कफ़न सिलने में मिलता है सुकून

बुन्दु ख़ान
Image caption बुन्दु ख़ान के लिए क्या राजा क्या रंक, कफ़न में कोई फ़र्क नहीं.

जयपुर के बुन्दु ख़ान के लिए कफ़न सिलना एक नेक काम है. उन्हें कफ़न सिलने में माहरत हासिल है. इस्लाम के विद्वान भी इसे पवित्र काम बताते हैं.

बुन्दु ख़ान के लिए क्या राजा क्या रंक, कफ़न में कोई फ़र्क नहीं. वे इसे इबादत की तरह करते हैं.

पेशे से दर्जी बुन्दु ख़ान कफ़न सिलने में सिद्धहस्त हैं. उन्हें ख़ुद भी याद नहीं है कि अब तक उन्होंने कितने कफ़न सिले हैं.

इबादत

उन्हें सिर्फ़ इतना पता है की यह एक नेक काम है. इसे करने में सुकून मिलता है. वे कहते हैं, "मैयत का हर काम नेक है, चाहे वह गुसल देना हो या कफ़न सिलना और नमाज़ पढना. यह सब नेकी का हिस्सा है. मैयत से बढ़कर कोई नेक काम नहीं, दुनिया में करना क्या है. आखिरी रसुमत से बढ़ कर क्या अच्छा है. मुझे बहुत ख़ुशी होती है. कोई और काम हाथ में हो और कोई कफ़न बनाने को कहे तो सारे काम छोड़ दूंगा, पहले कफ़न सिलूँगा."

कभी कोई उन्हें रात में भी बुलाता है तो बुन्दु ख़ान फ़ौरन रवाना हो जाते है. वे कहते हैं कि रात में कई बार सुई में धागा डालना मुश्किल होता है, ऐसे में दूसरे से मदद लेता हूँ.

बुन्दु कहते हैं कि इसमें सादगी होती है, इसमें ग़रीब या अमीर में कोई फ़र्क नहीं होता सबका आखिरी लिबास एक जैसा ही होता है.

वे कहते हैं कि यह सादे कपड़े का होता है. हाँ एक बार किसी ने रेशम का ज़रूर बनवाया था.

जमाते इस्लामी के सलीम इंजिनियर इस्लामी मामलों के जानकर है, वे कहते हैं, “ मौत के बाद यह ज़रूरी होता है की उसे क़ब्रिस्तान तक बहुत इज़्ज़त और अहेतराम से ले जाया जाए. कोई उसे नहलाता या उसके लिए कफ़न सिलता है तो ऐसा करने वाले का भी ये सामान है. इसे बहुत मुकद्दस माना जाता है. इसके लिए कोई पेशवर लोग नहीं होते. इसे कुछ नेक लोग करते हैं.

भारत में हर मज़हब में इंसान की अंतिम यात्रा को बहुत पवित्र भाव से पेश किया जाता है.

अंतिम लिबास

राजस्थान में दौसा के पंडित राजेश्वर अपनी कथाओं में जब बताते हैं की जीवन तो नश्वर है, तो वे यह बताना भी नहीं भूलते की कफ़न ही अंतिम सफ़र का गवाह बनेगा.

राजेश्वर कथा में गा-गा कर बताते है, “इंसान जब संसार से विदाई लेता है तो सबकी अस्थी एक ही होती है. जावेगा जब यहाँ से कुछ भी पास न होगा, दो गज कफ़न का टुकड़ा ही तेरा लिबास होगा.”

बुन्दु ख़ान जब कभी कफ़न सिलते है तो बार-बार यह सवाल उनके जेहन में आता है की जब उनकी आखिरी यात्रा होगी तो न जाने कोई कैसे कफ़न सिलेगा.

इस सवाल पर वे हंसकर कहते हैं, “न जाने मेरा कफ़न कैसा होगा. कही छोटा बड़ा न हो, हाँ फ़ौरन मौत याद आने लगती है.”

बुन्दु ख़ान को एक बात का दुख है की अब कफ़न बने-बनाए मिलने लगे हैं और दुकानदार इसे बचे हुए कपड़े से बनाते हैं. बुन्दु अब अपने एक बेटे को कफ़न सिलने का काम सीखा रहे है. उन्होंने बेटे से कह रखा है की उनकी मौत के बाद नेकी का ये सिलसिला टूटना नही चाहिए.

भारत में लाखों लोग ऐसे भी हैं जो अपनी अंतिम यात्रा को सुखद बनाने में लगे रहते है. एक बुन्दु ख़ान है जो दुनिया से रुख़सत करते लोगों का आख़िरी सफ़र बेहतर बनाने में लगे रहते हैं.

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