नक्सली नेता का सरकार पर पलटवार

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माओवादियों या नक्सलियों का कहना है कि भारत सरकार उनके संगठन और ताक़त को लेकर दुष्प्रचार कर रही है.

उनका कहना है कि न तो उनके संगठन का प्रभाव इतना व्यापक है और न उनके पास ऐसे आधुनिक हथियार हैं, जैसा भारत सरकार बता रही है.

प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के एक प्रमुख नेता सव्यसाची पंडा ने उड़ीसा के जंगलों में एक नक्सली कैंप में हुई बातचीत में बीबीसी से कहा है कि ‘दमन की योजना के बीच बातचीत का प्रस्ताव सरकार का नाटक’ है.

बस्तर में नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे आदिवासियों के तथाकथित स्वस्फ़ुर्त आंदोलन सलवा जुड़ुम के बारे में उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की वजह से उनके संगठन को बहुत फ़ायदा हुआ है.

नक्सली मामलों के बहुत से जानकार कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के ‘निर्णायक लड़ाई’ के फ़ैसले से माओवादी संगठन में भय का वातावरण है.

केंद्र सरकार संकेत दे रही है कि जल्द ही वह राज्य सरकारों के साथ मिलकर नक्सलियों के ख़िलाफ़ बडा़ अभियान छेड़ने जा रही है.

माना जा रहा है कि तीन राज्यों के चुनाव निपट जाने के बाद सरकार ऐसा कोई क़दम उठा सकती है.

दुष्प्रचार क्यों?

पिछले महीने दिल्ली में पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दोहराया कि नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं.

एक तो हमारी ताक़त को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर सरकार दमन के लिए बड़ी योजना बना सकती है और बड़े बजट का प्रावधान किया जा सकता है जिससे मंत्रियों और अफ़सरों को भ्रष्टाचार का अवसर मिलेगा

सव्यसाची पंडा, माओवादी नेता

पिछले कुछ बरसों में प्रधानमंत्री यह बात कई बार कह चुके हैं.

लेकिन गृहमंत्री ने पहली बार एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया और कहा कि नक्सलियों का प्रभाव देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में फैल चुका है.

उन्होंने नक्सली हिंसा के आंकड़े भी दिए और कहा कि नक्सली हिंसा से देश में सबसे अधिक लोग मारे जा रहे हैं.

लेकिन युवा माओवादी नेता सव्यसाची पंडा ने इन आंकड़ो को ग़लत बताते हुए कहा कि सरकार माओवादियों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार कर रही हैं.

लेकिन सरकार ग़लत आंकड़े क्यों पेश करेगी, इस सवाल पर वह कहते हैं, “एक तो हमारी ताक़त को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर सरकार दमन के लिए बड़ी योजना बना सकती है और बड़े बजट का प्रावधान किया जा सकता है जिससे मंत्रियों और अफ़सरों को भ्रष्टाचार का अवसर मिलेगा.”

वे कहते हैं, “जहाँ तक प्रभाव का सवाल है तो हमारा प्रभाव तो पूरे देश में है लेकिन जितने ज़िलों की बात सरकार कह रही है उतने ज़िलों में हमारा संगठन नहीं है.”

सफ़ाई देते हुए वे कहते हैं कि जिन स्थानों में भी नक्सलियों ने छिटपुट घटना को अंजाम दिया सरकारी आंकड़ों में वहाँ उन्हें प्रभावी मान लिया गया है.

इसी तरह वे सरकार के इन दावों का भी खंडन करते हैं कि माओवादियों के पास वैसे अत्याधुनिक हथियार हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है.

उनका कहना था, “हमारी स्थिति पहले से अच्छी हुई है लेकिन अभी भी ज़्यादातर वही हथियार हैं जो पुलिस के पास हैं क्योंकि ज़्यादातर हथियार तो उनसे ही लूटे हुए हैं.”

उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास हथियार हासिल करने के कुछ और ज़रिए भी हैं. लेकिन इसका ब्यौरा देने से उन्होंने इनकार कर दिया.

सव्यसाची पंडा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस बात को भी दुष्प्रचार मानते हैं कि बुद्धिजीवियों में माओवादियों का प्रभाव बढ़ रहा है.

