरी जेब में जितने पैसे होते हैं, वो सब ख़र्च हो जाते हैं. घड़ियों और कपड़ों का शौक तो मुझे शुरू से ही रहा है. मुझे ये अच्छा लगता है.

कोई ख़्वाहिश जो पूरा करना चाहते हों?

मैं चाहता हूँ कि मेरे राजनीति में आने से किसी को भी कुछ भी फ़ायदा होता हो तो ज़रूर करना चाहूँगा. मैं इंसानियत के लिए काम करना चाहूँगा.

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