बिहार में पेड़ लगाने का रिकॉर्ड

बिहार में लाखों ग़रीबों को रोज़गार देने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुड़े एक अधिकारी एसएम राजू राज्य में बड़ी संख्या में पेड़ लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं.

राजू की मुहिम है कि लोगों को पेड़ लगाने के लिए तैयार किया जा सके ताकि रोज़गार के साथ-साथ ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी समस्याओं से प्रभावी ढ़ंग से लड़ा जा सके. उनकी इस मुहिम को हाथों-हाथ लिया जा रहा है.

उनकी योजना की सफलता का सबूत यह है कि पिछले 30 अगस्त को उन्होंने वृक्षारोपण के एक बड़े कार्यक्रम में साढ़े सात सौ गाँवों के तीन लाख लोगों को इकट्ठा किया. उनके इस क़दम से ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को रोज़गार भी मिला.

राजू अपनी 'सामाजिक वानिकी' के इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा) से भी जोड़ते हैं. नरेगा का मक़सद ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे लोगों को साल में कम से कम सौ दिन रोज़गार देना है.

बिहार की 44 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है और अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संघ का कहना है कि जब से रोज़गार गारंटी योजना लागू हुई है तब से हज़ारों परिवारों को फ़ायदा पहुँचा है.

पर राजू कहते हैं कि चूँकि बिहार देश की सबसे ग़रीब और ख़राब क़ानून व्यवस्था वाला राज्य है ऐसे में वहाँ नरेगा के फंड का सही तरह से इस्तेमाल नहीं हो सका है.

राजू कहते हैं, "ऐसा अधिकारियों में योजना के प्रति जागरूकता की कमी के कारण हुआ है."

उनका कहना है कि ख़राब मॉनसून से जहाँ फ़सल की हालत अच्छी नहीं है वहीं कुछ जगहों पर बाढ़ की वजह से स्थिति और भी ख़राब है.

राजू कहते हैं, "तब मेरे ज़ेहन में विचार आया कि क्यों नहीं ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को सामाजिक वानिकी के काम पर लगाया जाए और इस योजना के तहत सौ दिनों का रोज़गार दिया जाए."

नरेगा मददगार

और राजू ने जल्दी से अपने विचार को मूर्त रुप दिया और उनकी इस योजना को उनके सीनियरों से भी समर्थन मिला.

Image caption इस कार्यक्रम से लाखों लोगों को रोज़गार मिलेगा

जून महीने में राजू ने इस काम के लिए एक पुस्तिका भी प्रकाशित की और उसमें पेड़ लगाने के बारे में दिशा निर्देश बताए गए. पुस्तिका को ज़िला और पंचायत अधिकारियों को भी भेजा गया है.

इस कार्यक्रम से लाखों लोगों को रोज़गार मिलेगा

राजू कहते हैं, "मैंने गाँव वालों को बताया है कि पेड़ लगाने और उसे सुरक्षा देने से उन्हें साल में सौ दिनों को काम मिलेगा. काम देने में बूढ़े, लाचार और विधवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी."

प्रत्येक पंचायत को 50 हज़ार पेड़ लगाने का लक्ष्य दिया गया है. चार परिवार के एक समूह को दो सौ पेड़ों लगाने और अगले तीन साल तक सुरक्षा प्रदान करना होगा यानी पेड़ के बड़े और मज़बूत होने तक.

योजना के दिशा निर्देश के बारे में राजू कहते हैं, "काम करने वाले को पुरी मज़दूरी तब दी जाएगी जब 90 प्रतिशत पेड़ बचे रहेंगे, अगर 75-80 प्रतिशत पेड़ बचे तो आधी मज़दूरी दी जाएगी और अगर 75 प्रतिशत से कम पेड़ बचते हैं तो उस समूह के परिवारों को बदल दिया जाएगा.

राजू के अनुसार इस योजना की वजह से मज़दूरों का पलायन भी रुका है.

पैगंबरपुर के पंचायत मुखिया इंदिरा भूषण कहती है, "हम कभी नहीं सोच सके कि पेड़ लगाने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए रोज़गार दिया जाएगा."

हालाँकि इस समय राजू अपने कारनामे को गीनीज़ बूक ऑफ़ वल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने में लगे हुए हैं. अभी तक ये रिकार्ड पाकिस्तान के पास है.

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