परिवारवाद अमर रहे !

  • 25 सितंबर 2009
Image caption कांग्रेस में नेहरु-गाँधी परिवार पर बागडोर हाथ में रखने की बात कही जाती रही है.

भारतीय राजनीति के इतिहास में परिवारवाद की परंपरा पुरानी ही कही जाएगी.

चुनावों के क़रीब आते ही परिवारवाद का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठ जाता है. महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.

साथ ही शुरू हो चुका है टिकट पाने वाले खुशकिस्मतों का आकलन भी.

सभी पार्टियाँ मुश्किल से ही तय कर पाई हैं कि किन उम्मीदवारों को टिकट दिया जाए.

हमेशा की तरह इस बार भी असमंजस रहा कि किन-किन दिग्गजों के बेटे-बहू, जीजा-बहन या ननद-ननदोई उनकी पार्टी का टिकट पाकर चुनावी बिगुल बजाते हैं. यानी परिवारवाद की जय !

हरियाणा प्रदेश की बात हो तो किसी भी पार्टी का शायद ही कोई बड़ा कद्दावर नेता होगा जिसके किसी रिश्तेदार को विधानसभा चुनाव का टिकट न मिल सका हो.

वोट जनता से मांगेंगे. नारे कार्यकर्ता लगाएँगे, पर टिकट देने में ख़ून के रिश्ते को तरजीह मिलेगी! क्या ये सही है?

हरियाणा प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष फूलचंद मुलाना कहते हैं, "जहाँ तक परिवारों का सवाल हैं तो जो स्थापित परिवार हैं वो तो राजनीति में आते ही हैं. इन्हें नज़र अंदाज़ कैसे कर सकते हैं. पर कांग्रेस पार्टी हर वर्ग को ध्यान में रख कर टिकट देती है. दो बातें अहम हैं, एक जीतने की क्षमता और दूसरी वफ़ादारी."

हालांकि उत्तर प्रदेश में कुछ लोकसभा और विधानसभा सीटों के लिए ही उपचुनाव हो रहे हैं, लेकिन परिवारवाद की छाप सब तरफ है. फ़िरोज़ाबाद लोकसभा सीट उप चुनाव के लिए मुलायम सिंह यादव ने अपनी बहू डिम्पल यादव को मैदान में उतारा है.

हालांकि यूपी में ही लखनऊ पश्चिम विधानसभा सीट पर लखनऊ के मौजूदा संसद लालजी टंडन अपने बेटे गोपालजी टंडन को टिकट दिलवाने पर नाकाम रहे हैं.

ख़ुद लखनऊ पश्चिम सीट से विधायक रहे लालजी टंडन कहते हैं, "मुझे शिकायत ये है कि मेरा नाम लगाया जा रहा है. कहा जा रहा है कि मैं अपने बेटे को लड़ाना चाह रहा था, जबकि मैंने किसी से इसके लिए कहा नहीं. एक कार्यकर्ता के नाते उसकी जो रुचि है और लोगों में लोकप्रियता है उसी के चलते लोगों ने उससे कहा कि भाई निकलो बाहर और लड़ो. "

ज़िक्र महाराष्ट्र को हो तो वहाँ भी तस्वीर बदली हुई नहीं है. पिछले चुनावों में भाजपा नेता प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन को पार्टी ने टिकट नहीं दिया था.

लेकिन इन चुनावों में पूनम के मामा और प्रदेश के बड़े भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने उनके साथ-साथ अपनी बेटी की भी चुनावी पारी शुरू करवा ही दी.

वैसे महाराष्ट्र ही वो राज्य है जहाँ से राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के साहबजादों के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी भी अपनी किस्मत आज़माएंगी.

विडम्बना ये है कि जब भी किसी दिग्गज नेता से पूछिए कि किसी रिश्तेदार को टिकट क्यों दिया गया, तो वे गोल-मोल ही जवाब देते हैं.

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला अपने बेटे अजय चौटाला के चुनाव में हिस्सा लेने पर कहते हैं , "लोगों ने उसे लड़ने पर मजबूर कर दिया. क्योंकि पिछले 50 सालों से हमारे घर की सीट सुरक्षित सीट थी पर अब जनरल सीट हो गई है. अजय तो वैसे भी राज्य सभा का सदस्य है, लेकिन लोगों की इच्छा और आकांक्षाओं को हम टाल नहीं सकते."

सौ बात की एक बात. सभी पार्टियों के नेता अपने घरेलू राज्यों में अपने-अपने रिश्तेदारों-नातेदारों के लिए पार्टी हाई कमान पर दबाव बनाए रखते हैं.

चाहे डिम्पल यादव के रूप में समाजवादियों की बहू हो या अजय चौटाला के वेश में हरियाणा में देवी लाल की राजनीति को दुबारा जागृत करने की उम्मीद हो. एक ही चीज़ है जो भारतीय राजनीति में जस की तस है. परिवारवाद!

संबंधित समाचार