अंबिका सोनी से एक मुलाक़ात

अंबिका सोनी
Image caption अंबिका सोनी का कहना है कि वो किसी योजना बनाकर राजनीति में नहीं आईं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते है.इस हफ़्ते की मेहमान हैं भारत की सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी

सबसे पहले, राजनीति में आप कैसे आईं. आपको देखकर तो लगता है कि आप मॉडलिंग, थिएटर जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी जा सकती थीं?

आज के दिन ऐसी बात सुनना अच्छा लगता है. मैं थिएटर भी कर चुकी हूँ. यूनीवर्सिटी के दिनों में मैंने बहुत से नाटकों में अभिनय किया और कई नाटकों का प्रोडक्शन भी किया. मॉडलिंग तो नहीं की, लेकिन शौकिया तौर पर ड्रेस डिज़ाइनिंग ज़रूर की है.

जहाँ तक राजनीति में आने का सवाल है तो मुझे अब भी इसका जवाब नहीं मिला है. मुझे राजनीति में आए 40 साल हो गए. मेरे आगे-पीछे कोई राजनीति में नहीं रहा. मैं समझती हूँ कि 1969 में हमारे देश की सबसे कामयाब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुझे और मुझ जैसे कई युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया.

हम इंदिरा गांधी और आपके राजनीति में आने की प्रेरणा की बात करेंगे, लेकिन उससे पहले आपके थिएटर के दिनों की बात करते हैं. मैं देख रहा हूँ कि उन दिनों की बातें कर आपके चेहरे पर मुस्कान सी आ रही है?

हाँ, क्योंकि वो शौकिया था. कोई मज़बूरी नहीं थी. अपने दोस्तों के जन्मदिन पर उन्हें कोई तोहफ़ा देना हो तो कोई सलवार-कमीज़ का जोड़ा डिज़ाइन कर देती थी. उन्हें भी खुशी होती थी और मुझे भी बहुत अच्छा लगता था. कॉलेज, यूनीवर्सिटी में लगभग चार-पाँच साल में मैंने थिएटर, नाटक और डिबेट में जमकर हिस्सा लिया.

आप लाहौर से हैं. आपका परिवार वहाँ से यहाँ आया. लाहौर की कुछ यादें हैं?

कई दफ़ा आप कुछ बातें इतनी बातें सुनते हैं कि लगता है कि आपको वे याद हैं, लेकिन मुझे 1947 की कई बातें याद हैं. मेरे पिता अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर थे. उन दिनों बहुत ज़्यादा खून-ख़राबा, हिंसा, रोना-धोना होता था. बड़ी संख्या में शरणार्थी थे. पाकिस्तान से लोग भारत आ रहे थे और भारत से कई परिवार पाकिस्तान जा रहे थे. तो ऐसे कुछ दृश्य हैं जो आज भी मेरे मन में जीवंत हैं. उसके बाद मेरे पिता कई जगह पोस्ट होते गए और ये बातें पीछे छूटती गई.

घर में लाहौर के किस्से होते थे?

हाँ, क्यों नहीं. मेरे माता-पिता के जान-पहचान के कई लोग जान बचाकर यहाँ आए और हमारे पास ठहरे. मेरे नाना-नानी का घर लाहौर में केनाल बैंक रोड पर हुआ करता था. बहुत बड़ा परिवार था. तो कई बार बड़े बुजुर्ग रिश्तेदार उन पुराने अच्छे दिनों की बातें करते हैं.

आप बड़ी होकर पाकिस्तान गईं थी?

मैं पर्यटन मंत्री बनने के बाद 2006 में पाकिस्तान गई थी. अकबर ख़ान की फ़िल्म लेकर हम 40 साल बाद पाकिस्तान गए थे. वहाँ हमें बहुत से लोगों से मिलने का मौका मिला. बुद्धिजीवियों, लेखकों, फ़िल्म निर्माताओं से मिली. लगा ही नहीं कि हमारे बीच इतने मतभेद कैसे हो गए. मैं चूँकि पंजाब से आती हूँ और लाहौर में ज़्यादातर लोग पंजाबी बोलते हैं तो मुझे तो वहाँ घर जैसा लगा.

अंबिका जी आपका बचपन कहाँ-कहाँ बीता?

पिता की अलग-अलग जगह पोस्टिंग हुई. दिल्ली में कॉन्वेंट में स्कूल की पढ़ाई की. फिर पिता की पोस्टिंग चंडीगढ़ हुई. वहाँ मैट्रिक और इंटरमीडिएट किया. फिर वापस दिल्ली आकर इंद्रप्रस्थ कॉलेज में हिस्ट्री ऑनर्स किया. एमए करने से पहले शादी हो गई.

