हड्डियां पहचान बन गईं गाँव की

  • 26 सितंबर 2009
वडेरा गांव में मिले कंकालों के अंश

खोदा टीला, निकली हड्डी... और मशहूर हो गया वडेरा गाँव. लोग अब इसे हड्डी वाला गाँव कहते हैं. किसी से बस हड्डी वाला गाँव पूछिए और लोग आपको वडेरा का रास्ता बता देंगे.

मोहम्मदी से आठ किलोमीटर पश्चिम में वडेरा गाँव जाने के लिए सड़क गड्ढों वाली है और ड्राइवर डर-डर कर गाड़ी चला रहा था. लेकिन दोनों तरफ धान, गन्ने और केले के हरे भरे खेत आँखों को सुकून देने वाले थे.

वडेरा पहुंचते-पहुंचते मुझे शाम हो गई. गाड़ी गाँव में रोक हम खेतों की तरफ चले. पुराना शिव मंदिर, फिर कुछ खेत और तालाब. बीच में लगभग एक एकड़ का खेत बिल्कुल अलग दिख रहा था.

एक दलित विश्राम लाल को 35 साल पहले इस जमींन का पट्टा मिला था मगर जमीन पर बड़ा टीला था. विश्राम लाल के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो जमीन को समतल कर उपजाऊ बनाते.

अब भारत सरकार ने नरेगा कार्यक्रम में दलित और छोटे किसानों के खेत में भूमि संरंक्षण के काम को भी शामिल कर लिया है. दो हफ्ते पहले यहाँ करीब डेढ़ सौ मजदूर विश्राम लाल के खेत पर फावड़ा चला रहे थे. अचानक वहां नरकंकाल मिलने लगे. एक नहीं, दो नहीं,... बहुत से. मजदूरों ने कुछ कंकाल और हड्डियां बगल के तालाब में फेंक दीं.

फिर किसी ने पुलिस को सूचना कर दी. मोहम्मदी से पुलिस और तहसील वाले आए और कुछ हड्डियां वह साथ उठा ले गए. सरकारी अस्पताल के एक डाक्टर बलवीर सिंह को पता लगा तो कुछ हड्डी वो भी ले गए. फिर पुलिस वालों के काम बंद करा दिया और जो कंकाल दिख रहे थे, उन्हें मिट्टी से दबवा दिया. मगर मैं जब वहां पहुंचा तो एक जगह कुछ हड्डियां पड़ी थीं. लोग मुझे वहां ले गए. पता चला बहुत से लोग कुछ हड्डियां ले गए हैं, निशानी के लिए.

और फिर बात से बात...

आसपास के लोगों में कई तरह की किंवदन्तियाँ ज़ोर पकड़ रही हैं. कुछ लोग ये कह रहे हैं कि इसी इलाक़े में विराट की राजधानी हुआ करती थी, तो कुछ का कहना है कि लखनऊ की बेग़म हजरत महल और अंग्रेज़ों के बीच यहीं लड़ाई हुई थी और बाद में वो नेपाल चली गईं.

कुछ गाँववालों ने अपने पुरखों के हवाले से बताया कि करीब सौ साल पहले यहाँ लाल बुखार या मलेरिया जैसी महामारी आई थी, जिसमे बहुत लोग मरे थे. हो सकता है कि ये कंकाल उन्हीं के हों.

दूसरे दिन दोपहर में लखनऊ से पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से राजीव द्विवेदी और विमल तिवारी जांच पड़ताल के लिए आए. लेकिन उनकी दिलचस्पी हड्डियों में कम, ऐसी पुरातात्विक सामग्री में ज़्यादा थी जिससे समय निर्धारण में मदद मिले. कुछ मिटटी के बर्तन के टुकड़े उन्होंने लिए. फिर लोगों के आग्रह पर पास के एक सिद्ध मंदिर टीले से कुछ पुरानी ईंटें देखी.

इस बीच एक उत्साही युवक ने खेत से किसी कंकाल के जबड़े के कुछ दांत बटोर कर दिखाए. एक युवक फावड़ा लेकर खुदाई करने लगा कि कोई और कंकाल मिला जाए.

इस बीच मोहम्मदी से शौकत अली और रईस अहमद आ गए और विस्तार से बताने लगे कि कैसे वर्ष 1857-58 में फैज़ाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी. मगर कई लोग उनसे तर्क करने लगे कि उन्होंने अपने पुरखों से इस गाँव में यहाँ ऐसी लड़ाई की बात नहीं सुनी.

अब तक कई सौ लोग जमा हो गए. इनमे खेत के मालिक विश्राम लाल भी थे. विश्राम ने मुझे बड़े विस्तार से बताया कि कैसे उनके खेत से ढेर सारे कंकाल मिले.

विश्राम लाल बहुत खुश थे कि इन हड्डियों की वजह से वह और उनका खेत मशहूर हो गया. इतने अफ़सर, पत्रकार, फोटोग्राफर यहाँ पहले कभी नहीं आए थे.

उधर जब स्थानीय अफ़सरों को पता चला कि पुरातत्व वाले बिना उन्हें बताए आये और चले गए तो उन्हें बहुत बुरा लगा. दरअसल तहसीलदार ने ही जिला मजिस्ट्रेट के ज़रिए पुरातत्व वालों को बुलाया था .

पुरातत्व अधिकरियों ने लौटकर अपनी रिपोर्ट दे दी है और उसमें यही कहा गया है कि इस स्थान का कोई ख़ास सांस्कृतिक महत्व नहीं समझ में आता.

हालाँकि उनका कहना है कि केवल हड्डियों को देखकर कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है. इसके लिए मानवविज्ञानियों की मदद ली जानी चाहिए. और जब तक मानव विज्ञानी आकर इन हड्डियों का परीक्षण नहीं करते, तब तक इन कंकालों का रहस्य ज़मीन में ही दफ़्न रहेगा.

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