अंतिम संस्कार किसका हुआ...

पिता और बेटा
Image caption मृत पिता ज़िदा मिलने के बाद अपने बेटे के साथ

कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले के हाबरा में रहने वाले विश्वनाथ दास की कहानी भले ही हिंदी फ़िल्मों की कहानी से मिलती-जुलती हो, लेकिन यह है बिल्कुल सच.

तीन दिन पहले एक हादसे में विश्वनाथ दास की मौत की ख़बर मिलने के बाद बेटों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया था और अब श्राद्ध की तैयारियों में जुटे थे. लेकिन श्राद्ध का न्यौता देने के लिए जब वे अपनी मौसी के घर पहुंचे तो उनको ज़बर्दस्त झटका लगा. वहां उनके मृत पिता सही-सलामत बैठे हुए थे.

दरअसल, विश्वनाथ दास की दो पत्नियाँ हैं. वह अपनी दूसरी पत्नी के साथ हावड़ा में रहते हैं. लेकिन पहली पत्नी से हुए तीनों बेटे उसी ज़िले के बारासात में रहते हैं. तीनों बेटे विवाहित हैं.

बीते मंगलवार को वह अपने बेटों के साथ कुछ दिन बिताने के लिए उनके घर जाने वाले थे. लेकिन बीच में ही किसी को बिना बताए वह अपनी साली के घर चले गए.

दुर्घटना

दास के मझले पुत्र बाप्पा कहते हैं, "पापा को मंगलवार को हमारे घर आना था. लेकिन उसी दिन किसी ने मेरे बड़े भाई पलाश के मित्र राजू दास को मोबाइल पर फ़ोन किया कि एक अधेड़ व्यक्ति की लोकल ट्रेन से गिर कर मौत हो गई है और शव अशोक नगर स्टेशन पर रखा है."

उनकी जेब से मिले कागज़ पर राजू का मोबाइल नंबर और पलाश का नाम लिखा था. वही देख कर किसी ने राजू को फोन किया था. वह बताते हैं कि राजू से सूचना मिलते ही हम अशोकनगर स्टेशन पर पहुंचे.

दास के बड़े बेटे पलाश ने बताया, "स्टेशन पर पिताजी की उम्र और क़द-काठी के ही एक व्यक्ति मृत पड़े थे. उसका चेहरा इस क़दर विकृत हो गया था कि पहचानना मुश्किल था. लेकिन बाकी चीज़ें मिलती देख कर हमने अपने पिता के शव के तौर पर उसकी शिनाख़्त कर ली. वहां तमाम औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव का अंतिम संस्कार कर दिया."

अपनी सौतेली मां यानी दास की दूसरी पत्नी से उन तीनों के संबंध इस क़दर खराब थे कि उन्होंने दास की मौत की सूचना तक उसे नहीं दी.

तीनों बेटों ने उसके बाद श्राद्ध की तैयारियां शुरू कर दीं. इसके लिए पंडाल बन रहा था और न्योता भी बंटने लगा था. इसी सिलसिले में बड़ा बेटा पलाश जब न्योता देने अपनी मौसी के घर पहुंचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. उसके पिता वहां कुर्सी पर बैठे थे.

ख़ुशी पर अपराधबोध

Image caption बेटा अपनी मौसी के यहाँ पिता के श्राद्ध का न्योता देने पहुँचा तो पिता को ज़िंदा पाया.

पलाश कहते हैं, "हम अब भी इस झटके से नहीं उबर सके हैं. हम तीनों ने ही नहीं, परिवार के तमाम लोगों ने उस शव को देख कर उसकी शिनाख़्त की थी. हम इस बात से अचरज में हैं कि दो लोगों की क़द-काठी में इतनी समानता कैसे हो सकती है."

वह कहते हैं "पिता के ज़िंदा होने की हमें खुशी तो है. लेकिन हम भारी अपराधबोध से जूझ रहे रहे हैं."

पलाश कहते हैं कि अब सवाल यह है कि पिता के बदले हमने किस व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर दिया और वह हमारे पिता की तरह कैसे दिखता था. शायद उस व्यक्ति के परिजनों को उसके बारे में कभी पता भी नहीं चलेगा.

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