आपकी लव मैरिज थी या अरेंज?

मेरे माता-पिता और सास-ससुर एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे. मेरे पति भारतीय विदेश सेवा में थे. लेकिन मेरे पिता ने कहा कि जब तक ये दोनों एक-दूसरे से मिलकर हामी नहीं भर देते तब तक हम शादी नहीं करेंगे. तो मेरे माता-पिता इतने उदार तो थे ही. तो हमें एक-दूसरे से मिलने के लिए प्रेरित भी किया गया.

लेकिन जब आप कॉलेज में रही होंगी तो वहाँ तो बहुत से लड़के आपसे मिलने की कोशिश किया करते होंगे?

नहीं ऐसी बात नहीं है. वैसे भी इंद्रप्रस्थ कॉलेज उस वक़्त भी कुछ कंजरवेटिव माना जाता था. हालाँकि मैं इस बात पर फ़ख्र महसूस करती हूँ कि मेरी परवरिश बहुत डेमोक्रेटिक तरीके से हुई. मेरे माता-पिता ने मुझे, मेरी बहन और भाई को अपनी पसंद से अपना करियर चुनने और अपने भविष्य के बारे में फ़ैसला लेने का अधिकार दिया. लेकिन उसके साथ-साथ एक दायरा भी तय था. एक अलिखित लक्ष्मण रेखा भी थी.

मैं ऐसा तो नहीं कह सकती कि हम दबे हुए थे या माता-पिता की सख्ती के कारण अपने मन की नहीं कर सके. हाँ, थोड़ा कंजरवेटिव थे. तब मेरी माता-पिता को ये पसंद नहीं था कि हम स्कूल के दिनों में मेकअप करें. आज मेरी पोती 7 साल की ही है, लेकिन वो मैचिंग क्लिप भी लगाती है और चूड़ियाँ भी पहनती हैं.

स्कूली दिनों की याद करें तो आप क्या मानती हैं आप संजीदा थीं या कुछ शैतान?

मैं नाटक भी करती थी और डिबेट आदि में तो मैंने कई ईनाम भी जीते, लेकिन आउटगोइंग नहीं थी. यानी दो विपरीत स्वभाव वाला इंसान मानिए. आज मुझे कोई पहचान नहीं सकता.

मसलन आज मेरी माँ कहती है कि मुझे यकीन नहीं आता कि तुम कभी इतनी शर्मीली और संवेदनशील थी. संवेदनशील तो मैं आज भी हूँ. सार्वजनिक जीवन में आए हुए 40 साल हो गए हैं. कई बातें चुभती भी हैं. लेकिन चमड़ी अभी उतनी मोटी हुई नहीं है, जितनी होनी चाहिए थी.

जब मैं राजनीति में आई तो राजनीति में मेरे आगे-पीछे कोई नहीं था. लेकिन तभी मैंने तय किया था कि दूसरों के दुख दर्द को महसूस करने के लिए संवेदनशील होना ज़रूरी है. सार्वजनिक जीवन में ये ज़रूरी है कि आप दूसरों के दुख दर्द को समझ सकें.

आपने कहा कि आप इंदिरा गांधी से बहुत प्रभावित हुईं. आप इंदिरा गांधी के बारे में क्या सोचती हैं?

मेरा मानना है कि वो बहुत संवेदनशील थी. अगर ऐसा नहीं होता तो लोग उन्हें अम्मा नहीं बुलाते. वो ग़रीब से ग़रीब में ये विश्वास पैदा कर पाती थी कि उनके साथ वे सुरक्षित हैं.

और आपने उनसे क्या सीखा?

उनकी निडर शख्सियत बहुत प्रभावित करती थी. एक बार उन्होंने कहा था कि आपके अंदर कितनी भी शंकाएँ या सवाल क्यों न हों, लेकिन जब लोगों के बीच जाओ तो आपका आत्मविश्वास कम नहीं दिखना चाहिए. तभी लोग आपसे जुड़ेंगे.

देखिए, उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया. देश में तो कई नेता होते हैं जो बहुत लोकप्रिय होते हैं, लेकिन वे दुनियाभर में लोकप्रिय थी. तो उनसे कई चीज़ें सीखने वाली थी.

आपके यूथ कांग्रेस वाले दिन तो बहुत ताक़तवर भी थे और संघर्ष वाले भी?

