यमुना के कीचड़ में डुबकी लगाती ज़िंदगी

दिल्ली में बहने वाली यमुना कभी वाकई 'नदी' हुआ करती थी. आज आप यमुना के क़रीब जाते है तो आपको नाक पर रूमाल रखना

पड़ता है.

नदी इंसान को पानी के अलावा बहुत कुछ देती है, यहां तैराकी सीखी जाती है, नाव चलाई जाती है और मछली का शिकार होता है.

लेकिन यमुना का इस्तेमाल अब महज़ दुनिया भर की गंदगी जमा करने के लिए हो रहा है. यमुना नाम के इस नाले से भी चंद लोग अपनी रोज़ी रोटी चला ही लेते है.

कृष्णा और मोइनुद्दीन ऐसे ही लोगों में से है जो रात दिन इस कीचड़ में डुबकी लगाते हैं. पूजा और मन्नत के नाम पर फेंके गए सिक्के और दीगर सामान बटोरकर लाते हैं. आइए सुनते है इन दोनों की कहानी ख़ुद उनकी ज़ुबानी. (सूफ़िया शानी से बातचीत पर आधारित)

कृष्णा की कहानी

नौ साल की उम्र में लखनऊ से भाग कर दिल्ली आ गया था. क्या सोचकर आया था मालूम नही बच्चा था बस भाग आया. जब दिल्ली आया था तब ठंड के दिन थे. पुरानी दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर सिकुड़ा हुआ बैठा था, तभी एक पंडित जी कंबल बांटने आए.

उन्होंने मुझे भी एक कंबल दिया नाम पूछा और कहा—काम करोगे? मैंने न में सर हिला दिया. उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा काम नहीं करेगा तो क्या करेगा चल मेरे साथ मैं तुझे काम सिखाऊंगा. मैं चुपचाप उनके साथ उनके घर सीताराम बाज़ार के नेहरू गली में आ गया.

पंडित जी का नाम वैसे हरिओम था लेकिन आस-पास के लोग उन्हें पंडित जी कहा करते थे.18 साल के उनके साथ में मैंने मिस्त्री का काम और ट्रक चलाना सीखा. वह मेरे खाने और कपड़े का बहुत ख्याल रखते थे. लेकिन उनके गुज़र जाने के बाद मन किसी काम में नही लगा. वापस लखनऊ चला गया.

लखनऊ में मैंने अपनी पंसद की लड़की से शादी की, एक बेटा भी हुआ लेकिन शादी के तीन साल बाद ही बीवी गुज़र गई. बीवी के जाने से मैं बुरी तरह टूट गया था.वापस दिल्ली लौट आया. तब से यह यमुना मेरे अकेलेपन की साथी है. रोज़ इसके किनारे पर खाना बनाता हूं फिर इसमें गोता लगाता हूं.

हर रोज़ सौ पच्चास या कभी उससे ज़्यादा की चिल्लर भी मिल जाती है. एक बार अशर्फी और एक हीरा भी पाया था. उससे कुछ दिन आराम के गुज़र गए थे. इस घाट पर मेरे जैसे 150 गोताख़ोर है जो हर दिन यमुना में गोता लगा कर पैसे बीनते है. जवानी में पानी के अंदर दस मिनट तक सांस रोक लेता था. अब 65 साल का हो गया हूं, तीन मिनट से ज़्यादा सांस नही रोक पाता.

यमुना के किनारे लोग तक़दीर को मनाने भी आते है और जान गवांने भी. अब तक मैं चालीस लोगो की जान बचा चुका हूं. लोग जान बचाने के चार पांच हज़ार देना चाहते है, लेकिन हम इंकार कर देते है.जान बचाने की क्या क़ीमत लेना.

मोइनुद्दीन की कहानी

ग्यारह साल का था जब कोलकाता से दिल्ली आया था.यह सोचकर कि कोई अच्छा काम मिल जाएगा. शुरू में छोटा मोटा काम भी मिला लेकिन हर काम थोड़े दिनो का होता था.

आज भी कोई पक्का काम नही मिलता. हलांकि मैं बिजली का काम जानता हूं. आज मैं तीस साल का हूं. छोटा था तब इस यमुना में नारियल के लालच में आता था. दिन भर में चार-पांच नारियल मिल जाते थे उसमें से एकाद खाया बाकी बेच देता था.

एक दिन देखा कि मुझसे बड़ी उम्र के लोग पानी में डुबकी लगाते है और पांच मिनट बाद मुंह में ढेर सारी चिल्लर लेकर निकलते है.

बस मैंने भी देखा देखी यह काम शुरू कर दिया. रोज़ बस में बीस रूपए ख्रर्च करके यहां आता हूं दिन भर में सौ दो सौ रूपए की चिल्लर या कभी कुछ भी नहीं और कभी सोने और चांदी की छोटी मूर्तियां मिल जाती है.

त्योंहारों पर अच्छा पैसा मिल जाता है. इस नवरात्रें पर भी मैंने एक दिन में तीन हज़ार रूपए कमा लिए.यह काम बस गर्मी-गर्मी भर का होता है. सर्दी में रिक्शा चलाता हूं. हालांकि रिक्शे में इतनी कमाई नहीं है. हर रोज़ सौ रूपए मालिक को देने पड़ते है चाहे ख़ुद के लिए कुछ बचे या न बचे.

पहले यमुना का पानी इतना गंदा नही था.अब गर्मी में थोड़ी परेशानी होती है जब इसके पानी में तीखी बदबूदार गैस बनती है. लेकिन हम लोग ज़्यादा सोचते नही है, सोचेंगे तो जीएँगे कैसे. कोई पक्का काम मिल जाएगा तो यह काम छोड़ देंगे.

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