वह कहते हैं, “साज़िश की जा रही है कि बुद्धिजीवियों को माओवादी बताकर मार दिया जाए. कलकत्ता में हमने देखा है कि कैसे बुद्धिजीवियों नक्सली बताकर मारा गया था.”

उन्होंने कहा कि यदि बुद्धिजीवी शोषित, पीड़ित जनता की चिंता कर रहे हों और उनकी बातें माओवादियों की बातों की तरह लग रही हों तो इसका मतलब यह नहीं कि बुद्धिजीवी माओवादी हो गए हैं.

'आतंकवादी नहीं हैं'

सव्यसाची पंडा

सव्यसाची पंडा के पिता ज़मींदार थे और सीपीएम के विधायक भी.

प्रधानमंत्री नक्सलियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हैं और भारत सरकार अख़बारों में विज्ञापन प्रकाशित करवा रही है जिसमें उन्हें नृशंस हत्यारा बताया जा रहा है.

अब गाहे-बगाहे उन्हें ‘आतंकवादी’ भी कहा जाता है.

सव्यसाची से जब पूछा कि क्या नक्सलवादी आंदोलन ‘आतंकवादी आंदोलन’ में तब्दील हो गया है, उन्होंने बेबाकी से कहा कि नक्सलियों को क्रांतिकारी तो कहा जा सकता है लेकिन वे आतंकवादी नहीं हैं.

फिर उन्होंने कहा, “पूंजीवादियों, ज़मींदारों और साम्राज्यवादियों के लिए तो हम आतंकवादी हो सकते हैं लेकिन आम जनता के लिए हम आतंकवादी नहीं हैं.”

आंतरिक सुरक्षा के सवाल पर उन्होंने कहा कि नक्सली आंदोलन मनमोहन सिंह की सरकार के लिए तो ख़तरा है लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा को उनसे कोई ख़तरा नहीं है.

अपना कर्तव्य निभा रहे निर्दोष पुलिस और दूसरे सरकारी कर्मचारियों को मारने के सवाल पर वे कहते हैं कि उन्हें अंदाज़ा है कि वे सिर्फ़ अपना काम कर रहे होते हैं लेकिन जिस संघर्ष में वे हैं उसमें यह सवाल महत्वपूर्ण होता है कि वे किसके आदेशों का पालन कर रहे हैं.

इसके बाद वह पुलिस के अत्याचारों और नक्सली बताकर निर्दोष आदिवासियों को मार देने, महिलाओं से बलात्कार करने के मामले उठाते हैं और कहते हैं कि पुलिस उनके साथियों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार रही है.

दूसरे संगठनों के संबंध

सरकार जितना प्रचार-दुष्प्रचार कर रही है और जितना आतंक फैला रही है कि माओवादियों का साथ देने से दमन होगा तो लोगों के मन में एक डर है इसलिए वे सीधे-सीधे हमारे साथ आने में डरते हैं

सव्यसाची पंडा, माओवादी नेता

आमतौर पर यह धारणा है कि चीन की माओवादी सरकार से भारत के माओवादियों को समर्थन मिलता होगा, लेकिन माओवादी नेता ने कहा कि यह ग़लत धारणा है.

उनका कहना था, “पहले के चीन और अभी के चीन में काफ़ी अंतर है. माओ के देहांत के बाद चीन ने जो रास्ता अपनाया वह क्रांति का रास्ता नहीं है वह पूंजीवादी रास्ता है. अब वहाँ पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है.”

इसी तरह नेपाल के माओवादियों के विषय में उन्होंने कहा, “हथियार बंद आंदोलन करके कुछ लोग भटक जा रहे हैं, नेपाल में भी यही हुआ है. वहाँ पार्टी के लोगों ने दलाल-पूंजीवादी लोगों से समझौता कर लिया है.”

नेपाल के माओवादियों के हथियार छोड़ देने को वे साम्राज्यवादियों के सामने हथियार डाल देना मानते हैं और उन्हें ‘सुधारवादी’ कहते हैं.