ये सही बात है. जब मैं आपातकाल के दौरान यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष थी. तब माहौल अलग था. संगठन के तौर पर हमें कुछ नुक़सान भी हुआ. तब जब पार्टी की हार हुई तो ज़्यादातर दोष यूथ कांग्रेस को दिया गया कि इनके कार्यक्रमों के कारण पार्टी हारी. मैं तो आज भी कहती हूँ कि परिवार नियोजन का कार्यक्रम बहुत अच्छा था. साक्षरता अभियान, वृक्षारोपण का कार्यक्रम हमने तब चलाया था. ये सभी दूरदर्शी कार्यक्रम थे.

Image caption पर्यटन मंत्री के रूप में अंबिका सोनी का अतुल्य भारत कार्यक्रम बेहद चर्चित रहा

जब आप संजय गांधी को याद करती हैं तो उनकी कौन सी छवि आपकी दिमाग में आती है?

मुझे लगता है कि बहुत विरोध का सामना कर वो आगे बढ़े. मैं नहीं समझती कि वो तौर-तरीकों में बहुत यकीन करते थे. वो काम होते हुए देखना चाहते थे.

फिर राजीव जी के साथ भी आपने काम किया?

1986 में हमें राजीव जी पार्टी में वापस लाए. मैं कांग्रेस एस में थी. औरंगाबाद में वो हमें पार्टी में वापस लाए. उनकी शख्सियत बहुत लुभावनी थी. मुझे याद है जब वो प्रधानमंत्री बने तो बहुत जगह ये लिखा जाता था कि विपक्ष अब किसका विरोध करेगा.

वो बहुत मिलनसार थे. कार्यकर्ताओं की बात ध्यान से सुनते थे. रेल से पूरे भारत का भ्रमण किया. पंचायतीराज में पहली बार महिला आरक्षण की वकालत की. आज उनका प्रयास कितना सफल हुआ कि तकरीबन 12 लाख महिलाएँ चुनकर आती हैं.

आप सोनिया गांधी की बहुत अंतरंग मानी जाती हैं. उनके साथ काम करने का अनुभव?

सोनिया जी के साथ जब काम करने का मौका मिला तो एक बात तो हम सबके मन में थी , उन्होंने कांग्रेस में सक्रिय होने का फ़ैसला तब किया जब कांग्रेस सबसे कमज़ोर दौर में थी.

ऐसा नहीं था कि उन्हें नेतृत्व थाली में परोस कर दिया गया. वो दौर वो था जब लोग कहने लगे थे कि कांग्रेस दो अंकों में सिमटकर रह जाएगी.

वो सुनती ज़्यादा थी और कहती कम थी. लेकिन अब देखिए वो कितनी अच्छी हिंदी बोलती हैं.

आपके पति विदेश सेवा में थे तो आपने बहुत खूबसूरत जगहें घूमी होंगी?

हाँ बैंकॉक में तीन साल रहे. इसके अलावा मोरक्को, चेकोस्लोवाकिया, इटली में भी रही. क्योंकि मैं राजनीति में थी तो सरकार ने भी काफ़ी उदारता दिखाई. रोम, मोरक्को सभी जगहें बहुत सुंदर थी. चेकोस्लोवाकिया बहुत ख़ूबसूरत मुल्क है. इटली में सड़क पर चलो तो लगता है मानो हर दीवार पर इतिहास लिखा हुआ है.

अंबिका जी को फ़िल्में देखने का शौक है?

बचपन में हमें महीने में एक फ़िल्म देखने की छूट थी. तब लगता था कि कब बड़े होंगे और ज़्यादा से ज़्यादा फ़िल्में देखें.

आपका पसंदीदा अभिनेता, अभिनेत्री?

मैं फ़िल्में ही नहीं देखती. जब मुझे किसी फ़िल्म का प्रोग्राम देखना होता है तो मैं पहले ही उसके बारे में कुछ पढ़ लेती हूँ. बचपन के दिनों में मुझे दिलीप कुमार पसंद थे. इसके बाद अमिताभ बच्चन. इसके अलावा आमिर ख़ान, शाहरुख़ ख़ान, शबाना आज़मी ने जिस तरह से समाज को संदेश देने के लिए काम किया वो काबिलेतारीफ है.

आपने हाल ही में कहा कि आप चाहती हैं कि अब युवा पीढ़ी को आगे आना चाहिए?

हाँ. बिल्कुल. मैं 40 साल से राजनीति में हूँ और दिल से चाहती हूँ कि अब युवाओं को राजनीति में आना चाहिए.

आप इतनी फिट हैं इसका क्या राज है?

मैं योग करती हूँ. मैंने अपने पिता से योग की शिक्षा भी ली है. मैं खाने-पीने का भी ध्यान रखती हूँ. तली हुई चीज़ें कम खाती हूँ.

राहुल गांधी के बारे में आप क्या कहेंगी?

