'हम बिलकुल तैयार नहीं थे'

  • 25 नवंबर 2009
संदीप खरिदकर
Image caption संदीप खरिदकर ने कहते हैं कि मुंबई पुलिस अब किसी तरह के हमलों से निपटने के लिए अच्छी तरह से तैयार है

मुंबई में 26 नवंबर को हुए हमलों के बाद यह सवाल बार-बार उठा है कि क्या पुलिस ऐसे किसी हमले के लिए तैयार थी और जिस तरह से इन हमलों के बाद कार्रवाई हुई वो सही थी.

इसे लेकर आरोप प्रत्यारोपों का लंबा दौर चला है लेकिन अब अधिकारी मानते हैं कि पुलिस तैयार नहीं थी और कहीं न कहीं खुफ़िया जानकारियों में, दिशा निर्देश में और मुंबई पुलिस की कार्रवाई के तरीकों में कमी रह गई थी.

छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर हमलावरों से लोहा लेने वाले रेलवे पुलिस फ़ोर्स के सीनियर इंस्पेक्टर संदीप खिरदकर साफ़ साफ़ बात करते हैं.

वो कहते हैं, "हम बिलकुल तैयार नहीं थे. हमारे पास एके 47 थे, इन्सास राइफ़ल थे लेकिन तैयारी नहीं थी. कई लोगों के हाथ कांप रहे थे मैगज़ीन चढ़ाने में. कई सिपाही डर गए थे. लेकिन अब हम तैयार हैं."

संदीप बताते हैं कि जब उन्हें हमले की जानकारी मिली तो उन्होंने पहले साथ रिवॉल्वर लिया क्योंकि उन्हें लगा कि ये कोई माफ़िया गैंग वार है. बाद में जब उन्हें लगा कि ये अपराधी नहीं बल्कि चरमपंथी हैं तब वो जाकर एके 47 लेकर आए.

तो क्या अब वो तैयार हैं, संदीप कहते हैं, "अब अगर ऐसा हुआ तो हम लोग अच्छी तरह से तैयार हैं और उनको सबक सिखा देंगे.दुख केवल इस बात का है कि हम कसाब और इस्माइल को यहां रोक नहीं पाए और उन्होंने आगे जाकर करकरे और सालस्कर जैसे अधिकारियों को मार दिया. "

चूक हुई

Image caption वाईपी सिंह कहते हैं कि पुलिस ने शुरू में समझा कि कोई गैंगवार है

ये बात हमसे बातचीत के दौरान कई पुलिसवालों ने मानी कि सभी को उस समय यही लगा था कि ये कोई गैंगवार है. इससे ये अंदाज़ा लग सकता है कि क्यों हेमंत करकरे और विजय सालस्कर जैसे अधिकारी इन चरमपंथियों के पीछे एक साथ गए होंगे.

पूर्व पुलिस अधिकारी और अब वकील वाईपी सिंह कहते हैं, "मेरे ख्याल से मुंबई में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी ने पुलिस पर गोलियां चलाई हों.यहां पर चूक हुई. शायद अधिकारियों को लगा कि ये अपराधी हैं जो उन पर गोलियां नहीं चलाएंगे. उस समय उनको भी शायद पता नहीं होगा कि ये चरमपंथी हैं.एक नीतिगत चूक हुई है इस जगह पर आप ऐसा मान सकते हैं."

हालांकि वाईपी सिंह मानते हैं कि सबसे बड़ी ग़लती मुंबई पुलिस के आला अधिकारियों की है जो ऐसे मौके पर दिशा निर्देशन ठीक से नहीं कर सके. इसके अलावा वो ख़ुफ़िया जानकारियों और उस पर कार्रवाई न किए जाने को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

वो कहते हैं, "ऐसी घटना में अधिकारी दिशा नहीं दिखा पाए कि क्या करना है. अफ़रा तफ़री मच गई थी. कोई कमांड सेंटर नहीं था. इसके अलावा ऐसे किसी हमले की संभावना जताई जा चुकी थी. ख़ुफ़िया जानकारियां थीं लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी."

वाईपी सिंह कहते हैं कि अभी भी अगर 10 हमलावर हमला कर दें तो वो बहुत क्षति पहुंचा सकते हैं और इसे रोकना मुश्किल होगा. वो अमरीका का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहां ख़ुफ़िया तंत्र पर ज़ोर देकर ऐसे हमले रोके गए जबकि भारत में अभी भी ख़ुफ़िया तंत्र इतना मज़बूत नहीं है कि ऐसे हमलों को रोक सके.

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