राजस्थान में बदली जाएंगी पाठ्यपुस्तकें

  • 13 सितंबर 2009
पाठ्यक्रम पुस्तक

राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने पाठ्य पुस्तकों के उन कथित अंशों को हटाने का निर्देश दिया है जो एक खास विचारधारा को पोषित करते है. विपक्षी दल भाजपा ने इसका विरोध किया है.

अगले शिक्षा सत्र में लाखों विद्यार्थियों के हाथो में नई पुस्तकें होगी. शिक्षा शास्त्री कहते हैं कि न केवल राजस्थान बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में बच्चों को ऐसी सामग्री पढ़ाई जा रही है जो उनका विकास रोकती है.

राज्य सरकार की दिक्कत ये है कि इन अंशों को तत्काल नहीं हटाया जा सकता क्योंकि शिक्षा सत्र शुरू हुए दो माह बीत चुके है. लिहाजा अगले साल नई किताबें लागू करने को कहा गया है.

शिक्षा मंत्री भंवर लाल कहते हैं, "हमने एक समिति से इन पुस्तकों की जाँच कराई थी, इससे पता चला कि इनमें सांप्रदायिक पुट है और एक खास विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है. ऐसी पुस्तकें समाज के हित में नहीं हैं. पिछली भाजपा सरकार के दौरान 9वीं से 12वीं तक के कोई 15 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों के लिए इन पुस्तकों को पाठ्यक्रम में लागू किया गया था."

उधर बीजेपी ने इसपर आपत्ति की है. बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, ये विडंबना है कि हम झाँसी की रानी और शिवाजी को नहीं पढ़ते, हम अकबर को महान बताकर पढ़ाते है जबकि वो लुटेरा था, आक्रान्ता था. हम इसका विरोध करेंगे.

कुछ शिक्षा शास्त्री कहते हैं कि इन पुस्तकों में आरएसएस और उसकी विचारधारा को महिमामंडित किया गया है. कक्षा 11वीं की राजनीति विज्ञान की किताब में राष्ट्रीय आन्दोलन में दीनदयाल उपाध्याय के योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. साथ ही उपाध्याय को अर्थशास्त्री बताया गया है. ऐसे ही इसके भाग दो में एनी बेसेंट के हवाले से हिंदुत्व की तारीफ की गई है.

शिक्षा शास्त्री प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता बताते हैं कि इन पुस्तकों में वो शब्दावली इस्तेमाल की गई है जो आरएसएस की है.

राजस्थान में भाजपा के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी कहते हैं, "मुझे लगता है कि विद्यार्थी को सारे विचारकों और दर्शन को पढ़ने की छूट होनी चाहिए. फिर वो विवेक से तय करे कि कौन सा विचार ठीक था. हाँ, राजनीति नहीं होनी चाहिए पर ये भी देखना होगा की कौन से पाठ्यक्रम को राजनीति के दायरे में रखा जा रहा है. क्या चरण सिंह ने गाँधी जी के विचारों में आर्थिक दर्शन को ठीक बताया और नेहरु के विचारों से असहमति व्यक्त की या दीनदयाल जनसंघ के थे इसलिए उन्हें ठीक न कहें, ये पैमाना बनाना गलत होगा."

राज्य शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष रहे पीसी व्यास कहते हैं, हमने पाठ्यक्रम के लिए 10 बिंदु तय किए थे, वो सविंधान के नीति निर्देशों के मुताबिक थे. इसमें सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता जैसी बातें शामिल थीं. मगर ऐसा लगता है कि पूर्ववर्ती सरकार ने उन मूल्यों को भुला दिया.

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