श्रीलंका में एलटीटीई की पराजय को भारत के माओवादी एक सबक की तरह देखते हैं. सव्यसाची ने उनकी ग़लतियाँ गिनाते हुए कहा, “गुरिल्ला छापामार युद्ध में सबसे ख़तरनाक होता है, अपनी ताक़त को अधिक मान लेना और एलटीटीई ने यही ग़लती की.”

लेकिन भारत में दूसरे विद्रोही आंदोलनों से संबंध के बारे में पूछने पर वह सचेत होकर जवाब देते हैं और यह विवरण नहीं देते कि उनके बीच संपर्क-संबंध कैसा है.

कहते हैं कि माओवादी चाहते हैं कि इस तरह के संगठन किसी दिन एक साथ आ जाएँ.

पूर्वोत्तर के विद्रोही संगठनों से अपने संबंधों को वे स्वीकार करते हैं और जम्मू-कश्मीर के संगठनों के संघर्ष को न्यायोचित ठहराते हैं.

भविष्य की योजना

गोलियाँ

सव्यसाची कहते हैं कि उनके पास वही हथियार हैं जो पुलिस के पास हैं, क्योंकि ज़्यादातर उन्हीं से लूटे हुए हैं

भविष्य की योजना के सवाल पर वे कहते हैं कि माओवादी आंदोलनकारी पाँच-दस साल की कोई योजना नहीं बनाते.

लेकिन वह बताते हैं कि अब माओवादी छापामार युद्ध को दूसरे स्तर पर यानी चलायमान युद्ध के स्तर पर ले जाना चाहते हैं और ‘पीपुल्स गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी’ (पीजीएलए) को मज़बूत बनाना चाहते हैं.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने स्वीकार किया उनके आंदोलन की एक कमज़ोरी है कि देश के कई हिस्सों में आदिवासी तो उनके आंदोलन के साथ हैं लेकिन दलितों का साथ उनको वैसा नहीं मिला है जैसा मिलना चाहिए.

मध्यम वर्ग के समर्थन के बारे में उनका कहना था, “जहाँ शहरों में आंदोलन नहीं है वहाँ लोग हमसे कैसे जुड़ेंगे?”

वह कहते हैं, “सरकार जितना प्रचार-दुष्प्रचार कर रही है और जितना आतंक फैला रही है कि माओवादियों का साथ देने से दमन होगा तो लोगों के मन में एक डर है इसलिए वे सीधे-सीधे हमारे साथ आने में डरते हैं.”

मानवाधिकार के सवाल को माओवादी नेता सत्ता का हथियार मानते हैं और कहते हैं कि मानवाधिकार के क़ानून एकतरफ़ा ही लागू होते हैं.

असहमत

देश के कई राज्यों में छत्तीसगढ़, आंध्र और उडीसा, बिहार, झारखंड में ये लोग आक्रमण स्टेज में हैं लेकिन बहुत से अन्य राज्यों में नक्सली गुरिल्ला ज़ोन बनाने में सक्रिय हो गए हैं

एसएन तिवारी, पूर्व महानिदेशक, उड़ीसा

लेकिन उड़ीसा में पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत हुए और केंद्रीय ख़ुफ़िया तंत्र में काम कर चुके एसएन तिवारी कहते हैं कि वे सरकार के इस आकलन से सहमत हैं कि नक्सलियों का फ़ैलाव 200 से अधिक ज़िलों में हो चुका है.

उनका कहना है, "नक्सली जो यह कह रहे हैं कि सरकार झूठा प्रचार कर रही है कि इनका इतना प्रसार नहीं हुआ है, मैं इससे सहमत नहीं हूँ."

वे कहते हैं, "देश के कई राज्यों में छत्तीसगढ़, आंध्र और उडीसा, बिहार, झारखंड में ये लोग आक्रमण स्टेज में हैं लेकिन बहुत से अन्य राज्यों में नक्सली गुरिल्ला ज़ोन बनाने में सक्रिय हो गए हैं."

तिवारी मानते हैं कि राज्यों में विकास की कमी ने नक्सलियों को पनपने का मौक़ा दिया लेकिन अब नक्सली ख़ुद विकास नहीं होने देना चाहते.

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