अल्फ़ा की बातचीत की पेशकश

विद्रोही लड़ाके (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले दिनों अल्फ़ा की स्थिति काफ़ी कमज़ोर हुई है

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के सबसे मज़बूत अलगाववादी संगठन युनाईटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (अल्फ़ा) ने भारत सरकार के सामने बातचीत की पेशकश की है.

लेकिन ईमेल से भेजे गए अपने वक्तव्य में अल्फ़ा चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह बातचीत शुरु करने में 'बाधक की तरह' काम कर रही है.

अल्फ़ा नेता का कहना है कि केंद्र सरकार दूसरे अलगाववादी गुटों के साथ हथियार डालने की शर्त के बिना बात कर रही है जबकि अल्फ़ा पर हथियार छोड़ने के बाद बातचीत की शर्त लगाई जा रही है.

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अल्फ़ा के कट्टरपंथी गुट भी बातचीत के प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि इससे पहले भी एक बार बातचीत की शुरुआत हुई थी और तब कट्टरपंथियों ने इसका समर्थन नहीं किया था.

आरोप

अपने बयान में अरविंद राजखोवा ने कहा है, "वार्ता शुरु करने के लिए केंद्र सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है. एक ओर तो वह नागा विद्रोही संगठन से बिना इस शर्त के बात कर रही है कि वे पहले हथियार छोड़ें लेकिन हमसे बातचीत के लिए पहले हथियार छोड़ने की शर्त लगाई जा रही है."

उनका कहना है कि जब सरकार ने आज तक किसी भी बड़े विद्रोही संगठन से हथियार डालने की शर्त पर बातचीत नहीं की है तो अल्फ़ा को क्यों हथियार छोड़ने चाहिए.

अल्फ़ा चेयरमैन ने कहा है, "हम हमेशा से असम में शांतिपूर्ण समझौते के पक्षधर रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार यह संकेत दे रही है कि बातचीत के ज़रिए समाधान में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है."

उन्होंने दूसरे ऐसे विद्रोही संगठनों की निंदा की है, जो लगातार हिंसा में लगे हुए हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि उनके निशाने पर नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड (एनडीएफ़बी) है, जिसने हाल के हफ़्तों में ग़ैर-बोडो समुदायों पर हमले किए हैं, जिसमें कई लोगों की मौतें हुई हैं.

उन्होंने अपने बयान में कहा है, "असम कई राष्ट्रीयता के लोगों का प्रदेश है. हमें एक दूसरे के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहना चाहिए और हिंसा नहीं करनी चाहिए."

कमज़ोर अल्फ़ा

उल्लेखनीय है कि कई बड़े कमांडरों के पकड़े जाने या मारे जाने से अल्फ़ा को झटका लगा है.

भारतीय ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस बीच बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार भी अल्फ़ा के ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आ रही है. उसने अल्फ़ा के कई नेताओं को 2004 के चित्तगाँग हथियार मामले में गिरफ़्तार किया है.

असम के सबसे अधिक प्रसारित असमिया भाषा के अख़बार 'प्रतिदिन' के संपादक अजित कुमार पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) के सदस्य भी रहे हैं. पीसीजी का गठन वर्ष 2006 मेंअल्फ़ा ने सरकार से बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए किया था. अब पीसीजी प्रभावशाली नहीं है.

वे कहते हैं, "यह तय है कि अल्फ़ा का उदार गुट बातचीत करना चाहता है लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि इस प्रस्ताव को संगठन के कट्टरपंथी गुट का समर्थन है, जिसका नेतृत्व परेश बरुआ करते हैं."

वर्ष 1992 में भी एक बार अरविंद राजखोवा के नेतृत्व में अल्फ़ा के नेताओं ने भारत सरकार के साथ बातचीत की थी लेकिन परेश बरुआ ने इसका विरोध किया था और यह प्रयास विफल हो गया था.

तीन दौरों की बातचीत के बाद वर्ष 2007 में पीसीजी को ख़त्म कर दिया गया था और सरकार ने आरोप लगाया था कि अल्फ़ा संघर्षविराम पर अमल नहीं कर रहा है.

अल्फ़ा का गठन 1979 में असम की आज़ादी के लिए किया गया था.

इस अलगाववादी आंदोलन की वजह से अब तक हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है.

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