भारत ईरानी उपग्रह का प्रक्षेपण नहीं करेगा

मनुचेहेर मोत्तकी
Image caption ईरानी विदेश मंत्री की अपने भारतीय समकक्ष से कई मामलों पर बातचीत हुई

भारत का एक ईरानी उपग्रह के प्रक्षेपण पर राज़ी हो कर अमरीका की नाराज़गी मोल लेने का क़तई कोई इरादा नहीं है.

शीर्ष भारतीय अधिकारियों ने बीबीसी से कहा, "हमें कुछ महीने पहले ईरानी अधिकारियों की ओर से एक पत्र मिला था जिसमें कहा गया था कि हम एक उपग्रह छोड़ें लेकिन हमारा उन्हें इस बारे में जवाब देने का कोई इरादा नहीं है".

भारत ने हालाँकि, ईरानी विदेश मंत्री मनुचेहेर मोत्तकी की भारत यात्रा को पूरी अहमियत दी है और सोमवार को उनकी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात भी हुई.

विस्तार से चर्चा

मोत्तकी भारत में पढ़ाई कर चुके हैं और यहाँ के लिए अजनबी नहीं है. उनकी भारतीय अधिकारियों से कई अलग-अलग मुद्दों पर व्यापक बातचीत हुई और उन्होंने भारत को जैसाकि वह कहते हैं, पूरी असैन्य परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी वार्ताओं की मौजूदा स्थिति से भी अवगत कराया.

पाकिस्तान से जुड़ी बलूचिस्तान सीमा के सिस्तान प्रांत में 18 अक्तूबर को ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के 30 सदस्यों के मारे जाने के बाद से पाकिस्तान की सीमा के भीतर से जारी चरमपंथी गतिविधियों को देखते हुए, लगता है भारत और ईरान दोनों ही एक साझा ख़तरे से जूझ रहे हैं.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान में बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा, "दोनों पक्षों ने महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर विस्तृत बातचीत की जिसमें उस आतंकवाद के ख़तरे का मामला भी शामिल था जिसका सामना दोनों देश कर रहे हैं".

सहयोग का लंबा इतिहास

ईरानी विदेश मंत्री अपने भारतीय समकक्ष एसएम कृष्णा से भी मिले और उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती असुरक्षा की स्थिति पर चर्चा की. दोनों देशों का अफ़ग़ानिस्तान में साथ काम करने का एक लंबा इतिहास है जब नब्बे के दशक में उनहोंने रूस के साथ मिल कर एक नॉर्दन अलायंस की स्थापना की थी.

अपना नाम न देने के इच्छुक भारतीय अधिकारियों ने मंगलवार को कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में जो हो रहा है उसके बारे में हमारी और ईरान की एक समान सोच है. लेकिन जिस बात पर हममें मतभेद है वह अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की मौजूदगी का मामला. ईरान इसे एक बड़ी समस्या मानता है".

Image caption ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता ज़ाहिर की जाती रही है

पाकिस्तान के रास्ते भारत तक गैस पाइपालाइन लाने पर रुकी हुई बातचीत को शुरू करने के मामले पर लगता नहीं कोई ख़ास प्रगति हुई है. अधिकारियों ने यह भी कहा, "यह मामला बातचीत के दौरान उठा था और हम इस पर आगे बात करेंगे"

इस पाइपलाइन के पाकिस्तानी क्षेत्र से हो कर गुज़रने पर सुरक्षा को लेकर भारत की लंबे समय से चिंता बनी हुई है और जब सितंबर, 2005 में अंतरराष्ट्रीय अणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ मतदान किया तब से ईरान इस मुद्दे पर बातचीत को लेकर एक अत्यंत कड़ा रुख़ अपनाए हुए है. इस मतदान के बाद ईरान ने भारत को प्रतिवर्ष 21 अरब डॉलर मूल्य की 75 लाख टन तरल प्राकृतिक गैस की जहाज़ के ज़रिए होने वाली आपूर्ति को भी रद्द कर दिया था. यह सौदा अब भी स्थगित है. वर्ष 2007 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ईरान के विरुद्ध भारत के मतदान की भरपाई के लिए ईरान गए और उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से कहा कि हालाँकि भारत वेनेज़ुएला नहीं है, लेकिन वह अपने विदेशी नीति संबंधी फ़ैसले लेने के मामले में स्वतंत्र रहेगा.

ईरानी विदेश मंत्री मंगलवार को भारत से रवाना हो रहे हैं.

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