किन्नरों को 'अन्य' का दर्जा

  • 13 नवंबर 2009
Image caption अब मतदाता सूची मे लिंग के तौर पर 'अन्य' लिख सकते हैं

भारत में चुनाव आयोग ने सैकड़ों साल पुरानी अवधारणाओं को तोड़ते हुए, किन्नरों को एक अलग पहचान देने का फ़ैसला किया है.

गुरुवार को लिए गए एक फ़ैसले में चुनाव आयोग ने व्यवस्था की है कि किन्नरों और समलैंगिकों को अपने लिंग के तौर पर अब पुरुष या स्त्री लिखने की बाध्यता नहीं होगी.

अब ये लोग मतदाता सूची में अपने लिंग के तौर पर अन्य लिख सकते हैं.

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भारत में जनगणना में किन्नरों को अलग से किसी श्रेणी में नहीं रखा जाता लेकिन अनुमान है कि इनकी संख्या लगभग दस लाख तक है.

किन्नर अधिकार समूहों ने चुनाव आयोग के इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

'प्रशंसनीय कार्य'

वर्ष 2002 में मध्यप्रदेश के सुहागपुर विधासभा क्षेत्र से देश के पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी ने इस फ़ैसले पर खुशी ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा, "एक ऐसे समाज को पहचान देकर जो सदियों से तिरस्कार और भेदभाव का शिकार रहा है, चुनाव आयोग ने प्रशंसनीय कार्य किया है."

लेकिन शबनम मौसी ने कहा, "किन्नर समाज को तिरस्कार से बचाने में निश्चित तौर पर ये एक बड़ा कदम है. लेकिन इस दिशा में अभी काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रुरत है."

उन्होंने कहा कि किन्नर समाज काफ़ी समय से राज्य विधानसभाओं और संसद में आरक्षण की मांग कर रहा है.

अपने अनुभव की बात करते हुए शबनम मौसी कहती हैं, "मैं चुनाव जीती, क्योंकि लोग नेताओं से नाराज़ थे. मेरी जीत से मुझे समाज में कुछ सम्मान ज़रुर मिला, पर किन्नर समाज के तिरस्कार को समाप्त करने के लिए उनको समुचित प्रतिनिधित्व देने की ज़रुरत है."

चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार आयोग को इस सिलसिले में कई ज्ञापन मिले. इन ज्ञापनों पर ग़ौर करने के बाद चुनाव आयोग ने महसूस किया कि समाज के एक ख़ास तब़के को क्यों बाहर छोड़ा जाए.

किन्नर समाज को वोट देने के अधिकार और चुनाव लड़ने की अनुमति देने की मांग अलग-अलग राज्यों में उठती रही है.

हाल ही में हुए महाराष्ट्र चुनाव से पहले राज्य मानावधिकार आयोग को एक ज्ञापन दिया गया जिसमें किन्नरों को वोट का अधिकार ना देने को मानावधिकारों का उल्लघंन बताया गया था.

चुनाव आयोग का ये फ़ैसला लगभग उसी समय आया है जब समलैंगिकों को आपसी सहमति से शारीरिक संबध बनाने की आज़ादी देने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले का केंद्र सरकार ने समर्थन किया है.

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