भारत और चीन - भरोसे का अंत

भारत और चीन के संबंध अभी उथल-पुथल के दौर में हैं और आगे इसकी रूप-रेखा क्या होगी ये अनिश्चित है.

और ये बात यदि भारत के वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हों - चाहे पर्दे के पीछे से ही सही - तो उस पर ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है.

इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि भारत-चीन सीमा पर पिछले 30 वर्षों में कोई गोली नहीं चली, गोला नहीं फूटा. साथ ही इस बात से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि दोनों देशों के बीच 2005 से ही रणनीतिक और सहयोगात्मक साझेदारी है – दोनों देशों के संबंधों पर जो आँच आनी थी वो आ चुकी है.

भारत सरकार के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया,"मीडिया की कृपा से, भारत-चीन संबंध जटिल हो चुके हैं. अब आगे क्या होनेवाला है किसी को पता नहीं".

तो भारतीय मीडिया में एक ‘कहानी’ चली और सरकार ने उसपर ये कहा कि उसकी इसपर निगाह है. और उधर चीन की निगाह इस बात से टेढ़ी हो जाती है कि भारत सरकार ऐसी ‘कहानियों’ का खंडन नहीं करती, बल्कि ये कहती है कि वह इस मुद्दे को देख रही है.

16 अक्तूबर को एक अख़बार में इस रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद कि चीन यार्लुंग ज़ांग्बो नदी पर एक बाँध बना रहा है एक भारतीय प्रवक्ता ने ये प्रतिक्रिया दी – "हम अख़बार की इस रिपोर्ट के बारे में पड़ताल कर रहे हैं कि हाल के समय में ऐसा कुछ तो नहीं हुआ जिससे पता चलता हो कि चीन ने हमसे जो कुछ कहा था उस स्थिति में कुछ बदलाव आ गया है...चीन सरकार ने (पूर्व में) इस बात का सरासर खंडन किया है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी पर किसी बड़े पैमाने की परियोजना चलाने की तैयारी कर रहा है".

भारतीय अधिकारी ऐसी ही रिपोर्टों और ऐसी ही प्रतिक्रियाओं का उदाहरण दे रहे हैं.

प्रतिक्रिया

वैसे कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है. पाँच नवंबर को भारत के जल संसाधन मंत्री पवन बंसल ने कहा,"जिस जगह वे बाँध बना रहे हैं वो हमारी सीमा से 1100 किलोमीटर दूर है. ये एक छोटा बाँध है, कोई बड़ा जल कुंड नहीं. उनके पास पहले ही से ऐसे 15 बाँध हैं जिसका इस्तेमाल वे स्थानीय ज़रूरतों के लिए कर रहे हैं".

पवन बंसल ने कहा कि भारत के लिए चिंता की बात तब होनी चाहिए जब पानी का रास्ता बदला जा रहा हो.

उन्होंने कहा,"अभी तक नदी का मार्ग बदलने का ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है. अभी चिंता की कोई बात नहीं है मगर हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए".

मगर एक रिपोर्ट जब बाहर आ चुकी हो तो उसका खंडन होने में किसकी दिलचस्पी रहती है. शायद बहुत कम लोगों की.

अधिकारी जानना चाहते हैं कि भारत किसी नदी पनबिजली परियोजना का विरोध कर भी सकता है तो कैसे क्योंकि भारत भी तो पाकिस्तान में जानेवाली चेनाब नदी पर बगलिहार बाँध बना रहा है.

सीमा विवाद

नाम ना बताने की शर्त पर अधिकारी ये भी कहते हैं कि चीन के साथ सीमा विवाद के मामले में कुछ भी बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है.

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं 30 अक्तूबर को दिल्ली में इसी तरह की बात कह चुके हैं कि सीमा विवाद के निपटारे को छोड़कर दोनों देश सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमत हुए हैं.

मनमोहन सिंह ज़ोर देकर कहते हैं – "अभी यही स्थिति है".

अधिकारियों का मत है कि सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों के बीच 14 चक्रों में हुई बातचीत से कुछ नहीं निकल सका है.

अधिकारी कहते हैं,"सीमा विवाद के निपटारे की दिशा में बहुत कुछ नहीं हो सका है. भारत का राजनीतिक नेतृत्व इस विवाद को सुलझाने के लिए कई बार प्रयास कर चुके हैं मगर लगता है चीन की इसमें दिलचस्पी नहीं है".

अब दलाई लामा के अरूणाचल प्रदेश का दौरा करने से भारत और चीन के बीच का सीमा विवाद एक बार फिर सतह पर आ गया है क्योंकि चीन अरूणाचल को अपना हिस्सा बताता है.

पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच बड़ी सावधानी से विकसित किया गए संबंध को मीडिया में आई रिपोर्टों से काफी़ धक्का लगा है और चीन सरकार को लगता है कि भारतीय नेताओं को बिल्कुल शुरू में ही इनका खंडन कर देना चाहिए था.

समझदारी

भारत में अभी समझदारी से बोलनेवाले लोग कम हैं और आर्थिक सफलता के खुमार में भारत का कुलीन तबका मानता है कि समय आ गया है जब चीन की परवाह करना बंद किया जाए. हालाँकि वे इस तथ्य की परवाह नहीं करते की चीन एक आर्थिक महाशक्ति है, और भारत नहीं.

चीन पर पैनी नज़र रखनेवाले विश्लेषक नयन चंदा अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लिखते हैं,"चीन के साथ संबंधों को सैनिक ताक़त की कसौटी पर तौलना बहुत बड़ी भूल होगी. चीन से भारत को मिलनेवाली असल चुनौती इन देशों की ठंडी सीमा से आनेवाली चुनौती नहीं बल्कि इसके शहरों की चमक-दमक, उसके बुनियादी ढाँचे, उसके विकास करते उद्योग-धंधों, उसके अच्छे स्कूलों और उसकी उभरती स्वच्छ ऊर्जा तकनीक से मिलनेवाली चुनौती है....वहीं भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी चारों तरफ़ व्याप्त ग़रीबी, कुपोषण, असमानता और अन्याय के अलावा माओवादी हिंसा से भी घिरी है जो चीन का कतई मुक़ाबला नहीं कर सकती".

वे आगे लिखते हैं,"इसका मतलब ये हुआ कि यदि कभी कोई सैनिक संघर्ष हुआ भी तो बहुत संभव है कि अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत अलग-थलग पड़ जाए. पैसे की अपनी ज़बान होती है और ऐसा लगता है कि अभी के समय में लोगों की पसंद मंदारिन है".

भारतीय अधिकारी द्विपक्षीय मुद्दों पर मीडिया की रिपोर्टिंग से मचे बवाल से बिल्कुल थक चुके हैं. असैनिक नौकरशाही जो अभी तक भारत-चीन समीकरणों पर ख़ामोशी अख़्तियार किए रहते रहे हैं, वे भारतीय मीडिया में चीन-विरोधी चर्चाओं से पार नहीं पा रहे.

ऐसे में भारत-चीन संबंध एक दिशाहीन क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं.

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