इस्तीफ़ा देने से राजा का इनकार

  • 24 अक्तूबर 2009
ए राजा
Image caption राजा का कहना है कि मोबाइल कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अवगत थे

केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा ने मोबाइल कंपनियों को टू-जी स्पैक्ट्रम लाइसेंस के आवंटन में कथित रुप से हुई अनियमितता के मामले में अपने आपको निर्दोष बताते हुए इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया है.

उन्होंने कहा कि लाइसेंस देने के लिए सभी नियम क़ायदों का पालन किया गया और यह पूरी प्रक्रिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जानकारी में थी.

उनका कहना है कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने कथित अनियमितता के लिए जो मामला दर्ज किया है उसमें उनका नाम नहीं है और यदि दूरसंचार विभाग के किसी अधिकारी ने ग़लती की है या उसने किसी मोबाइल कंपनी को लाभ पहुँचाया है तो इसकी जाँच होनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि इस पूरे मामले की जाँच कर रही सीबीआई ने गुरुवार को दूरसंचार विभाग के मुख्यालय पर छापा मारा था.

इसके बाद प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने ए राजा के इस्तीफ़े की मांग की है. जबकि सीपीएम ने इस मामले में पारदर्शिता की मांग की है.

जानकारों का कहना है कि इस प्रक्रिया में जो अनियमितता हुई है उससे भारत सरकार को हज़ारों करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है.

'मेरे बस में नहीं'

बीबीसी तमिल सेवा से हुई बातचीत में ए राजा ने कहा कि लाइसेंस देने की पूरी प्रक्रिया टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) तय करती है और उसने वर्ष 2001 में एक फ़ार्मूला बनाया था, जिसके तहत लाइसेंस दिए जाते हैं.

उनका कहना है कि जी-टू स्पैक्ट्रम के लिए लाइसेंस भी उसी फ़ार्मूले के तहत दिए गए थे.

यूपीए गठबंधन में शामिल तमिलनाडु की पार्टी डीएमके के कोटे से मंत्रिमंडल में शामिल ए राजा ने कहा कि इस पूरे मामले की चर्चा उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से की थी और प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुमोदन के बाद ही इस बारे में अंतिम फ़ैसला लिया गया था.

उनका कहना है, "लाइसेंस देने के लिए नियमों को बदलना मेरे हाथ में नहीं है और अगर मैं ऐसा कर भी देता तो उसे कोई भी अदालत में चुनौती दे सकता था."

उनका कहना है कि पिछले महीने तक, जब थ्री-जी मोबाइल स्पैक्ट्रम के लिए लाइसेंस के लिए चर्चा हो रही थी, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व वाली मंत्रिमंडलीय समिति ने लाइसेंस शुल्क को बढ़ाने से इनकार कर दिया.

ए राजा का कहना था कि समिति की राय थी कि लाइसेंस शुल्क तो सिर्फ़ प्रवेश शुल्क जैसा है और यदि वृद्धि की जानी है तो स्पैक्ट्रम शुल्क में करनी चाहिए.

विपक्षी दलों के आरोपों के विषय में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें अपने कामकाज के बारे में जयललिता सहित किसी भी विपक्षी नेता से सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए.

क्या है मामला

Image caption हर मोबाइल कंपनी को दूरसंचार विभाग से लाइसेंस लेना होता है

फ़रवरी, 2008 में कोई दो दर्जन नई कंपनियों को मोबाइल लाइसेंस दिए गए थे.

आरोप है कि बाज़ार दरों की तुलना में बहुत कम दरों पर ये लाइसेंस जारी कर दिए गए थे जिससे सरकार को हज़ारों करोड़ रुपयों की राजस्व की हानि हुई थी.

केंद्रीय सतर्कता आयोग ने इस आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की जाँच सीबीआई से करवाने के आदेश दिए थे.

इस प्रक्रिया को लेकर बड़े सवाल उस समय खड़े हुए जब दो कंपनियों, यूनिटेक वायरलेस सर्विसेस और स्वान टेलीकॉम ने लाइसेंस मिलने के कुछ ही दिनों बाद उसे बहुत ऊँची क़ीमतों पर बेच दिया था.

सीबीआई ने एक बयान में कहा है कि उनकी सूचना के अनुसार इन लाइसेंसों के आवंटन में दूरसंचार विभाग के अधिकारियों और लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों के अधिकारियों के बीच साँठगाँठ थी.

विपक्षी दलों का कहना है कि इससे सरकार को 60 हज़ार करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. हालांकि विशेषज्ञों ने 20 से 25 हज़ार करोड़ रुपयों के नुक़सान का अनुमान लगाया है.

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