शिव सेना के लिए किधर है रास्ता...

शिव सेना
Image caption बाल ठाकरे के पास इतनी शक्ति नहीं कि वे पार्टी में अब जान फूंक सके, न ही उद्धव ठाकरे के पास उनके जैसा करिश्मा है

महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में शिव सेना का अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन था. पार्टी को वर्ष 2004 के चुनाव के मुक़ाबले सीटें कम मिली.

मई के महीने में हुए संसदीय चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन काफ़ी ख़राब रहा था. उस समय विशेषज्ञ कह रहे थे कि इसका एक कारण था और वह है राज ठाकरे की पार्टी का अच्छा प्रदर्शन, जिसके कारण शिव सेना के वोट कटे और उसे नुक़सान हुआ. लेकिन यह शिव सेना के कर्ता-धर्ता उद्धव ठाकरे मानने से इनकार करते रहे.

लेकिन कहते हैं कि घर की लड़ाई बाहर लड़ी जाए तो दुश्मनी बढ़ जाती है. ठाकरे भाइयों यानी शिव सेना के उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे के बीच लड़ाई आम चुनाव के बाद और भी बढ़ गई.

यहाँ तक कि राज ठाकरे को महाराष्ट्र का जिन्ना भी कहा गया. दोनों के बीच तू-तू मैं-मैं का फायदा कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भरपूर उठाया.

उद्धव ठाकरे का कहना है कि राज को कांग्रेस ने आगे बढ़ाया है. उनकी पार्टी के कुछ लोगों ने मुझे बताया कि एक साल पहले जब राज ने मराठी मानुष का मुद्दा उठाया था और बाहरवालों के ख़िलाफ़ दंगा किया था तो कांग्रेस की सरकार ने उनके ख़िलाफ़ जान बूझ कर कड़ी कार्रवाई नहीं की ताकि शिव सेना के समर्थक राज को समर्थन दें और नतीज़ा था विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को फ़ायदा.

करिश्माई व्यक्तित्व

Image caption राज ठाकरे तीन साल पहले शिव सेना से अलग हुए थे

लेकिन 13 सीटों के साथ अब राज ठाकरे का हौसला और भी बुलंद होगा और कुछ लोगों का मानना है कि आने वाले दिनों में राज ठाकरे और उनके समर्थक महाराष्ट्र मराठियों के लिए का नारा और भी बुलंद आवाज़ में लगाएँगे.

साथ ही शिव सेना के मराठी समर्थक भी अब राज से हाथ मिलाने की सोच रहे होंगे. अगर ऐसा होता है तो शिव सेना और भी कमजोर होती जाएगी.

बाल ठाकरे की ढलती उम्र में उनके पास इतनी शक्ति नहीं कि वो पार्टी में नई जान फूंक सकें. उनके बेटे उद्धव ठाकरे एक सुलझे हुए व्यक्ति दिखाई ज़रूर देते हैं लेकिन उनके अंदर ना तो अपने पिता जैसा करिश्मा है और न ही राज ठाकरे जैसा.

लेकिन राजनीति में कोई हमेशा के लिए दुश्मन नहीं होता. दुश्मनी दोस्ती में बदलते देर नहीं लगती. राज ठाकरे केवल तीन साल पहले ही शिव सेना से अलग हुए थे.

उनके क़रीबी कुछ पत्रकार कहते हैं कि उन्हें अंदर से शिव सेना के पतन पर अफसोस हो रहा है क्योंकि उन्होंने इस पार्टी को ऊपर उठाने में काफ़ी मदद की थी. इसलिए उनके अनुसार उन्हें इस बात पर कोई ताज्जुब नहीं होगा अगर भविष्य में दोनों भाई हाथ मिला लें.

वैसे भी दोनों भाइयों की लड़ाई केवल आन की लड़ाई है. दोनों पार्टियों के समर्थकों के बीच यह चर्चा पहले से ही आम है. शायद यह उनकी दिली तमन्ना भी है और शिव सेना को पतन से रोकने का फिलहाल यही एक रास्ता नजर आता है.

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