भाजपा की 'सेहत' ठीक नहीं

  • 13 अक्तूबर 2009
Image caption भाजपा इस बार अकेले चुनाव लड़ रही है

हरियाणा चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रमुख हिंदी दैनिक के पहले पन्ने पर भाजपा की तरफ़ से पार्टी को वोट देने की अपील छापी गई.

इस चुनावी विज्ञापन में बड़ी सी तस्वीर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की नहीं, लाल कृष्ण आडवाणी की नहीं, सुषमा स्वाराज की नहीं, बल्कि बीमार पड़े पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की थी. सवाल उठे कि क्या राज्य में भाजपा की स्थिति इतनी ख़राब हो गई है कि पार्टी को बीमार पड़े वरिष्ठ नेता के नाम का सहारा लेना पड़ रहा है.

कहा गया कि ऐसा विज्ञापन देना वोटरों को रिझाने की आखिरी कोशिश जैसा ही था.

इस पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कृष्णपाल गूजर कहते हैं कि पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीर पहले भी इस्तेमाल करती रही है और इसमें कोई नई बात नहीं.

प्रेक्षकों के मुताबिक हरियाणा में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं कही जा रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को मात्र दो सीटें मिली थीं. कुछ महीने पहले संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल यानी आईएनएलडी के साथ चुनाव लड़ा और उन्हें एक भी सीट नहीं मिली.

इस चुनाव में भी पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी नज़र आ रही है, हालांकि कृष्णपाल गूजर कहते हैं कि उनकी पार्टी ज़ोरशोर से महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठा रही है और उनकी पार्टी की प्रदेश में कमज़ोर स्थिति की बातें निराधार हैं.

उम्मीद नहीं

Image caption भाजपा का पारंपरिक वोटर उससे दूर हुआ है.

भाजपा नेता राज्य में सरकार बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन निजी बातचीत में वो मानते हैं कि पार्टी को बहुत ज़्यादा सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है और उनका मक़सद लोक दल को पीछे छोड़ दरअसल प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरने का है.

लेकिन पार्टी के लिए अच्छी ख़बरें नहीं आ रही हैं. ख़बर आई कि पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष स्वामी राघवानंद ने नाटकीय रूप से राजनीति से संन्यास ले लिया. मतदान के ठीक पहले हुई इस गतिविधि से पार्टी स्तब्ध है, हालांकि पार्टी नेताओं से पूछें तो वो कहते हैं कि ये कोई बड़ी घटना नहीं है.

चुनाव प्रचार के दौरान हमने पाया कि एक तरफ़ जहाँ कांग्रेस, आइएनएलडी और हरियाणा जनहित कांग्रेस के पोस्टरों से गाँव, शहर पटे पड़े हैं, गाँव स्तर पर, या ब्लॉक स्तर पर इनके समर्थन में सभाएं हुईं, भाजपा के बारे में हम ऐसा नहीं कह सकते. हमने रोहतक में पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करनी चाही तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया.

विश्लेशक के मुताबिक भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी है, औऱ ये इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि लोगों का पार्टी में विश्वास कम हुआ है. इसके लिए वो पार्टी की गठबंधन पर ढुलमुल नीति को दोष देते हैं.

1999 का लोकसभा चुनाव आईएनएलडी ने एनडीए के साथ लड़ा था और सभी दस सीटों पर जीत हासिल की लेकिन ये गठबंधन 2004 में टूट गया.

गठबंधन से नुकसान

इस लोकसभा चुनाव से ठीक पहले फिर दोनों पार्टियाँ साथ आईं लेकिन उन्हें एक भी सीट नहीं मिली.

फिर विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा-आईएनएलडी का गठबंधन नहीं हो पाया, कोशिशें की गईं कि हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए लेकिन ये भी नहीं हो पाया.

रोहतक में वरिष्ठ पत्रकार पुरुषोत्तम शर्मा कहते हैं,"आईएनएलडी के साथ जाने का नुकसान भाजपा को हुआ. भाजपा का परंपरागत शहरी तबके का वोटर आईएनएलडी के राज से नाखुश था और जब उसने भाजपा को आईएनएलडी के साथ जाते देखा तो वो कांग्रेस के साथ हो लिया."

माना जाता है कि आईएनएलडी के साथ गठबंधन को लेकर स्थानीय और केंद्रीय भाजपा नेतृत्व में मतभेद थे.

भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य प्रदीप जैन मतभेदों से इनकार नहीं करते. वो कहते हैं, "जो लोग कहते हैं कि मतभेद नहीं थे वो सही बात करने का साहस नहीं करते हैं लेकिन अब पार्टी भविष्य की ओर देख रही है."

भाजपा नेताओं का कहना है कि वो पार्टी को अगले चुनाव के लिए तैयार करने के लिए सभी 90 चुनाव क्षेत्रों में चुनाव लड़ रहे हैं.

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