बलिदान का सम्मान नहीं: विनीता कामटे

ताज होटल
Image caption अशोक काम्टे हमलावरों की गोलियों का शिकार बने

पिछले वर्ष 26 नवंबर को मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों में मुंबई पुलिस के एसीपी अशोक कामटे भी हमलावरों की गोली का शिकार बने थे.

उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद उनकी पत्नी विनीता कामटे ने एक पुस्तक के ज़रिए अपने पति की जीवनी लोगों के सामने लाने का प्रयास किया है.

मंगलवार को इस पुस्तक का विमोचन भी मुंबई में हो गया. लोकार्पण का काम सूचना का अधिकार की जानी-मानी कार्यकर्ता और मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त अरुणा रॉय ने किया.

दरअसल, यह किताब पूरी भी सूचना का अधिकार क़ानून के इस्तेमाल की वजह से हो सकी है. और सूचना का अधिकार क़ानून का इस्तेमाल करके विनीता कामटे ने अपने पति के जीवन के अंतिम क्षणों के घटनाक्रम को सामने लाने का प्रयास किया है.

इस पुस्तक- टू द लास्ट बुलेट- की सह लेखिका वरिष्ठ पत्रकार विनीता देशमुख हैं.

प्रशासनिक रवैया

हमले में जिन लोगों ने चरमपंथियों का मुकाबला करते हुए अपनी जानें गंवाईं, केंद्र और राज्य सरकार मंच पर उनके बारे में अच्छे शब्द कहने का अवसर नहीं खोती. अपनी व्यवस्था की पीठ थपथपाती है.

लेकिन इसी व्यवस्था को अपना चेहरा बदलने, भाषा बदलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता. कम से कम विनीता कामटे का अनुभव तो यही कहता है.

पुस्तक में अशोक कामटे के जीवन के अंतिम क्षणों की चर्चा आसान नहीं थी. 26 नवंबर को अशोक कामटे के साथ क्या हुआ. वो किन परिस्थितियों में और कहाँ कैसे गए. उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और तमाम ज़रूरी जानकारी कहाँ हैं, इस बारे में विनीता कामते ने मुंबई पुलिस से जानकारी देने का अनुरोध किया.

पर जिस एसीपी को अपने विभाग का गौरव बताने से मुंबई पुलिस नहीं थक रही थी, उसी मुंबई पुलिस ने विनीता कामते को यह कहते हुए जानकारी देने से मना कर दिया कि ऐसा करने से जाँच प्रक्रिया प्रभावित होगी.

विनीता कामटे ने बीबीसी को बताया," मैं जानना चाहती थी कि 26 नवंबर के दिन मेरे पति के साथ क्या-क्या हुआ. जानकारी मांगने के बावजूद कोई जानकारी नहीं दी गई. आखिरकार मैंने सूचना का अधिकार क़ानून का इस्तेमाल करके जानकारी मांगी. अब लगभग एक वर्ष बाद मुझे जानकारी मिली है."

विनीता बताती हैं कि यह जानकारी उन्होंने इस किताब में इस्तेमाल की है. किताब में अशोक कामटे के जीवन के शुरुआती दिनों से लेकर 26 नवंबर को उनकी मृत्यु तक का सफर दर्ज है.

विनीता कहती हैं, “मुझे दुख होता है यह अनुभव पाकर कि व्यवस्था लोगों के बलिदान का सम्मान नहीं करती. उनके सवालों का जवाब नहीं देना चाहती. मुझे सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगनी पड़ी.”

यह भी भ्रष्टाचार

लोकार्पण समारोह की मुख्य अतिथि अरुणा रॉय ने बीबीसी को बताया, “हेमंत करकरे की पत्नी भी यह मांग करती रहीं कि उन्हें उनके पति की बुलैटप्रूफ़ जैकेट दिखाई जाए. पुलिस का कहना है कि वो उनको नहीं मिल रही. इस किताब से पहले जानकारी के लिए अपने पति के साथियों से ही विनीता को बहुत खेदपूर्ण बर्ताव देखना पड़ा है.”

वो कहती हैं कि ऐसा इसलिए है कि जैसे ही आप व्यवस्था से पारदर्शिता की मांग करते हैं, व्यवस्था अपनी गोपनीयता की दीवार के पीछे खड़ी हो जाती है. फिर चाहे आप उस व्यवस्था के हिस्से ही क्यों न रहे हों.

अरुणा कहती हैं कि यह एक किस्म का भ्रष्टाचार है और विनीता कामटे ने इस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ पारदर्शिता और जवाबदेही का हथियार इस्तेमाल किया है. यह एक सराहनीय प्रयास है.

विनीता कामते ने कहा कि यह मेरा, श्रीमती सालस्कर और श्रीमती करकरे का बुनियादी हक़ है कि हमें अपने पतियों की ज़िंदगी की आखिरी रात के घटनाक्रम और उनसे संबंधित अन्य जानकारियां दी जाएं.

विनीता कहती हैं कि उन्हें लगभग पूरी जानकारी मिल चुकी है. लेकिन अभी भी कुछ जानकारी मिलनी बाकी है. इस जानकारी के आने के बाद किताब में संशोधन किए जाएंगे और मिली जानकारी को शामिल किया जाएगा.

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