नरेगा में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम

ग्रामीण महिलाएँ
Image caption ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में भारी भ्रष्टाचार की ख़बरें आ रही हैं

भारत में गरीबों के लिए बनी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में लगे भ्रष्टाचार के घुन को ख़त्म करने के लिए सामाजिक संगठनों ने कमर कस ली है.

इन संगठनों ने सरकार के साथ मिल कर राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले में नरेगा के काम का सामाजिक ऑडिट किया तो कई खामियों और घोटालों का पता चला.

हालाँकि अनेक पंच सरपंच इस ऑडिट के ख़िलाफ़ थे. मगर जनता इसके पक्ष में खड़ी हो गई.

केंद्र सरकार ने सभी पंचायतों को हिदायत दी है कि वो अपने नोटिस बोर्ड पर नरेगा की पूरी सूचना प्रदर्शित करें.

कोई दस दिन तक चले इस ऑडिट अभियान में देश भर से आए सामाजिक कार्यकर्ता गाँव गाँव घूमे, नरेगा का काम देखा,लोगों से मिले और इसमें हुए खर्च का हिसाब लिया.

कोई ग्यारह पंचायतों में 20 करोड़ रूपए का काम हुआ. मगर घोटाले का हिसाब किया गया तो एक करोड़ रूपए से ज्यादा का भ्रष्टाचार सामने आया.

अभियान के तहत गावों की चौपलों पर भीड़ उमड़ी और नरेगा में हुई गड़बडियों की पोल खुलती गई.

जनता का ऐसा दबाव ऐसा बना की नरेगा का धन हड़पने वालो में से कुछ को हाथों हाथ रकम वापस जमा करनी पड़ी.

अनेक वंचित मजदूरों को उनकी मजदूरी मिली तो ओमप्रकाश जाट ऐसे कदाचित पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें मांगने पर भी काम मुहैया नहीं करने पर सरकार को चार हज़ार रूपए बेरोजगारी भत्ता देना पड़ा.

भीलवाड़ा केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी का चुनाव क्षेत्र भी है.

इन घोटाले के सामने आने के बाद सीपी जोशी ने कहा अब देश की सभी पंचायतों को नरेगा के काम और जानकारी को अपने नोटिस बोर्ड पर प्रमुखता से प्रकशित करना होगा.

भारी भ्रष्टाचार

नरेगा के काम में कुछ स्थानों पर अच्छा काम भी हुआ, लेकिन ज्यादातर स्थानों पर ऐसी व्यापारिक संस्थाओं को लाखों रूपए दे दिए गए जिनका ढूँढने पर कोई वजूद ही नहीं मिला.

जिले के बरन गाँव में हमें रघुनाथ चौधरी मिले तो कहने लगे, ‘ये बहुत बढ़िया काम हुआ. इससे हम लोगो में नरेगा के प्रति जागरूकता बढेगी. अब सरपंच और सचिव मनमानी नहीं कर पाएंगे.’

ऑडिट दल के एक सदस्य तोलाराम कहते है कि भ्रष्टाचार बहुत हो गया है.

कुछ स्थानों पर तो सरपंच ने साफ़ कहा कि हमें 10 से 12 फीसद ऊपर भी देना पड़ता है.

इस अभियान का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने किया.

वे कहती है,’’ सामाजिक ऑडिट बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये ग़रीब की रोजी रोटी से जुड़ा मामला है.हम इस पूरे काम में पारदर्शिता चाहते हैं.’’

सरपंच संघ के अध्यक्ष किशोर शर्मा कहते हैं,'' हमें इस ऑडिट पर कोई आपत्ति नहीं है. हाँ इतना ज़रूर है कि पंचायत के पास इस काम को अंजाम देने की कोई कुशल मानव शक्ति नहीं है. भारत में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं और बात आई गई हो जाती है. मगर इस अभियान में कई लोगों ने गड़बड़ी सामने आने पर रूपए सरकार को जमा करने में ही खैर समझी.''

ऑडिट दल के धूडाराम गोयल बताते हैं,'' एक गाँव में ग्राम सचिव के विरूद्व गड़बड़ी के आरोप साबित हो गए. ग्राम सचिव ने मौक़े पर ही कबूल कर लिया और बदले में कोई सवा लाख का चैक जमा कर अपनी जान छुड़वाई. शुरू में अनके पंच सरपंच स्थानीय नेताओं की मदद से इस ऑडिट के विरुद्ध संगठित हुए, पर उनकी दाल नहीं गली.''

ऑडिट के लिए कोई 135 दल गठित किए गए थे. ये दल गाँव गाँव गए.

इस अभियान में लगे दो हज़ार कार्यकर्ता भीलवाड़ा के 1600 गाँवों में घूमे, पदयात्रा की, जन जागरण किया और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का अलख जगाया.

सामाजिक ऑडिट

जब ऑडिट के बाद गांवों की चौपलों पर पंचायत बैठी तो वहां नरेगा में अच्छे काम के किस्से थे तो भ्रष्टाचार की गाथाएं भी सुनाई दीं.

जिला कलेक्टर मंजू राजपाल ने कहा कि अभी हमने बीस करोड़ के काम का ऑडिट करवाया है और इसमें एक करोड़ की गड़बड़ी सामने आई है. हम इसमें शामिल लोगों के विरूद्व कार्रवाई करेंगे. अब तक कोई नौ मामलों में प्राथमिकी दर्ज कार्रवाई है.

जहाँ लोग इस अभियान की तारीफ़ में खड़े थे वही सियासी नेतृत्व में बैचेनी पाई गई.

आंध्र प्रदेश में सामाजिक ऑडिट की एक सलाहकार सौम्या कहती है कि नरेगा में घोटाले रोकने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि सामाजिक ऑडिट की सीख आंध्र को राजस्थान से ही मिली थी. दोनों राज्य इस मामले में एक दूसरे से सीख सकते है.

भारत में ग़रीबों के लिए योजनाएँ तो बहुत बनती है. मगर ग़रीब के हाथ का निवाला छीनने वाले लोग बहुत ताकतवर है.

अब इन सामाजिक संगठनों को भरोसा है कि कई सामाजिक ऑडिट ऐसे हाथों को कमजोर कर देगा जो निर्धन का निवाला छीन लेते है.

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