महाराष्ट्र चुनाव का विरोध करेंगी महिलाएँ

महाराष्ट्र में कुछ प्रदर्शनकारियों का कहना है कि करीब नौ लाख महिलाएँ आगामी विधानसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगी.

इनमें विकलांग, विधवाएँ और देवदासी समुदाय की महिलाएँ शामिल हैं. इन लोगों की नाराज़गी है कि रोज़गार, पेंशन और राशन कार्ड को लेकर इनकी माँगों को राजनीतिक पार्टियों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है.

प्रदर्शनकारियों ने अपनी माँगे मनवाने के लिए 10 अक्तूबर तक का समय रखा है. महाराष्ट्र में चुनाव 13 अक्तूबर को है.

विरोध कर रही महिलाओं के प्रतिनिधि विलासभाउ रुपवते कहते हैं, “हम कई बार लिखित में अनुरोध कर चुके हैं, प्रदर्शन कर चुके हैं और पार्टियों के नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं ताकि महिलाओं को राशन कार्ड मिल सके. कुछ विधवाएँ बुज़ुर्ग हैं और काम नहीं कर सकतीं. पहले उन्हें हर तिमाही पर 500 रुपए मिलते थे, अब तो ये भी नहीं मिलता.”

'नौकरी नहीं मिलती'

देवदासियों की प्रतिनिधि लताताई कहती हैं कि सरकार उनके किसी भी दस्तावेज़ का काम आगे नहीं बढ़ा रही है.

वे कहती हैं, “ज़्यादातर महिलाएँ पढ़ी-लिखी नहीं है. उनके पास पैसे की कोई बचत नहीं है और वे असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं. ये महिलाएँ ऐसी परंपरा के सहारे अपनी रोज़ी रोटी कमाती हैं जो अब धीरे-धीरे मर रही है.”

देवदासियों को छोटी उम्र में ही स्थानीय मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है और उनकी शादी वहां के इष्ट देवता कर दी जाती है. वे मंदिर के पुजारियों और स्थानीय रुसूख़ वाले लोगों के लिए यौनकर्मी का काम करती हैं.

आशा ताई ऐसी ही एक महिला हैं जो बहुत कम उम्र से ही देवदासी का काम कर रही हैं. वे मुंबई से 100 किलोमीटर दूर इगतपुरी में अकेली रहती हैं. उनकी बेटियों की शादी हो चुकी है और बेटे ने देखभाल करने से इनकार दिया है.

वे कहती हैं, “अब लोग जोगवा की परंपरा का सम्मान भी नहीं करते और हम दूसरे के घरों में काम भी नहीं कर सकते.”

जोगवा वो परंपरा है जिसमें देवदासियाँ मंगलवार, शुक्रवार, एकादशी और पूर्णमाशी के दिन भिक्षा माँगती हैं और जो उन्हें अन्न देता है उन्हें वे आशीर्वाद देती हैं.

मुंबई में रहने वाली और देवदासी समुदाय की शालिनी कहती हैं कि वे काम करने के लिए तैयार हैं लेकिन उनके जैसी महिलाओं के लिए कोई नौकरी नहीं है.