बाटला हाउस: न्यायिक जाँच से इनकार

  • 30 अक्तूबर 2009
बाटला हाउस
Image caption कई ग़ैर सरकारी संगठनों ने बटाला हाउस मुठभेड़ को फ़र्ज़ी बताया था

दिल्ली के जामिया नगर इलाक़े में पिछले साल हुए मुठभेड़ के मामले में न्यायिक जाँच की मांग को उच्चतम न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया है.

शुक्रवार को हुई एक सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि इस मामले में अब किसी भी तरह की जाँच से पुलिस का मनोबल प्रभावित होगा.

पिछले साल 19 सितंबर को दिल्ली के जामिया नगर इलाक़े में हुई मुठभेड़ में दो कथित चरमपंथी और दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा मारे गए थे.

पुलिस का कहना था कि मारे गए युवकों के संबंध चरमपंथी संगठन इंडियन मुजाहिदीन से थे. हालांकि स्थानीय लोगों और कई ग़ैर सरकारी संगठनों ने इस मुठभेड़ को फ़र्ज़ी बताया था.

ग़ौरतलब है कि इससे पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बाटला हाउस मुठभेड़ मामले में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दे दी थी.

मनोबल पर असर

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई से इनकार करते हुए कहा, "हज़ारों पुलिस अधिकारी मारे जाते हैं. इससे पुलिस के मनोबल पर गहरा असर पड़ेगा."

आगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे सिर्फ़ उत्पीड़न ही बढ़ेगा.

एक ग़ैर सरकारी संस्था (एनजीओ) 'एक्ट नाउ फ़ॉर हारमोनी एंड डेमोक्रेसी' के वकील प्रशांत भूषण ने पीठ के सामने जब अपनी बात रखते हुए कहा कि एक बड़े समुदाय का विश्वास बटाला हाउस मुठभेड़ के कारण प्रभावित हुआ है, तब पीठ ने इस बात पर अप्रसन्नता ज़ाहिर की कि वे एक विशेष समुदाय की बात उठा रहे हैं.

पीठ ने कहा, "आपको समाज के किसी समुदाय विशेष की बात नहीं करनी चाहिए."

बीबीसी से बात करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा, "आज न तो कोर्ट और न ही मानवाधिकार संस्था राज्य और सत्ता से अलग सोच पा रहे हैं. इससे पता चलता है पुलिस की सोच का इन संस्थाओं पर कितना असर है. इस मामले में आम लोगों का ध्यान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाने की ज़रूरत है."

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