जमीयत के ख़िलाफ़ मुस्लिम बुद्धिजीवी

  • 19 नवंबर 2009
मुसलमान
Image caption जमीयत ने मुसलमानों को वंदे मातरम न गाने का निर्देश दिया है

पिछले दिनों इस्लामी संस्था जमीयत उलेमा-ए हिंद ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रस्ताव पारित करके मुसलमानों से वंदे मातरम न गाने को कहा गया.

उसका कहना था कि यह इस्लाम के ख़िलाफ़ है. जमीयत का तर्क था कि मुसलमान अल्लाह को छोड़कर किसी और की प्रार्थना नहीं कर सकता.

लेकिन बड़ी संख्या में मुस्लिम बुद्धिजीवियों और कलाकारों ने वंदे मातरम विवाद को एक बार फिर हवा देने के लिए जमीयत उलेमा-ए हिंद की आलोचना की है.

इन बुद्धिजीवियों और कलाकारों ने अपने हस्ताक्षरों वाला एक बयान जारी किया है.

आलोचना

इस बयान में इस पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है कि 1930 के दशक में सुलझ चुके इस मामले पर फिर विवाद खड़ा किया जा रहा है.

उस समय जमीयत के नेतृत्व की सहमति से यह तय हुआ था कि वंदे मातरम के 'विवादित हिस्से' का गायन नहीं किया जाएगा और उस समय से यही अपनाया जा रहा है.

इस बयान में कहा गया है- हम न तो वंदे मातरम के गायन को किसी की देशभक्ति की जाँच का आधार मानते हैं और न ही हम जमीयत के इस तर्क तो मानते हैं कि वंदे मातरम के गायन से किसी के विश्वास पर ख़तरा पैदा होता है.

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख हैं- अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, संगीतकार जावेद अख़्तर, अभिनेत्री शबाना आज़मी, शिक्षाविद डॉक्टर जमाल किदवई, डॉक्टर अनवर पाशा, वसी हैदर और मुजीब किदवई, वैज्ञानिक, कवि और फ़िल्मकार गौहर रज़ा, पत्रकार ज़फ़र आग़ा, क़ुरबान अली, सीमा मुस्तफ़ा और शाहिद फ़रीदी, मशहूर इतिहासकार इरफ़ान हबीब, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, हनीफ़ लकड़ावाला.

Image caption शबाना आज़मी और जावेद अख़्तर ने भी इस बयान पर हस्ताक्षर किए हैं

आश्चर्यजनक फ़ैसला

बयान में लड़कियों की शिक्षा पर जमीयत के रुख़ की भी आलोचना की गई है. जमीयत बिना आवासीय सुविधाओं लड़कियों की शिक्षा के लिए आधुनिक शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करना चाहता है और साथ ही 10 साल की उम्र के बाद शिक्षा में शरिया का पालन होना चाहिए.

इन बुद्धिजीवियों और कलाकारों का कहना है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में समाज के किसी भी वर्ग की लड़कियों की शिक्षा में शरिया के पालन की बात करना चकित करने वाला है.

बयान में युवा मुसलमानों को किसी सरकारी या ग़ैर सरकारी स्कूल में नामांकन न कराने की सलाह देने की भी निंदा की गई है. जमीयत का कहना है कि ऐसी संस्थाओं में मुसलमान अकेले पड़ जाते हैं और कभी-कभी तो अपने इस्लामिक मूल्यों से भी अनजान होने लगते हैं.

बयान में जमीयत उलेमा-ए हिंद की इस कारण भी आलोचना की गई है कि वह महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करती है क्योंकि उसे लगता है कि ये महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की हताशा भरी कोशिश है.

संबंधित समाचार