नक्सलियों के गढ़ में दो रातें -3

एक नक्सली
Image caption कुछ बच्चे कैंप में थे जो हथियारबंद दस्ते का हिस्सा नहीं थे

मुझे नक्सलियों का आमंत्रण मिला था और मैंने हामी भर दी थी. ट्रेन, बस और फिर तीन घंटों की पैदल यात्रा के बाद मैं नक्सली कैंप में था.

पहाड़ों की तराई में मैं सव्यसाची पंडा के सामने बैठा था. वह पूछ रहे थे कि हमें पहुँचने में तकलीफ़ तो नहीं हुई और मैं इनकार में सिर हिलाते हुए हाथों से टटोल रहा था कि मेरा पाँव कितनी जगह नुकीले पत्थरों से कट गया है.

पहला अंक यहाँ पढ़ें

दूसरा अंक यहाँ पढ़ें

एकाएक अनपेक्षित घटित हुआ. गरम-गरम चाय आ गई. चाय की तारीफ़ की तो सव्यसाची ने मुस्कुरा कर कहा, “जो एक बार माओवादी कैंप की चाय पी लेता है, वह बार-बार चाय पीने आता है.”

मैं सोच ही रहा था कि यहाँ रात कैसे कटेगी कि उन्होंने कहा, “हमें यह जगह छोड़नी है. हम लोग सामान समेट ही रहे थे.” एक दस्ता किसी दूसरे मोर्चे के लिए रवाना हुआ. अब यहाँ कम ही लोग बचे थे जिसमें पाँच नवयुवतियाँ थीं, एक 13-14 साल की बच्ची और दो नवयुवक.

जंगलों में अंधेरा पसरता जा रहा था और मन में डर. कुछ अंधेरे का और कुछ संगीनों का.

समान समेटा जा रहा था. मैं देख रहा था कि पूरी गृहस्थी का सामान था. अनाज के बोरे, खाना पकाने और पानी रखने के लिए बर्तन और खाना खाने के लिए छोटी प्लेटें. कहीं गोला बारूद भी रहा होगा. एक डब्बा देखकर अनुमान लगाया कि इसमें बारुदी सुरंग होने चाहिए.

कपड़े तो भीगे ही हुए थे. हमने कीचड़ में सने और भीगे हुए अपने जूते फिर से पहन लिए. पीठ पर उपकरणों और कपड़ों से भरा बैग फिर लद गया था. टॉर्च ले जाना हम भूल गए थे.

दुष्कर चढ़ाई

Image caption नक्सली प्रभावित दो ज़िलों को सरकार ने पिछले हफ़्ते ही विशेष सहायता देने की घोषणा की है

अब पहाड़ की चढ़ाई शुरु हुई. हल्की-हल्की फुहारें पड़ रहीं थीं.

ऐसी दुष्कर लगने वाली यात्राएँ नेशनल ज्योग्राफ़िक और डिस्कवरी चैनलों पर ही देखीं थीं. अब अपनी बारी थी. सौ मीटर चढ़े होंगे कि पुरुषोत्तम का पैर फिसल गया. वो लुढ़क गए. उन्हें सव्यसाची ने हाथ पकड़कर ऊपर खींचा और फिर हम चल पड़े.

अचानक मेरी साँसे फूलने लगी, पेट में दर्द होने लगा. बारिश में भी मैं पसीने में भीग गया था. मैं एक पत्थर पर बैठ गया. सैकड़ों लड़ाकों का नेतृत्व करने वाले सव्यसाची ने एक हाथ पंखा निकाला और मुझे पंखा झेलने लगे. मेरे लिए यह असहज था, लेकिन मैं क्या करता?

थोड़ी देर बाद फिर चढ़ाई शुरु हुई और आख़िर पड़ाव आ गया. लड़कियाँ ऊपर पहुँचकर टेंट लगाने के लिए ज़मीन को समतल कर रही थीं और पानी बहने के लिए रास्ता बना रहीं थीं. पुरुषोत्तम ने उत्सुकता से पूछा, साँप नहीं आते? और जवाब मिला, “बारिश में नहीं आते, लेकिन हमारे पास इंजेक्शन है.”

फिर सव्यसाची ने अपने बैग से ‘पैरालफ़िन’ की दो टैबलेट देकर खाने को कहा. यह मलेरिया का इलाक़ा है और ‘फ़ाल्सीफ़ेरम’ की बड़ी शिकायतें हैं. फ़ाल्सीफ़ेरम यानी मलेरिया का वह प्रकार जिससे मस्तिष्क ज्वर हो जाता है. अचानक अहसास हुआ कि हमारी तैयारी कितनी अधूरी थी.

दिन भर की थकान से नींद तो आ गई लेकिन बार-बार खुलती रही. पहली बार खुली तो पुरुषोत्तम उड़िया में सव्यसाची को बता रहे थे कि मैं उनके संगठन और मानवाधिकार के बारे में क्या सोचता हूँ. मैं थोड़ी देर सुनता रहा, फिर नींद आ गई.

Image caption सव्यसाची ने धैर्य के साथ हमारी ज़रुरतों के मुताबिक़ जगहों पर बैठकर बातचीत की

अगला पूरा दिन नक्सली आंदोलन, उसकी दशा और दिशा के बारे में बात करते बीता. थोड़ी औपचारिक और ज़्यादा अनौपचारिक. तस्वीरें खींची जाती रहीं. बारिश लगातार जारी थी.

दोपहर को नीचे गाँव से खाना आया तो पता चला कि चावल के साथ आम की गुठलियाँ उबाली हुई हैं. वहाँ का आम भोजन. सव्यसाची ने निर्देश दिए कि वह खाना हमें न खिलाया जाए, हम हजम नहीं कर सकेंगे. फिर आलू और सोयाबीन की बड़ियों की सब्ज़ी के साथ उसना चावल मिला. साथ में सूखी हुई मछली, जिसका उड़िया नाम था – सुखवा.

रात को झींगुरों की अथक पुकारों के बीच हम लड़कियों से आंदोलन के बारे में चर्चा करते रहे. रात को सव्यसाची के एक और साथी आ गए. उनका नाम रवि था. वे इस बात से नाख़ुश थे कि सव्यसाची का दस्ता किसी गाँव के इतने नज़दीक रह रहा है. उनकी राय में यह सुरक्षा के लिए ठीक नहीं था. सव्यसाची ने कहा कि हमारी वजह से वह भीतर नहीं गए.

सुबह साढ़े पाँच बजे हमने वापसी के लिए अपना सारा सामान फिर से अपनी पीठ पर लाद लिया. लेकिन मन पर बोझ पहले से बहुत ज़्यादा था.(समाप्त)

(ये तो हुई नक्सली कैंप की यात्रा की डायरी, अंगले अंकों में पढ़िए सव्यसाची के विचार और विभिन्न नक्सली मसलों पर विशेषज्ञों की राय. डायरी और इससे जुड़ी अन्य ख़बरों पर अपनी राय हमें भेजिए - hindi.letters@bbc.co.uk पर - संपादक )

संबंधित समाचार