अब आई सास की बारी

अब नहीं सहेंगी सास भी
Image caption बहुओं का विरोध करने के लिए अब सास उतरीं सड़क पर

कथित तौर पर अपनी बहुओं के हाथों अत्याचार सहने के खिलाफ भारत की कुछ सासों का एक दल अब एकजुट होकर सामने आया है.

बंगलुरु में शुरू हुए अखिल भारतीय सास सुरक्षा मंच यानि (एआईएमपीएफ़) में पचास महिलाएं शामिल हुई हैं.

इस मंच की एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया है कि हालाँकि युवा वर्ग की महिलाओं की सुरक्षा के लिए 15 तरह के कानून हैं, लेकिन एक भी ऐसा कानून नहीं है जो कि बहुओं के हाथों ज़ुल्म झेल रही सासों की सुरक्षा करता हो.

भारत के राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस समस्या को माना है.

आयोग का कहना है कि कई बार ससुरालवालों के ख़िलाफ़ बहुएं मामला दर्ज करा देती हैं जबकि इन बहुओं को ख़ुद दहेज विरोधी कठोर क़ानून की सुरक्षा प्राप्त रहती है. जबकि बाद में इनमें से कई आरोप ग़लत पाए जाते हैं.

खलनायिका की तरह

एआईएमपीएफ़ की संयोजक नीना थूलिया ने कहा, " हमारे समाज में सास को खलनायिका की तरह पेश किया गया है."

थूलिया का कहना है,"टेलिविज़न सीरियल, फिल्म और मीडिया में हमें खलनायिका की तरह दिखाया जाता है.वर्षों से यह माना जाता रहा है कि जो सास होती है वो अपनी बहू को शारीरिक और मानसिक प्रतारणा देती है."

एआईएमपीएफ़ ने हाल ही में बंगलुरु में सासों के खिलाफ दायर किए गए मुक़दमों का सर्वे किया है.

नीना थूलिया का कहना कि जिन पचास मामलों की उन्होंने जांच की, उनमे से सभी मामलों में, सासों के विरूद्व लगाए गए आरोप ग़लत पाए गए.

थूलिया ने कहा, "एक वक़्त था जब बहुओं को कितनी पाबंदियों के बीच रहना पड़ता था, लेकिन अब ज़माना बदल गया है. अब की बहू आज़ाद है और बाहर नौकरी करती है. अब तो बेचारी सास है जो बहुओं के हाथ प्रताड़ित होती है. "

"टेलिविज़न सीरियल में तो हम खलनायिका हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में वो हम ही हैं जो बहुओं के ज़ुल्म का शिकार हुए हैं."

नीना थूलिया का कहना था कि कई बुज़ुर्ग महिलाओं को तो उनकी बहुएं कई बार घर से बाहर निकाल देती हैं.

थूलिया ने कहा कि ये मंच हर रविवार बैठक करेगा जिसमे प्रताड़ित सासों की मदद किस तरह से की जाए, इसकी रणनीति तैयार की जाएगी.

अभियान चलेगा

एआईएमपीएफ़ ने कहा कि हमारी संस्कृति में जिस तरह से सास की तस्वीर पेश की गई है, हम उसके ख़िलाफ़ भी अभियान चलाएंगे.

सदियों से कई भारतीय परिवारों में अपर्याप्त दहेज लाने के लिए ससुरालवालों के हाथों बहुओं का शोषण होता रहा है.

1961 में भारत सरकार ने दहेज लेने और देने, दोनों को ही ग़ैरक़ानूनी करार दिया था, लेकिन ये परंपरा अब भी जारी है और अब भी कम ही ऐसी शादियाँ होती होंगी जिसे माँ- बाप तय करते हों और जिसमे दहेज का लेना देना ना होता हो.

दहेज के खिलाफ अभियान चलानेवाले कहते हैं कि ये जो परंपरा है, इससे नयी नवेली बहुओं का शोषण होता है और उनके खिलाफ़ घरेलू हिंसा की आशंका ज़्यादा बनी रहती है.

हर साल सैकडों बहुएं अपने ससुरालवालों के हाथों जलाई जाती हैं और इसीलिए पिछले कुछ सालों में उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कड़े कानून भी बनाये गए हैं, लेकिन अधिकारीयों ने भी माना है कि उन मामलों में वृद्धि हुई हैजहाँ ससुरालवालों स बदला लेने के लिए इन कानूनों का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है, ससुरालवालों को प्रताड़ित करने के लिए.

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