हिमालय पर रिपोर्ट को चुनौती

हिमालय
Image caption संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के ग्लेशियर दुनिया में सबसे तेजी से पिघल रहे हैं

भारत ने संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट को चुनौती देने का फ़ैसला किया है जिसमें हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पूरी तरह पिघल जाने की बात कही गई है.

केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने सोमवार को हिमालय के ग्लेशियरों के पिघल जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए एक अलग रिपोर्ट जारी की, जिसे भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व उपनिदेशक वीके रैना ने तैयार किया है.

जयराम रमेश ने भारत सरकार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि हिमालय के ग्लेशियरों में ऐसी कोई असामान्य स्थिति नहीं दिख रही है, जिससे लगे कि वे अगले कुछ सालों में समाप्त हो जाएंगे.

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया था कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया में सबसे तेज़ी से पिघल रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो 2035 तक या इससे पहले भी वे पूरी तरह ग़ायब हो जाएंगे.

'दहशत की ज़रूरत नहीं'

इसपर जयराम रमेश का कहना है कि इतनी ‘दहशत’ फैलाने की ज़रूरत नहीं है.

जयराम रमेश ने कहा, "हिमालय के ग्लेशियरों की तुलना अंटार्टिक ग्लेशियरों से करना ठीक नहीं है, क्योंकि हिमालय के ग्लेशियर ज़्यादा ऊंचाई पर हैं. ऐसे में उनपर ग्लोबल वार्मिग का असर कम पड़ रहा है."

सरकारी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को ग़लत बताने वाले अनेक उदाहरण दिए गए हैं और कहा गया है कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले 100 वर्षों में अलग-अलग तरीक़े से व्यवहार करते दिखे हैं.

रिपोर्ट के अनुसार सियाचिन ग्लेशियर में 1862 और 1909 के बीच 700 मीटर की वृद्धि देखी गई, फिर 1929 और 1958 के बीच 400 मीटर की कमी देखी गई, लेकिन पिछले 50 वर्षों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

गंगोत्री ग्लेशियर में भी सितंबर 2007 और जून 2009 के बीच घटाव की दर स्थिर रही.

'असर है पर वैसा नहीं'

वीके रैना ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि हिमालय ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन का असर ज़रूर हो रहा है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं जैसाकि आईपीसीसी कि रिपोर्ट दावा करती है.

उन्होंने कहा कि जयराम रमेश ने तीन हफ़्ते पहले भारत में हिमालय ग्लेशियर पर अब तक हुए काम पर एक रिपोर्ट तैयार करने को कहा था और उनहोंने केवल अब तक हुए शोध के आधार पर अपनी रिपोर्ट बनाई है.

जब उनसे पूछा गया कि आईपीसीसी की रिपोर्ट को नकारने का उनके पास क्या आधार है, तो उनका कहना था, "ये जानने कि ज़रूरत है कि आख़िर आईपीसीसी के कौन से ग्लेशियर विशेषज्ञों ने भारत का दौरा किया और क्या शोध किया है जिसके बिना पर आईपीसीसी ने हिमालय ग्लेशियर के बारे में इस नतीजे पर पहुंचे हैं.

संबंधित समाचार