'भीख माँगना अपराध नहीं'

भिखारी
Image caption भारत में अबतक भिख माँगना अपराध माना जाता है

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि ग़रीबी कोई अपराध नहीं है इसलिए भिखारियों को ज़बरदस्ती राजधानी दिल्ली से बाहर नहीं भगाया जा सकता. अदालत के अनुसार ऐसा करना मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है.

मुख्य न्यायधीश एपी शाह और न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने दिल्ली सरकार को फ़टकार लगाते हुए कहा है कि ये हैरानी की बात है कि अपराधी इस शहर में रह सकते हैं, पर वो लोग जो जीने के लिए भिक्षा मांग रहे हैं उन्हें शहर से बाहर निकाला जा रहा है.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर की एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान ये मंतव्य दिया. इस याचिका में उन्होने भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने की मांग की है.

बीबीसी ने हर्ष मंदर से पूछा कि इस जनहित याचिका मे उन्होंने ये मांग किस आधार पर की है, तो उनका कहना था, "भारत में क़ानूनी तौर पर भिखारी की जो परिभाषा है उसके अनुसार भिखारी वो व्यक्ति है जिसके पास जीने का कोई साधन नही है, ना ही उसके पास सिर छिपाने के लिए छत है. ऐसे व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करने की बजाए सरकार ने ख़ुद को ये हक़ दिया हुआ है कि वो ऐसे व्यक्ति को पकड़ कर जेल मे बंद कर दे."

क़ानून अपारध

भारत में भीख मांगना एक क़ानूनी अपराध है और इसके लिए तीन साल तक की सज़ा हो सकती है.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मसले पर महाधिवक्ता की मदद मांगी है कि किस तरह से भीख मांगने को क़ानूनी अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला जा सकता है. पर यहाँ सवाल ये है कि अगर भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा जाए तो भी क्या भीख मांगने को एक अधिकार के तौर पर देखा जा सकता है.

इस पर हर्ष मंदर का कहना है, "मैंने अपनी याचिका मे कई सुझाव दिए हैं पर मौटे तौर पर मैं हम यही कहना चाहते हैं कि ये सरकार को समझना पड़ेगा कि अगर इतनी बड़ी संख्या मे लोग भीख मांग रहे हैं तो इसका मतलब है कि ग़रीबी एक बड़ी समस्या है, और उससे निपटने के लिए उसे सामाजिक सुरक्षा के ठोस उपाय करने चाहिए."

कई बार ये भी देखा गया है की भीख मंगवाने के लिए बाक़ायदा गिरोह काम करते हैं. अगर भीख मांगने को अपराध मानने वाले क़ानून को ख़त्म कर दिया जाए तो क्या ऐसे गिरोहों को बल नही मिलेगा.

इस सवाल के जवाब में हर्ष मंदर कहते हैं, "इस समस्या से निपटने के लिए देश के कई क़ानून मौजूद हैं, लेकिन इस आधार पर लोगों से जीने का हक़ नही छीना जा सकता."

हाल ही मे अंतरराष्ट्रीय संस्था एक्शन एड की एक रिपोर्ट मे कहा गया था कि भारत मे उन लोगों की संख्या तीन करोड़ बड़ गई है जिन्हें भर पेट खाना नही मिलता है.