नक्सलियों के गढ़ में दो रातें -2

उड़ीसा का एक गाँव
Image caption हमारा मार्गदर्शक इलाक़े के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था

बीबीसी को नक्सलियों का बुलावा था और मैं उनके दिशा-निर्देशों का पालन करता हुआ भुवनेश्वर के निकलकर कंधमाल और गंजाम ज़िलों की सीमा पर स्थित एक गाँव तक पहुँच चुका था.

अब हमें उस आदमी से मिलना था जो हमें नक्सलियों तक पहुँचाने वाला था.

हमारी गाड़ी एक थाने के सामने से गुज़री जिसे नक्सलियों ने उड़ा दिया था. ड्राइवर ने बताया कि अब गाँव में पुलिस थाना ही नहीं है. उसने इशारे से बताया कि सामने से आ रहा बेडौल सा आदमी पुलिस सब इंस्पेक्टर है. अचानक शरीर में सुरसुरी सी हो गई. नक्सली सूत्र की तलाश करते दो पत्रकारों के सामने पुलिस. लेकिन उसका ध्यान हमारी ओर नहीं था.

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बारिश होने लगी थी. एक महिला ने उस आदमी का पता बताया. हम छतरी के नीचे किसी तरह अपने उपकरणों को बचाते खेतों के किनारे पहुँचे. वहाँ रास्ता अस्थाई नाले में बदल चुका था. जूते उतारकर हाथ में लिए और पानी में उतर पड़े.

बिना दूध की चाय पिलाते हुए उस व्यक्ति ने कई ऐसे दिलचस्प क़िस्से सुनाए जो बीबीसी के पाठकों को बहुत लुभाते, लेकिन इससे उसकी पहचान ज़ाहिर होने का ख़तरा था सो कहानियाँ वहीं सीने में दफ़्न कर लीं.

इस बीच उसका जवान बेटा एक दुबले-पतले व्यक्ति को बुला लाया. थोड़ी देर की बातचीत के बाद साँवला सा वह आदमी बीड़ी सुलगाता हुआ हमें साथ लेकर चल पड़ा.

कैंप तक का रास्ता

अब हम खेतों के बीच और जंगलों के बगल से तेज़ चाल से चल पड़े थे. रास्ता क्या, वह बेहद उबड़-खाबड़ पगडंडी थी. बीच में दो छोटे गाँव मिले लेकिन हमें रुकना नहीं था. एक घंटे चलने के बाद साँस फूलने लगी. वह बीच-बीच में हमें पीछे मुड़कर देखता. मूछों के पीछे से हल्की सी मुस्कान उभरती और फिर लंबे डग भरना शुरु.

एकाएक उसने रुककर उड़िया में कहा, “जूते उतार लीजिए.” आगे कीचड़ से भरा रास्ता था. बारिश जारी थी. पैंट मोड़कर घुटनों तक चढ़ा ली थी. पहला क़दम बढ़ाया और पैर कीचड़ में धँस गया. उसे निकालते-निकालते दूसरा पैर भी धँस गया. लगा, “कहाँ फँस गए यार.”

Image caption बंदूक की सफ़ाई उनकी बड़ी प्राथमिकता होती है

किसी तरह आगे बढ़े तो कीचड़ कुछ कम था लेकिन नुकीले पत्थर भरे पड़े थे. चलना मुश्किल हुआ जा रहा था. लगता था कि तलुए छिल गए हैं. याद आया कि मैं किस तरह प्रायमरी स्कूल के दिनों में कई बार नंगे पाँव तीन किलोमीटर दूर अपने स्कूल तक दौड़ता चला जाता था. अब दो फ़र्लांग चलना भी दूभर हो रहा था.

वह आदमी पुरुषोत्तम के साथ एक नाले की ढलान पर उतरता ओझल हो गया था. अभी शाम के पाँच बजे ही थे लेकिन झींगुरों की आवाज़ें सुनाई पड़ने लगी थीं. कहीं दूर से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ें भी आ रही थीं.

धीरे-धीरे नीचे उतरा तो कुछ हलचल नज़र आने लगी. पेड़ों के झुरमुट के पीछे एक नीला टेंट नज़र आ रहा था. वहाँ पहुँचा तो एक सफ़ेद रंग की चेक शर्ट और खाकी पैंट पहने एक युवक ने हल्की मुस्कुराहट के साथ हाथ मिलाया.

यह अहसास होते ही कि यही सव्यसाची पंडा है, जिससे मिलने मैं सैकड़ों मील की यात्रा करके पहुँचा हूँ, मेरे रोंगटे खड़े हो गए.

क्या यह वही युवक है जिसे पुलिस दुर्दांत हत्यारा और निर्मम नक्सली कहती है? क्या यही वह है जिसके एक इशारे पर सैकड़ों बंदूकधारी जान ले और दे सकते हैं? क्या नयागढ़ में पुलिस शस्त्रागार और ट्रेनिंग सेंटर में करोड़ों के हथियारों की लूट की योजना इसी युवक के दिमाग की उपज थी?

मेरे विचारों को तोड़ा मेरी ओर बढ़े एक नवयुवती के हाथ ने. हाथ मिलाते ही उसने तपाक से कहा, “लाल सलाम” और फिर मुठ्ठी बाँधकर हाथ हवा में उठा दिया. यह नक्सलियों के बीच अभिवादन का सामान्य तरीक़ा है.

मैं अब संगीनों के साए में था. क्या मैं सुरक्षित था?

(अगला अंक: हिंसा का रास्ता और कठिन ज़िंदगी)

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