समलैंगिकता पर सहयोग देने का फ़ैसला

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Image caption माना जा रहा है कि सरकार ने मामला अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दिया है

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से समलैंगिकता को अपराध न करार देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को हरसंभव सहायता देने का फ़ैसला किया है.

कैबिनट की गुरुवार को हुई बैठक में किए गए इस फ़ैसले की जानकारी पत्रकारों को देते हुए पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि भारत के एटर्नी जनरल इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट को जिस प्रकार की सहायता चाहिए होगी, वह उपलब्ध कराएंगे.

अंबिका सोनी के इस बयान का यह अर्थ लगाया जा रहा है कि शायद केंद्र सरकार धारा 377 के समलैंगिकता संबंधी प्रावधान को रद्द करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले का सुप्रीम कोर्ट में विरोध नहीं करेगी.

मगर अंबिका सोनी ने न तो इस विषय पर गठित मंत्रियों के समूह की सिफा़रिशों के बारे में कुछ बताया न ये स्पष्ट किया कि सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले का विरोध करेगी या नहीं.

मामला सुप्रीम कोर्ट में

देखा जाए तो एक तरीके से यूपीए सरकार ने गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी है.

मक़सद साफ़ है कि सरकार न तो समलैंगिता के समर्थन में काम करने वाले गुटों का नाराज़ करना चाहती है न इसका विरोध करने वाले धार्मिक या तथाकथित रूढ़ीवादी संगठनों को यह साफ़ करना चाहती है कि सरकार समलैंगिकता के अधिकारों की पक्षधर है.

दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को विश्व हिंदू परिषद और बाबा रामदेव के साथ कई अन्य संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए थे.

दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन जुलाई, 2009 को समलैंगिक संबंधों पर अपने फ़ैसले में कहा था कि संविधान की धारा 377 के उस प्रावधान में जिसमें समलैंगिकों के बीच सेक्स को अपराध क़रार दिया गया है, उससे मूलभूत मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है.

इसे भारत में सांस्कृतिक दृष्टि से एक ऐतिहासिक फ़ैसले के रूप में देखा गया था, मगर कई गुटों ने इसका तीखा विरोध करते हुए इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस फ़ैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और सरकार से आठ हफ़्तों के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा था.

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