किसानों की मौत कोई मुद्दा नहीं

  • 8 अक्तूबर 2009
एक चुनावी रैली
Image caption विदर्भ में अब कोई भी राजनीतिक दल किसानों का नाम नहीं ले रहा है

भारत में विदर्भ अपनी किसी ख़ूबी या राजनीति के कारण नहीं, अपनी समस्याओं के कारण जाना जाता है.

दिल दहला देने वाली कृषि समस्या जिसके कारण सैकड़ों किसान मौत को चुनने को मजबूर हुए, महाराष्ट्र के अन्य इलाकों की तुलना में विकास में कमी और नक्सलवाद जैसे मुद्दे विदर्भ की पहचान हैं.

पर विदर्भ के केंद्र नागपुर में पूरे अंचल से आए मतदाताओं से बात करें तो ये मुद्दे उसकी गिनती में ही नहीं है.

पिछली विधानसभा में विदर्भ में 66 सीटें थीं जो की परिसीमन के बाद घटकर इस बार 62 रह गई हैं. पिछली बार कांग्रेस- राष्ट्रवादी कांग्रेस को 30 सीटें मिली थीं और भाजपा शिव सेना को 31.शेष अन्य के पास थीं.

किसी आम आदमी से पूछें या फिर अंचल में चुनावी ख़बरें जुटा रहे पत्रकारों से, तो लोग उत्तर मिलेगा कि बिजली कटौती और बढ़ती महंगाई, ये दो मुद्दे बाकि अन्य मुद्दों पर भारी हैं. यहाँ कोई आदमी आमतौर पर आत्महत्या कर रहे किसानों की बात नहीं करता.

वो मुद्दे जिनसे पूरा देश हिल जाता है, संसद की कार्यवाही रुक जाती है, अख़बार और टीवी चैनल बिफ़र जाते हैं वो मुद्दे सामने देखने को नहीं मिलते.

और तो और नेता भी यहाँ पूछने पर ही कृषि समस्या पर बात करते हैं वरना चाँद ले आने के गोल मोल वादे और सबको सुख देने की अच्छी पर ढीली-ढाली बातें करते हैं.

नागपुर से सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और विदर्भ के बड़े नेता विलास मुत्तेमवार कहते हैं, “लोग किसानों की आत्महत्याओं की बात इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि हालात अब बेहतर हो चुके हैं और किसी के भी पास इस समस्या को सुलझा देने के लिए जादू की छड़ी नहीं है.”

हालत का सार बयान करते हुए इंडियन एक्सप्रेस अखबार के ब्यूरो चीफ़ विवेक देशपांडे कहते हैं, “महंगाई का मुद्दा हो सकता है कि चुनावों में काम कर जाए पर जहाँ तक किसानों की समस्या और विकास की कमी का प्रश्न है, ये मीडिया में चर्चा में रहने वाले मुद्दे हैं ज़मीन पर इसका ज्यादा असर नहीं होता.”

विवेक ज़ोर देते हैं कि आम मतदाता जाति और क्षेत्र के आधार पर मत देता है क्योंकि उसके लिए सभी दल बराबर हैं.

पार्टियों का असमंजस

पर संसद में हंगामा तो खडा हुआ ही था. सैकड़ों किसानों ने पिछले सालों में आत्महत्याएँ की हैं.

राहुल गाँधी ने विदर्भ के एक किसान की विधवा कलावती को विदर्भ का चेहरा बना दिया था. भाजपा, वामदलों और स्वयंसेवी संगठनों ने संसद को झिंझोड़ डाला था.

वो आवाजें कहाँ खो गयीं?

दैनिक भास्कर, नागपुर के संपादक प्रकाश दुबे कहते हैं, "विदर्भ में कोई भी पार्टी या संगठन ऐसा नहीं है जो किसी एक मुद्दे को लेकर पूरे अंचल में अभियान चलाए. अधिकांश उम्मीदवार 'आया राम -गया राम' हैं जो चुनावों के चक्कर में किसी दल में पहले कहीं और थे." इसके चलते सब गड्ड मड्ड हो गया है और पार्टियाँ तय नहीं कर पा रहीं हैं कि कहाँ क्या मुद्दा बनाया जाए और किस बात के लिए दबाव बनाएँ, सो हर क्षेत्र में अलग रणनीति है."

वैसे विभीषणों से हर पार्टी परेशान है.

मसलन कांग्रेस के अमरावती से प्रत्याशी राजेंद्र शेखावत जो कि भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के बेटे हैं वो परेशान हैं अमरावती से उनके पहले दो बार जीत चुके सुनील देशमुख से. देशमुख के साथ अमरावती के ज़्यादातर कांग्रेस पार्षद घूम रहे हैं और कई पार्टी कार्यकर्ता भी देशमुख का काम कर रहे हैं.

इसी तरह से कराड़ से एनसीपी के एक बड़े नेता बाबासाहेब पाटिल खड़े हो गए हैं.

भाजपा शिवसेना में विद्रोह उस तरह से नहीं हुआ तो वहाँ राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना है जो विदर्भ में 19 सीटों पर लड़ रही है.

इसके अलावा डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा स्थापित की गई रिपब्लिकन पार्टी और बहुजन समाज पार्टी तो है ही.

यानी हर तरफ़ आग लगी हुई है अब इस भगदड़ और अंधाधुंध निशानेबाज़ी में सत्ता का आम किसके पत्थर से टूट कर किसकी झोली में गिरता है देखना रोचक होगा.

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