'सामना' में बिफर पड़े बाल ठाकरे

  • 24 अक्तूबर 2009
बाल ठाकरे
Image caption महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई है

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार से शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे को जितनी तकलीफ़ पहुँची है, शायद उतनी किसी और को नहीं.

पार्टी प्रमुख बाल ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजों पर बेहद असंतोष व्यक्त किया है.

बाल ठाकरे का दर्द उनके पूरे संपादकीय में नज़र आता है. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे लिखते हैं, "अब हमारा किसी पर विश्वास नहीं रहा. न जनता पर, न मराठी मानुस पर, न ही देवी-देवताओं पर. इन चुनावों में शिवसेना को अन्य धर्मवालों अथवा परप्रांतियों के बजाय मराठियों ने दगा दिया है."

बाल ठाकरे लिखते हैं कि जिस मराठी मानुस के लिए शिवसेना ने 44 बरसों तक आवाज़ उठाई, उसी मराठी मानुस ने शिवसेना की पीठ में खंजर घोपा.

उनकी नाराज़गी इस बात को लेकर भी है कि जब स्कूल-कालेज में दाख़िला करवाना हो, कचरा साफ़ करवाना हो, बाढ़-भूकंप में मदद की ज़रुरत हो तो लोग शिवसेना को याद करते है पर वोट देते वक़्त भूल जाते है.

बाल ठाकरे ने संपादकीय में लिखा है, "अगर 44 वर्ष के संघर्ष के बाद मराठी मानुस का मानस नहीं जागा तो क्या अगले 44 वर्ष तक शिवसेना को और कोशिश करनी होगी."

आखिर शिवसेना से या नेतृत्व से कहां ग़लती हुई और क्यों मराठी मानुस ने उनकी पुकार नहीं सुनी और वह अपनी अस्मिता के प्रति जागरुक नहीं हो सका, यही सवाल बाल ठाकरे को कुरेद रहा है और उनका निष्कर्ष यहीं है कि ऐसे में क्यों वो इस कोशिश को जारी रखें.

शिवसेना प्रमुख की लेखनी अक्सर गरजती है पर शायद ही कभी मराठी लोगों पर इतना तल्ख प्रहार उनकी क़लम ने किया हो.

शिवसेना को अब शायद आत्ममंथन की ज़रूरत है. साथ ही शायद यह स्वीकारने की भी कि अब उनके ब्रांड की राजनीति के दूसरे विक्रेता राज ठाकरे के रूप में आ गए है और शिव सेना को ज़रुरत है कुछ नया करने-कहने की.

संबंधित समाचार