नवंबर में मिलेंगे मनमोहन,गिलानी

मनमोहन सिंह और गिलानी
Image caption पिछली बार मनमोहन सिंह और गिलानी की बैठक जुलाई में मिस्र में हुई थी

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरु करने की मंशा ज़ाहिर करने से नवंबर के अंत में उनकी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के साथ बैठक का रास्ता साफ़ हो गया है.

वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि दोनों नेताओं के बीच बैठक राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन के दौरान पोर्ट ऑफ़ स्पेन, त्रिनिदाद और तोबागो में नवंबर 27 से 29 के बीच होगी.

चाहे मनमोहन सिंह ने ज़ोर देकर दोहराया है कि पाकिस्तान उन चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे जो भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं, पर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की इच्छा भी जताई, यदि पाकिस्तान लश्करे तैबा जैसे संगठनों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करता है.

संभव है कि जब दोनों प्रधानमंत्रियों की बैठक होगी तब तक मुंबई हमलों के सात अभियुक्तों को सज़ा मिल पाना संभव न हो. लेकिन पाकिस्तान को यह दर्शाना होगा कि प्रमाणित ढंग से निरंतर कार्रवाई हो रही है.

दिलचस्प बात यह है कि पोर्ट ऑफ़ स्पेन वाली बैठक 26 नवंबर को मुंबई पर हुए हमलों के लगभग एक साल पूरे होने के समय पर ही हो रही होगी.

ऐसा प्रतीत होता है कि भारत सरकार ने अभी भी पाकिस्तान के साथ समग्र वार्ता की प्रक्रिया को शुरु करने या फिर शुरु न करने के बारे में अंतिम फ़ैसला लेना है जिसपर मुंबई हमलों के बाद से विराम लगा हुआ है.

'आशा नहीं छोड़ी है मनमोहन ने'

जुलाई में शर्म-अल-शेख़ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की मुलाकात में चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई और द्विपक्षीय वार्ता की प्रक्रिया दोबारा शुरु होने के बारे में एक सहमती बनी थी. इस पर भारत में मनमोहन सिंह की कड़ी आलोचना भी हुई थी लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के साथ निरंतर संपर्क साधने की मंशा दिखाई है.

अनंतनाग में अपने संबोधन में मुंबई हमलों से पहले की स्थिति का ज़िक्र करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "घाटी में जैसे जैसे चरमपंथ घटा, वैसे वैसे व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन में प्रगति होने लगी. हम सही दिशा में बढ़ रहे थे. पहली बार लोगों में ऐसा विश्वास दिखा कि स्थायी और नर्णायक शांति अब दूर नहीं है."

लेकिन उन्होंने पाकिस्तान को सतर्क भी किया. उनका कहना था, "यह एक ग़लतफ़हमी है कि कोई आतंकवादियों की विचारधारा के साथ समझौता कर सकता है या फिर उन्हें अपने निजी राजनीतिक मक़सदों के लिए इस्तेमाल कर सकता है. अंतत: वे आप ही के ख़िलाफ़ हो जाते हैं और इसका अंजाम केवल मौत और तबाही होता है. पाकिस्तान की जनता अपनी आंखों से आतंकवादियों का असली चेहरा देख सकती है."

ऐसा प्रतीत होता है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दिल से मानते हैं कि पाकिस्तान के साथ शांति कायम होनी चाहिए. स्पष्ट है कि उन्होंने आशा नहीं छोड़ी है कि यदि लश्करे तैबा जैसे संगठनों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होती है तो पाकिस्तान के साथ दोबारा शांति की प्रक्रिया शुरु हो सकती है.

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