घर वापसी के लिए जेल की यात्रा

जावेद मक़सूद अहमद
Image caption जावेद रोज़गार की तलाश में सऊदी अरब गए थे लेकिन उनके पास वैध वर्क परमिट नहीं था

जेल शब्द अपने आप में डर का एहसास कराता है लेकिन जब सवाल पापी पेट का हो तो जेल जाने में बुराई क्या है. ये कहना है लखनऊ के चिकन कारीगर जावेद मक़सूद अहमद का जो जेद्दा (सउदी अरब) से भारत मुफ़्त में आने के लिए जानबूझ कर जेल गए.

रोज़गार की तलाश में भारत के बहुत से लोग खाड़ी देशों की ओर रुख़ करते हैं. वीज़ा संबंधी कड़े नियमों के कारण रोज़गार के लिए वीज़ा मिलना इतना आसान नहीं होता है. ऐसे में लोग वहाँ उमरा वीज़ा लेकर जाते हैं. यानी हज के समय के अतिरिक्त मक्का-मदीना की यात्रा के लिए लोग सऊदी अरब जाते हैं जिसकी अवधि 45 दिनों की होती है. उसके बाद वे लोग वहीं रह कर छोटे मोटे रोज़गार करने लग जाते हैं.

चूँकि इनके पास कोई वैध 'वर्क परमिट' नहीं होता है ऐसे में उनके पकड़े जाने का ख़तरा बना रहता है.

सऊदी अरब के कानूनों के मुताबिक ऐसे पकड़े गए किसी भी व्यक्ति को उसके देश वापस भेज दिया जाता है. पकड़े जाने और अपने देश भेजे जाने के बीच का समय उसे जेल में बिताना पड़ता है.

उल्लेखनीय है कि अवैध रूप से रह रहे ऐसे लोगों को उनके देश भेजने का खर्चा सऊदी अरब की सरकार उठाती है. यह एक ऐसा लालच है जो लोगों को जेल जाने के लिए प्रेरित करता है क्योंकि लौटने की यात्रा मुफ़्त हो जाती है भले ही कुछ दिन जेल में बिताने पड़ते हैं.

जावेद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वे अपने दोस्तों के साथ टूरिस्ट वीज़ा पर सऊदी अरब गए थे. लगभग सत्रह महीने रहने के बाद उन्होंने अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया जिससे उनकी भारत यात्रा मुफ़्त में हो सके. इसके पीछे वे तर्क देते हैं कि उन्होंने सऊदी अरब की जेलों की काफी तारीफ़ सुनी थी, खासकर खाने की और दूसरा मुफ्त में घर वापसी.

हवालात के दिन

जावेद ने भारत लौटने के लिए जेद्दा के नीम गाबा चौराहा पर अपने दोस्तों के साथ खाना खाया तभी पुलिस को देख कर भागने का नाटक किया. पुलिस ने उनको हिरासत में ले लिया. उनके टूरिस्ट वीज़ा की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसलिए उन्हें जेल भेज दिया गया.

जावेद जेल पूरी तैयारी से गए थे. उन्हें पता था कि जेल में तलाशी के वक़्त कैदियों से पैसे छीन लिए जाते थे इसलिए उन्होंने अपने सारे डॉलर मोड़कर अपने रूमाल के किनारों में सिल लिए थे. तलाशी के वक्त उसी रूमाल से अपनी नाक पोंछते रहे जिससे किसी का ध्यान उस रूमाल की तरफ नहीं गया. बाद में इसी पैसों से उन्होंने जेल में कारोबार भी किया. वे जेल के कैदियों को सिगरेट और सिर दर्द की गोलियां बेचते थे. वे जेल के सफाई कर्मियों से थोक में सिगरेट और सिर दर्द की गोलियां मंगवा लिया करते थे.

जावेद और उनके साथी जिस जेल में थे वहां सारे क़ैदी अवैध रूप से रह रहे अप्रवासी ही थे, जिसमें ज्यादातर श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत से थे. वे कहते हैं कि इसलिए वहां का माहौल उतना ख़तरनाक नहीं था. सुबह आठ बजे नाश्ता, दो बजे दोपहर का खाना और रात नौ बजे फिर खाना मिलता था.

जावेद कहते हैं, "इतना पौष्टिक और समय से खाना तो घर पर भी नहीं मिल सकता."

उनके साथ 165 लोगों का दल एक कमरे में रहता था. वे कहते हैं कि जेल के नियम तोड़ने पर बहुत बुरी तरह पिटाई हुआ करती थी.

हालाँकि तेरह दिन की जेल यात्रा को जावेद आज भूलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अपने एक साथी क़ैदी की पिटाई और उसका चीखना आज भी उन्हें परेशान करता है.

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