'भारत को कोई फ़र्क नहीं पड़ता'

सुरक्षा परिषद
Image caption सभी देशों से परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त करने की अपील की गई है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने परमाणु निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार पर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है.

प्रस्ताव 1887 के तहत उन सभी देशों से परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने को कहा गया है, जिन्होंने अभी तक इस संधि को स्वीकार नहीं किया है.

भारत ने भी अभी तक इस संधि पर दस्तख़त नहीं किए हैं.

इस नए प्रस्ताव का भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ेगा, इस पर बीबीसी हिंदी सेवा के प्रमुख अमित बरुआ ने बात की भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा से.

नया प्रस्ताव कितना महत्वपूर्ण है और भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?

पहले भी 1998 में सुरक्षा परिषद में नया प्रस्ताव पारित हुआ था. हमारे परमाणु परीक्षणों के बाद. तो कोई ये पहली बार तो नहीं है जब अप्रसार संधि को आगे बढ़ाने की बात की गई है. इसमें कोई नई चीज नहीं है और हम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि ये प्रस्ताव मुझे लगता है कि चैप्टर छह के नीचे है, सात के नीचे नहीं.

ओबामा सरकार के आने के बाद परमाणु अप्रसार पर ज़्यादा ज़ोर नहीं देख रहे हैं आप?

अब ओबामा सरकार परमाणु अप्रसार को कैसे आगे बढ़ा सकती है जब तक कि वो पाकिस्तान, भारत और इसराइल को इस पर दस्तख़त नहीं करने के लिए बाध्य नहीं करती. इनमें से तो कोई हस्ताक्षर करने वाले नही हैं. इसके अलावा उत्तर कोरिया भी है जिसने संधि से अपने को अलग कर लिया. मेरे ख़याल से ओबामा साहब का ये प्रयास है. उन्होंने पहले भी निरस्त्रीकरण पर गंभीर भाषण दिया था लेकिन जब तक वो खुद इस दिशा में आगे नहीं बढ़ते तब तक हम पर असर नहीं पड़ने वाला है.

Image caption ब्रजेश मिश्रा एनडीए सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे.

अगर कल को अमरीका सीटीबीटी पर दस्तख़त कर दे और अपने यहां की संसद से पारित कर दे तो भारत पर दबाव पड़ेगा?

मुझे तो ये लगता है कि और सब मुल्क इसे मान लेते हैं जैसा कि अमरीका या चीन को करना है तो भारत के लिए मुश्किल होगी. 40 या 45 देशों का नाम सीटीबीटी के अंदर है और जब तक ये इसे नहीं मानते तो ये लागू नहीं होगा. लेकिन अगर चीन और अमरीका इसे मान लें तो भारत पर दबाव ज़रूर पड़ेगा.

आज जो प्रस्ताव सुरक्षा परिषद ने पारित किया है, इसका लक्ष्य ईरान या उत्तर कोरिया जैसे देशों पर है भारत पर नहीं?

हिंदुस्तान पर भी है क्योंकि उन्होंने पिछले प्रस्ताव का उल्लेख किया है जिसमें परोक्ष रूप से भारत भी आता है पाकिस्तान भी और इसराइल भी.

ओबामा सरकार क्या संदेश देना चाह रही है. ओबामा ने ख़ुद सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता की. कहा जाता है कि पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति ने ऐसा किया है. क्या कहना है आपका?

इसमें तो कोई शक नहीं है. दुनिया को परमाणु हथियार विहीन करने का जो घोषणापत्र जारी हुआ था. ये उसी रास्ते में आगे बढ़ना चाहते हैं लेकिन मेरे समझ में नहीं आता कि ज़्यादा आगे बढ़ सकते हैं.

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