महाराष्ट्र चुनावः विश्लेषण

Image caption कांग्रेस एनसीपी गठबंधन ने 288 में से 144 सीटें हासिल की हैं

महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन की जीत पर किसी को कोई ताज्जुब नहीं हुआ. जनता का फ़ैसला वही आया जिसका अनुमान लगाया जा रहा था. कांग्रेस की जीत लगभग यक़ीनी थी.

लगातार तीसरी बार जीत के बाद जब मंत्रिमंडल के और मुख्यमंत्री के चयन का मामला आएगा तो कांग्रेस के लिए दिक़्क़तें आ सकती हैं. ये तो तय है कि मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी का ही होगा. लेकिन कांग्रेस का कौन नेता बनेगा मुख्यमंत्री? यही प्रश्न अब सभी ज़ुबानों पर है. मुख्यमंत्रियों के दावेदारों की क़तार यूँ तो ज़्यादा लंबी नहीं है लेकिन इनका क़द ऊँचा ज़रूर है.

मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक चौहान एक बड़े दावेदार हैं इस पद के लिए. लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मानक राव ठाकरे के अनुसार इसका फ़ैसला पार्टी हाईकमान करेगी.

दूसरे हेवीवेट उम्मीदवार हैं दो बार रह चुके मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख. इसका संकेत उस वक़्त मिला जब हाल में उन्होंने पार्टी में अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी नारायण राणे को अपने खेमे में ले लिया. विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री पद से पिछले साल मुंबई में हुए हमलों के बाद हटाया गया था.

हाँ अगर चौहान और देशमुख के बीच मतभेद हुआ तो राणे उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं. वैसे इस पद का हर दावेदार कहता है कि इसका फ़ैसला पार्टी आला कमान करेगी.

फ़िलहाल पार्टी नेता इस बात से खुश हैं कि एक बार फिर वे सत्ता में बने रहेंगे और यह राजनीति करने का एक बड़ा मकसद होता है. लेकिन कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की जीत तीसरी बार लगातार मुमकिन कैसे हुई?

यहाँ कई राजनीतिक विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की जीत उनकी उपलब्धियों से ज़्यादा विपक्षी दलों में और ख़ास तौर से ठाकरे परिवार में आपसी दरार के कारण मुमकिन हुई है.

शिव सेना के उद्धव ठाकरे ने शायद अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की ताक़त और उनकी लोकप्रियता को नज़रअंदाज़ किया. उन्होंने चुनाव से पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि राज ठाकरे ख़त्म हो चुके हैं और उनका पर्दाफ़ाश हो चुकाहै. लेकिन शायद अब उन्हें अपने शब्द खल रहे होंगे क्योंकि राज ठाकरे की पार्टी ने “महाराष्ट्र मराठियों के लिए” नारे को बुलंद करते हुए 13 सीटें प्राप्त कर लीं.

राज ठाकरे की पार्टी केवल तीन साल पुरानी है और यह इसका पहला चुनाव है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया. लेकिन शिव सेना की भागीदार भारतीय जनता पार्टी के एक नेता माधव भंडारी इस तर्क को ग़लत मानते हैं. उनका कहना है कि 2004 के चुनाव में राज ठाकरे शिव सेना में थे लेकिन फिर भी वे पार्टी को पराजय से नहीं बचा पाए थे. भंडारी के अनुसार कांग्रेस विरोधी वोट के बँटवारे से उनके गठबंधन की हार हुई है.

मंत्रिमंडल के बँटवारे को लेकर भी कांग्रेस को मुश्किलें आ सकती हैं, ख़ास तौर से अपनी भागीदार पार्टी के कारण. पिछले दो बार के फ़ॉर्मूले के अनुसार अगर मुख्यमंत्री कांग्रेस का होगा तो उपमुख्यमंत्री एनसीपी का होगा. इसके इलावा एनसीपी को कई ऐसी सरकारी संस्थाएँ चलाने को मिलेंगी जिनसे पार्टी को हर तरह का फ़ायदा हो सकता है. आने वाले कुछ दिन ख़ुशियों को फ़ीका भी कर सकते हैं.

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