गंगाजल को ब्रांड बनाने पर विवाद

संत
Image caption संत समाज गंगाजल की ब्रांडिंग का विरोध कर रहा है.

ब्रांडेड जूते, ब्रांडेड कपड़े, गहने और ब्रांडेड भोजन की तरह ही ब्रांडेड गंगाजल बेचने की योजना पर विवाद तूल पकड़ता जा रहा है.

बाजारवाद के इस युग में जब एक से एक पैकेजिंग के साथ ब्रांडेड उपभोक्ता वस्तुएं बाज़ार में उपलब्ध हैं, उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने घोषणा कर डाली कि उत्तराखंड के गंगाजल की ब्रांडिंग की जाएगी.

उनका कहना है, "हमारे पहाड़ों से जब गंगा बह कर आती है तो अपने साथ जड़ीबूटियों का रस भी लेकर आती है, इसकी एक बूंद में कई व्याधियों को दूर करने की ताकत है तो क्यों न हम इसे दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाएँ."

वो कहते हैं, "ये हमारा अपना ही ब्रांड होगा और इसका नाम होगा 'अमृतरस' क्योंकि इतना शुद्ध और पवित्र गंगाजल और कहां है. हरिद्वार के बाद तो गंगा में प्रदूषण है."

जाहिर है ऐसी योजना शुरू करने के लिये हरिद्वार में कुंभ से बेहतर समय नहीं होता. अगले साल हरिद्वार में कुंभ होनेवाला है और अनुमान है कि देश-विदेश से छह करोड़ लोग यहां आएंगे.

संतों का विरोध

लेकिन हरिद्वार का संत समाज इसके विरोध में उतर आया है. आमतौर पर सत्ताधारी बीजेपी के साथ रहने वाले साधु संतों ने इस योजना को आड़े हाथों लिया.

Image caption राज्य में नदियों को बचाने के लिए आंदोलन चल रहा है.

स्वामी माधवानंद कहते हैं, "गंगा कोई बिसलरी का पानी नहीं है. गंगा सदैव सबके लिये सुलभ, पतित पावनी और मोक्षदायिनी रही है. ये कोई बेचने की वस्तु नहीं है."

पंडित विद्याधर भट्ट कहते हैं,"गंगा का पानी सभी जगह समान है और उसे इस तरह बांट कर बिकाऊ नहीं बनाया जा सकता."

हरिद्वार पहुंचे विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कहा कि, "ये हिंदू भावनाओं के साथ खिलवाड़ है. गंगा पर सभी परियोजनाएं ठप्प कर दी जाएंगी."

संत समाज की इस कड़ी टिप्पणी से एक तरह से सकपकाए मुख्यमंत्री निशंक ने अब कहना शुरू कर दिया है कि वो सिर्फ गंगा की नहीं बल्कि सभी पहाड़ी नदियों की बात कर रहे हैं और ये कि उनका पानी आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर है.

नदी बचाओ..

गौरतलब है कि इस समय प्रदेश की 12 नदी घाटियों में पनबिजली परियोजनाओं के विरूद्ध नदी बचाओ आंदोलन चल रहा है.

आंदोलनकर्मियों का आरोप है कि सरकार सिर्फ नदियों का दोहन कर रही है और स्थानीय संस्कृतियों को उजाड़ रही है.

चमोली जिले के मैखुरा गांव के रंगकर्मी जितेंद्र कहते हैं,"नदियों का कलकल-छलछल रूप खोता जा रहा है और पनबिजली परियोजनाओं के कारण या तो वो झील बन चुकी हैं या सुरंगों में बह रही है. ऐसे में नदी की पवित्रता की बात करना बेबुनियाद है."

दूसरी ओर अगर प्रदूषण बोर्ड के आंकड़ों और वैज्ञानिक तथ्यों पर नजर डालें तो अपने उदगम से कुछ ही आगे उत्तरकाशी में भी गंगा में प्रदूषण बढ़ रहा है और हरिद्वार में तो ये तय मानकों के अनुसार आचमन और स्नान के लायक भी नहीं रह गया है.

लेकिन सरकार के सूत्रों की मानें तो कर्ज के बोझ से दबी सरकार राजस्व की उगाही के लिये गंगा को बोतल में बंद कर बेचने की हर मुमकिन कोशिश में लगी है और इसके लिये ये संतों को किसी तरह मनाने का प्रयास किया जा रहा है कि.

दलील ये है कि अगर गंगाजल ब्रांड के रूप में बिकता भी है तो इससे राज्य के लोगों का ही फायदा होगा.

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