जब राहुल गांधी सांसद बने तो लोग चाह रहे थे कि वो कुछ बड़ी भूमिका निभाएँ. लेकिन उन्होंने अपने क्षेत्र में काम करने को तरजीह दी. वो लोगों के सामने ये मिसाल कायम कर रहे हैं कि अपने क्षेत्र में किस तरह से काम करना चाहिए. तो जिस तरह से वे यूथ कांग्रेस को मजबूत बना रहे हैं और इसमें ज़्यादा से ज़्यादा सक्रिय युवाओं को जोड़ रहे हैं. वो बहुत अच्छा है.

आपकी पसंदीदा डिश कौन सी है?

मुझे चॉकलेट, आइसक्रीम, समोसे और पकौड़े बहुत पसंद हैं. लेकिन इनसे बचने के लिए मुझे मजबूत इच्छा शक्ति रखनी पड़ती है.

अंबिका सोनी अपने बारे में क्या कहेंगी?

मैं महसूस करती हूँ कि सार्वजनिक जीवन में 40 साल गुजारने और शीर्ष नेताओं के संपर्क में रहने के बावजूद मैं आज भी सक्रिय कार्यकर्ता हूँ.

अपने राजनीतिक जीवन में आपको सबसे मुश्किल क्या लगा?

मैं उस दौर से गुजरी हूँ जब राजनीति में महिलाओं को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता था. अब तो हालात बदल गए हैं. महिलाओं के लिए आरक्षण हो गया है. मैं आपको छोटी सी मिसाल दूँगी. एक बार हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यूथ कांग्रेस के एक सहयोगी के प्रचार के लिए गए. एक पब्लिक मीटिंग में पहुँचे तो वहाँ लोग हमें भगाने के लिए लाठी लिए खड़े थे. मैं समझती हूँ कि वो दौर बहुत मुश्किल था. अगर शुरू में मुझे इंदिराजी का इतना समर्थन नहीं मिलता तो मैं आज इस जगह नहीं होती.

और सबसे संतुष्ट करने वाले लम्हे कौन से हैं?

कई लोग मुझसे सवाल करते हैं कि अगर आपको दोबारा मौका मिलता तो क्या करतीं. मैं कहना चाहूँगी कि 1977 में मैं कांग्रेस एस में रह गई और इंदिरा की कांग्रेस आई में नहीं गई. बस यही एक अफ़सोस है.

मैं राजनीति में जिस नीयत और इरादे से आई मैंने इससे कोई समझौता नहीं किया. मैं 40 साल के लंबे अरसे के बाद आज ये सिर उठा कर कह सकती हूँ कि मैं आज भी एक्टिविस्ट हूँ. इनक्रेडेबल इंडिया को बहुत सफल बनाया. अब तो अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा ने भी कहा है कि हमें भारत के इस प्रोजेक्ट से प्रेरणा लेनी चाहिए.

अगर राजनीति में नहीं होती तो दिमाग में कोई और विकल्प था?

मैंने तो राजनीति में आने की सोची भी नहीं थी. लेकिन जब इंदिरा गांधी पार्टी में बैंकों का राष्ट्रीयकरण जैसे मुद्दे को लेकर आई. 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ तो मैं एक स्वयंसेवी के रूप में कांग्रेस में आई. उस वक़्त मेरे पिता गोवा में गवर्नर थे. मैं हवाना यूनीवर्सिटी की छात्रा रही हूँ. मेरे पति तब क्यूबा के दूतावास में थे. मैं फ़िदेल कास्त्रो से भी मिली थी. इन सबके बावजूद मुझे कांग्रेस में स्वयंसेवी के रूप में लाया गया.

मुकुल बनर्जी के साथ मैं महिला कांग्रेस में काम कर रही थी. तब इंदिरा गांधी मणिपुर में थी. मैंने इंदिराजी से कहा कि नई दिल्ली की सीट हमें दे दीजिए, हम इस पर लड़ेंगे. हम जोश से लड़े, मुकुल जी 44 हज़ार वोटों से जीत गए. जब रात को हम इंदिरा जी से मिलने एक, सफ़दरजंग रोड गए तो उन्होंने मुझे कॉम्प्लीमेंट दिया. फिर उन्होंने मुझे टिकट ऑफर किया.

इसके बाद मैं रोम चली गई. इंदिरा जी उस वक़्त विदेश दौरे पर थी. मेरे पति उस वक़्त वहीं पोस्टेड थे. मैं उन्हें रिसीव करने के लिए गई तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम यहाँ क्या कर रही हो, मेरे साथ चलो. फिर मैं उनके साथ चली आई.

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